जग का तम मिटाने वाला सूरज बन तू 
भू की प्यास बुझाने वाला बादल बन तू 
नदिया, दरिया, दरख़्त, पहाड़ सा कोई 
हँस  कर सब लुटाने वाला पागल बन तू 

No comments:

मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...