जीत-हार

हार पर अपने अश्रु बहाऊँ क्यूँ
डर कर मैं यूँ रुक जाऊँ क्यूँ
एक रण ही तो हारा हूँ मैं
हिम्मत भी हार जाऊँ क्यूँ

विजय पर अपने इतराऊँ क्यूँ
जीत का जश्न मनाऊँ क्यूँ
जो पाया वो तो प्रसाद है
उपलब्धि अपनी बतलाऊँ क्यूँ

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