अधूरे ख़्वाबों का मुसलसल सिलसिला ही सही
ज़िन्दगी नाकामियों का एक क़ाफ़िला ही सही
बुलंदियों की ख्वाहिशें क्यूँकर हो कम मगर
उड़ जाआदमी, तू पानी का एक बुलबुला ही सही 

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मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...