मैं कहाँ तेरे शहर में ठहर पाऊँगा

मैं कहाँ तेरे शहर में ठहर पाऊँगा
चलते-चलते वहाँ से गुज़र जाऊँगा

अब तुम करो या न करो याद मुझे
मैं रोज़ ही तेरा नाम दोहराऊँगा

ठहरूँ कहाँ, रुकूँ मैं किस मोड़ पर
दिल चाहे भी तो मैं निकल जाऊँगा

हर मोड़ ने मुझसे मेरा कुछ छीना है
टूटा हूँ ऐसा, अब तो बिखर जाऊँगा

मुसाफ़िर हूँ, क्या लौट कर आऊँगा
जो छूट गया उसे यहीं छोड़ जाऊँगा

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