मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू
कर्म से मत भाग तू
मन में अब ठान तू
चुनेगा उत्थान तू

जीवन तो बहता जाए
कौन इसे बाँध पाए
जी ले यहाँ इसी पल तू
कहाँ ये वापस आए

जो होता है स्वीकार कर
सुख-दुःख अंगीकार कर
जो भी मिले अपना ले तू
अब व्यर्थ न विचार कर

यही क्षण है सबसे बड़ा
आज नहीं तो फिर कब
सोच में क्यों उलझा पड़ा
मूरख तू जिएगा कब !

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मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...