हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है
पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है
दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है
भूली हुई हर तस्वीर खुद-ब-खुद लौट आती है
उस शामो-सहर की, बामो-दर की याद आती है
हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है
परदेस की इन राहों में जब मन भर आता है
हर अपना-सा चेहरा कुछ कहकर रह जाता है
घर से जाने के बाद मुझे घर की याद आती है
हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है
नींद खुली आँखों में भी कुछ ठहर-सा जाता है
जो पाया न जा सका वही दिल को बहलाता है
ख़्वाब देखा था जो उस मंज़र की याद आती है
हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है
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