नदी कहती है वह
थक गयी है बहते-बहते
रुक कर सांस लेना चाहती है
खुद को समेट कर
महसूस करना चाहती है

समंदर को देखो
बिखरा है पसरा है
बहता नहीं वो
कब से ठहरा है

नदी औरत है
उसमे इमोशंस हैं
वो फ्री फ्लोइंग है
फील करती है वो

मर्द समंदर है
सीने में सब ज़ब्त रखता है
उसमे ठहराव है
लहरें अंदर ही ख़ामोश करता है

दोनों हैं पानी मगर
जुदा हैं दोनों में फ़र्क़ है
एक में फीलिंग्स की मिठास है
दूसरे में लॉजिक का खारापन

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