भू की प्यास बुझाने वाला बादल बन तू
नदिया, दरिया, दरख़्त, पहाड़ सा कोई
हँस कर सब लुटाने वाला पागल बन तू
मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
गतिमान हूँ कब से जाने
मंज़िल का पर अनुमान नहीं
कोई मिला तो छूटा कोई
पर अक्सर तन्हा ही चलता हूँ
थके पाँव सहलाता खुद से
गिर के खुद ही सम्हलता हूँ
कभी-कभी जो रुक जाता हूँ
लेने को थोड़ा सा दम
मन के प्रश्न खड़े हो जाते
दिशा बदलूँ या जाऊँ थम?
पूछे अर्जुन कृष्ण कहाँ है?
अंतर्मन में द्वंद्व यहाँ है
गीता का फिर पाठ पढ़ाओ
दिशाहीन सारी दुनिया है
मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
चलते-चलते इतना जाना
रुक जाना भी समाधान नहीं
सत्य न कोई दूर खड़ा
न कोई अंतिम पड़ाव यहाँ
चलना ही जब उत्तर ठहरा
यही जीवन का सार यहाँ
नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...