तुम्हें जब मेरी जरुरत थी
मुझे तब कहाँ फुर्सत थी
रुंधे गले से था रोका तुमने
पर मेरी और ही हसरत थी

इक आवाह्न पर निकल गया
कर झटक कर चल दिया
कहीं पर फैला कर तम
कहीं पर जाकर जल गया

नर क्यों मजबूर इतना है !
किस भ्रम में चूर इतना है !
मैं तुम से दूर हुआ कुछ यूँ
सूर्य धरा से दूर जितना है

अब मन में यही विचार करूँ
समय न और बेकार करूँ
यहाँ के दीये बुझाकर अब
दूर घर का अंधियार करूँ

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