ज़िन्दगी अँधेरी राहों पर चलना है
और अनजान मोड़ों से गुज़रना है

बैशाखियाँ फिर से न दे देना मुझको
मुझे तो अब बिन सहारों के चलना है

चाँद सा मामूल नहीं हो सकता मेरा
मुझे देर तलक़ सूरज सा जलना है

अपने आशियाने में मत रोक मुझे
अभी तो सहर होने तक चलना है

देर तो होगी, मुश्किलें भी कम नहीं
हवाओं का रुख़ जो अभी बदलना है

दुनिया जलने-बुझने का सिलसिला सही
किसी दिए को बुझना, किसी को जलना है

दैरो-हरम ही सबब हो गए फ़सादात के
छोड़ो फिर मुसाफ़िर क्या मज़हब का करना है 

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