कभी सुख की गंगा में मैं तैरता रहा
तो कभी दुख की यमुना में डूबता पाया
जीवन रूपी संगम पे बैठा  मुसाफ़िर
 सरस्वती आनंद की पर ढूँढ न पाया 

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मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...