प्रेम गली अति साँकरी, जा में दुई ना समाय
जब "मैं" था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाय
कबीर को समझा नहीं जा सकता है, हाँ कबीर हुआ जा सकता है। बिना कबीर हुए कबीर को जान नहीं सकते।
हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है भूली हुई हर तस्वीर खुद-...
No comments:
Post a Comment