रात के ख़ामोश अंधेरों में
दिन भर के ख़याल जब ऊँघने लगते हैं
दबे पाँव सबसे नज़रें बचाकर आती हैं
तुम्हारी यादें दिल पर दस्तक  देती हैं
और उनकी उंगलियाँ थाम कर मैं
तसव्वुर की राहों में निकल जाता हूँ

चाँद आसमां में बादलों से  निकलता है
लहू में घुलकर कुछ रगों में बहने लगता है
लगता है आज की रात फिर देर से बुझेगी
मैं डायरी और पेन निकाल लूँ जरा
एक नयी नज़म लिहाफ़ के अंदर
अंगड़ाई ले रही है  

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