चला मुसाफ़िर
ढूँढने आख़िर
किसने उसे निष्प्राण किया

क्या यही था वो
जीवन जिस पर
हर नर ने ही अभिमान किया

मुश्किल से ये दौर रुका था
ज़ख्मों के वो मोल बिका था
देकर अपनी सांसें पूरी
बाज़ी अपनी वो खेल चुका था

जग के खेल निरालों से
जी जब पर्याप्त भर गया
मिट्टी की क़ैद तोड़ कोई
हर शै में उसे व्याप्त कर गया 

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