सबेरा

वो सुबह जो मिल न सकी
वो कली जो खिल न सकी
उम्मीद जो पल न सकी
वो शब जो ढल न सकी

परिंदा वो सुबह का जो
ख़्वाब से हमें जगा गया
नए दिन की उम्मीद करना
फिर से हमें सिखा गया

कह दो कोई उस परिंदे से जाकर
कुछ आँखों में नींद नहीं होती
कुछ नींदों में ख़्वाब नहीं होते
कई ख़्वाब यहाँ पूरे नहीं होते
होती हैं कई रातें ऐसी भी
जिनके हिस्से सबेरे नहीं होते

No comments:

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है भूली हुई हर तस्वीर खुद-...