पतंजलि का "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः", और जावेद अख़्तर का "मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं", अर्थ में दोनों मुझे एक ही लगते हैं।
इस इमपरमानेन्ट ज़िन्दगी में अगर कोई परमानेंट चीज है तो वो दर्द है। दर्द को डील करना एक हुनर है, एक आर्ट है। कोई इसकी गहराई में डूब जाता है तो कोई इसकी कीचड़ से सतरंगी फूल खिलाता है और कोई दर्द की नाव पे सवार होकर आनंद के अनंत महासागर तक पहुँच जाता है। इसमें कोई डूब कर शराबी हो जाता है तो कोई इसे पीकर शायर और कोई इससे उबर कर संत।
जामे-फ़ना
असल (Original)
अक्ल के मदरसे से उठ, इश्क़ के मयक़दे में आ
जामे-फ़ना-ओ-बेख़ुदी अब तो पिया जो हो सो हो
- हज़रत शाह नियाज़
नक़ल (Duplicate)
अक्ल की टोपी फ़ेंक दी
ली इश्क़ की चादर ओढ़
जामे-फ़ना जो पी ली तो
मैं बेख़ुद हुई बेजोड़
चाँद
आसमां शांत है
बादल की कोई चादर नहीं
उसमें एक भरा पूरा
चाँद चमक रहा है
नीचे एक झील है
बिल्कुल शांत
उसमे कोई तरंग नहीं
एक आइने की तरह ही उसमें
पूरा चाँद चमक रहा है
सफ़र है तो किसी मंज़िल पे रुकता क्यों नहीं ?
सब जा रहे हैं कहाँ कोई कुछ कहता क्यों नहीं ?
बदल जाती है मेरे आस-पास की हर एक चीज
मेरे अंदर जो मैं है वो कभी बदलता क्यों नहीं ?
कहते हैं हर शै में है और हर ज़र्रे में है ख़ुदा
ढूँढता हूँ हर जगह पर मैं उसे पाता क्यों नहीं ?
बचकर दुनिया से कभी जो अंदर जाता हूँ मैं
जिसे पाता हूँ मैं वहाँ उसे जानता क्यों नहीं ?
होता है यूँ भी कभी होकर भी मैं यहाँ होता नहीं
होता हूँ जहाँ भी मैं वहीं रह जाता क्यों नहीं ?
फ़ना फिल हक़
धागे से टूट कर सब मोती बिखर गए
बैठे थे शाख़ पर वो पंछी किधर गए ?
उठ कर बुलबुला पानी में खो गया
यूँ ही जहां में आये यूँ ही गुजर गए
गुम हुई है हीर राँझे की खोज में
राहे-फ़ना के रहबर सभी किधर गए ?
होने ने मेरे ही बढ़ा दी मुश्किलें
ख़ुदी से बढ़े तो हम भी उबर गए
कई मक़ाम हैं तवील सफ़र में
मुर्शीद थे तो पार राही उतर गए
बैठे थे शाख़ पर वो पंछी किधर गए ?
उठ कर बुलबुला पानी में खो गया
यूँ ही जहां में आये यूँ ही गुजर गए
गुम हुई है हीर राँझे की खोज में
राहे-फ़ना के रहबर सभी किधर गए ?
होने ने मेरे ही बढ़ा दी मुश्किलें
ख़ुदी से बढ़े तो हम भी उबर गए
कई मक़ाम हैं तवील सफ़र में
मुर्शीद थे तो पार राही उतर गए
चल रहा हूँ मैं
न जाने पर किधर
सपनों की चमक
दोनों आँखों में भर
राहें ठग रही हैं
थमता नहीं सफ़र
मंज़िल है भी क्या
कोई कहीं किधर ?
किस आस पर चलूँ
किस राह पग धरूँ
एक खेल ही तो है
देखूँ चाहे जिधर
हर कोई चल रहा
भागता फिर रहा
तिश्नगी मन की
किसकी मिटी मगर
लाखों में कोई एक
खेल के परे गया
चला वो फ़क़ीर हो
कर धुंआ सब फ़िकर
न जाने पर किधर
सपनों की चमक
दोनों आँखों में भर
राहें ठग रही हैं
थमता नहीं सफ़र
मंज़िल है भी क्या
कोई कहीं किधर ?
किस आस पर चलूँ
किस राह पग धरूँ
एक खेल ही तो है
देखूँ चाहे जिधर
हर कोई चल रहा
भागता फिर रहा
तिश्नगी मन की
किसकी मिटी मगर
लाखों में कोई एक
खेल के परे गया
चला वो फ़क़ीर हो
कर धुंआ सब फ़िकर
गोल-गोल ज़िन्दगी
अभी कुछ रोज़ पहले ही
मैं मिला एक आदमी से
बड़ा सरफिरा सा इंसान था
रुक कर उसने सलाम किया तो
मैंने उससे उसका हाल-चाल पूछ लिया
कहने लगा कि क्या बताऊँ ज़नाब
गोल-गोल घुमा रही है ज़िन्दगी
जहाँ से शुरू की थी ज़िन्दगी मैंने
घूम-फिर के उसी जगह पे खड़ा हूँ
मुझे हैरान देख फिर आगे कहने लगा
बचपन में बड़ी बेफ़िक्री थी, सुकून था
वक़्त ही वक़्त था
इन सब को खर्च कर दिया मैंने
उनके बदले तालीम ली और इल्म हासिल किया
इल्म की बदौलत काम के लायक बना
उससे रोटी मिली, शोहरत मिली
लेकिन फ़िक्रें बढ़ीं और साथ में मशक़्क़त भी
काम में सारा वक़्त खर्च होता गया
बचा खुचा सुकून लुटा कर
दौलत जमा करने लगा
और आज जब दौलत है मेरे पास
तो बाँट रहा हूँ उसे मजलूमों में
दिल इससे सुकून पाने लगा है
और मशरूफ़ियत बे-इन्तहा बढ़ गयी है
तो दिल फुर्सत के रात दिन ढूँढने लगा है
वक़्त ढूँढने लगा है, सुकून ढूँढने लगा है
आज इंतज़ार है उस कल का
जिस रोज़ काम से छूट चूका होऊँगा
फिर तो वक़्त ही वक़्त होगा
फिर तो वक़्त ही वक़्त होगा
सुकून ही सुकून होगा
वही बेफ़िक्री का आलम होगा
पर हक़ीक़त तो ये है ज़नाब कि
वहीं से तो शुरु की थी मैंने ज़िन्दगी
पर जो ज़िन्दगी के तोहफे मिले थे
उन्हें दुनिया बनाने में खर्च दी
और अब उस दुनिया को छोड़ के
उन्हीं तोहफों का ख़्वाब देखता हूँ
क्या कहूँ जहाँ से चला था
वहीं पहुँच रहा हूँ
तो कहिये ज़नाब क्या ज़िन्दगी जी मैंने
मैंने संजीदा होकर हाँ में हाँ मिला दी
उसने फिर सलाम किया और चला गया
वाकई अजीब सिरफिरा आदमी था वो
मैं बड़ी देर तक खड़े खड़े सोचता रहा
एक सरफिरे शायर ने ठीक ही कहा है
कि ये दुनिया तो जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिटटी है, खो जाए तो सोना है
एक सरफिरे शायर ने ठीक ही कहा है
कि ये दुनिया तो जादू का खिलौना है
मिल जाए तो मिटटी है, खो जाए तो सोना है
दो दुनिया
क्या मैं वहाँ रहूँ जहाँ मैं रहना चाहता हूँ
या वहाँ जहाँ मुझे होना चाहिए ?
क्या मैं वो करूँ जो मैं करना चाहता हूँ
या वो जो मुझे करना चाहिए ?
ये सवाल अहम् हैं या
इनकी कोई अहमियत नहीं ?
यहाँ दो दुनिया है, दो जीवन
जिनके बीच मैं झूलता रहता हूँ
यथार्थ की धरती पे एक संघर्षों से भरा
वो दुनिया जहाँ शायद मैं होना ही नहीं चाहता
वो जीवन जिसे जीने की मेरी ख़्वाहिश ही नहीं
और दूसरा फैला हुआ ख़्वाबों का आसमान
जो है उम्मीदों के प्रकाश से जगमग
जिसमें हर चीज मुमक़िन है
जहाँ मैं होना चाहता हूँ
जिसे मैं जीना चाहता हूँ
क्या ये मुमक़िन है कि
ये दो दुनिया एक हो जाएँ
और इनके दरमियान जो
दीवार है वो गिर जाए ?
मैं ढूंढ़ रहा हूँ वो मुक़ाम जहाँ होने से
मेरे पैर तो टिके हों ज़मीन पर
पर मैं हाथ फैलाकर आसमां को छू लूँ
या वहाँ जहाँ मुझे होना चाहिए ?
क्या मैं वो करूँ जो मैं करना चाहता हूँ
या वो जो मुझे करना चाहिए ?
ये सवाल अहम् हैं या
इनकी कोई अहमियत नहीं ?
यहाँ दो दुनिया है, दो जीवन
जिनके बीच मैं झूलता रहता हूँ
यथार्थ की धरती पे एक संघर्षों से भरा
वो दुनिया जहाँ शायद मैं होना ही नहीं चाहता
वो जीवन जिसे जीने की मेरी ख़्वाहिश ही नहीं
और दूसरा फैला हुआ ख़्वाबों का आसमान
जो है उम्मीदों के प्रकाश से जगमग
जिसमें हर चीज मुमक़िन है
जहाँ मैं होना चाहता हूँ
जिसे मैं जीना चाहता हूँ
क्या ये मुमक़िन है कि
ये दो दुनिया एक हो जाएँ
और इनके दरमियान जो
दीवार है वो गिर जाए ?
मैं ढूंढ़ रहा हूँ वो मुक़ाम जहाँ होने से
मेरे पैर तो टिके हों ज़मीन पर
पर मैं हाथ फैलाकर आसमां को छू लूँ
बेहतर जीवन
अपने जीवन के यथार्थ से
लड़ते लड़ते इंसान
कितना हो जाता है विवश
स्वप्न देखने को
वो स्वप्न जिन्हें वो पलकों पे
सजा के रखता है
जो उसके मन के आकाश में
इंद्रधनुषी रंग बिखेर देते हैं
और उसे ऐसी दुनिया, ऐसे जीवन में ले जाते हैं
जहाँ आज के अँधेरे न हों
और उन्हें जीने को वह चल पड़ता है
अपने घर, आँगन, गाँव को छोड़ कर
संघर्षों की सरिताएँ पार कर
कठिनाइयों के पर्वत लाँघ कर
एक दिन पा ही लेता है वह
उस दुनिया को, उस जीवन को
इसी दुनिया का स्वप्न तो देखा था उसने
इसी जीवन को जीने की तो उसने तमन्ना की थी
उसे पूरी ईमानदारी से वह जीने लगता है
पर जिसको जीते जीते वह
धीरे-धीरे खो जाता है पूरी तरह से
उस नयी दुनिया के तिलिस्म में
और फिर कभी एक लम्बे अरसे के बाद
जब उतरता है जादू तो
एहसास होता है उसे कि इस जीवन ने
ले लिया है उससे उसका सब कुछ
पर जिसे पाने की ख़ातिर चला था वो
दुनिया में उसे तो मिला ही नहीं
वो पीछे मुड़ कर देखता है तो नज़र आते हैं
कुछ डबडबाई आँखें, कुछ हिलते होंठ
और कुछ वापस बुलाते हाथ
वो वापस लौटना चाहता तो है मगर
पाता है स्वयं को एक दलदल में
जिससे वो जितना निकलने की कोशिश करे
उतना और ही धँसता जाता है
लड़ते लड़ते इंसान
कितना हो जाता है विवश
स्वप्न देखने को
वो स्वप्न जिन्हें वो पलकों पे
सजा के रखता है
जो उसके मन के आकाश में
इंद्रधनुषी रंग बिखेर देते हैं
और उसे ऐसी दुनिया, ऐसे जीवन में ले जाते हैं
जहाँ आज के अँधेरे न हों
और उन्हें जीने को वह चल पड़ता है
अपने घर, आँगन, गाँव को छोड़ कर
संघर्षों की सरिताएँ पार कर
कठिनाइयों के पर्वत लाँघ कर
एक दिन पा ही लेता है वह
उस दुनिया को, उस जीवन को
इसी दुनिया का स्वप्न तो देखा था उसने
इसी जीवन को जीने की तो उसने तमन्ना की थी
उसे पूरी ईमानदारी से वह जीने लगता है
पर जिसको जीते जीते वह
धीरे-धीरे खो जाता है पूरी तरह से
उस नयी दुनिया के तिलिस्म में
और फिर कभी एक लम्बे अरसे के बाद
जब उतरता है जादू तो
एहसास होता है उसे कि इस जीवन ने
ले लिया है उससे उसका सब कुछ
पर जिसे पाने की ख़ातिर चला था वो
दुनिया में उसे तो मिला ही नहीं
वो पीछे मुड़ कर देखता है तो नज़र आते हैं
कुछ डबडबाई आँखें, कुछ हिलते होंठ
और कुछ वापस बुलाते हाथ
वो वापस लौटना चाहता तो है मगर
पाता है स्वयं को एक दलदल में
जिससे वो जितना निकलने की कोशिश करे
उतना और ही धँसता जाता है
एक दिन यूँ होगा
वक़्त गुज़रता जाएगा
और एक दिन यूँ होगा
उस दिन भी जो बाँकी दिनों जैसा ही होगा
सूरज चुपके से आसमां में आ रहा होगा
और ज़माना धीरे से रफ़्तार पकड़ रहा होगा
उस दिन भी कोई शख़्स कहीं जा रहा होगा
तो कोई कहीं से आ रहा होगा
कोई कुछ कर रहा होगा
ताकि उसके बाद कुछ और कर सके
तो कोई कहीं जाने की तैयारी कर रहा होगा
तुम भी हर दिन की तरह ही
इधर-उधर भाग रहे होगे
उस दिन भी तुम ख़्वाहिशों को दूर झटक रहे होगे
वो जो उस दिन भी तेरे पाँवों से लटक रही होंगी
और गुज़ारिश कर रही होंगी वो तुमसे
कि आज कहीं भी मत जाओ
कि आज कुछ मत निपटाओ
कि आज कुछ भी नहीं है ज़रूरी
कि आज बस बैठे रहो
या औंधे पड़े बिस्तर पे लेटे रहो
या हॉल में पसरे रहो दिन भर
या फिर बालकॉनी में ही पड़े रहो
उकेरो डायरी में वो नज़में जिन्हें दिल में समेटे हो
साहिर की नयी किताब जो मंगाई है उसमें ही डूब जाओ
या जगजीत की फ़ेवरिट प्लेलिस्ट ही लगा लो यू-ट्यूब पर
पर आज घर की दहलीज पार मत करो
बस यूँ ही बैठे रहो तन्हाइयों में
ये ज़िन्दगी जो उलझ सी गयी है
गिरहें इसकी सुलझ सी जाएँगी
तुम जो आज अगर रुक जाओ तो
एक सिरे से थोड़ी ढील मिल जायेगी
तो गिरहें सुलझने लगेंगी
नयी गिरहें और न पड़ेंगी
तुम्हें बैठना था न ख़ुद के साथ ?
इतनी आवाज़ें जो गूँज रही थीं अंदर
उन्हें सुनना था न तुम्हें ?
आज तक उन्हें अनसुनी करते रहे तुम
कहीं-न-कहीं जाते रहे हर दिन
कुछ-न-कुछ करते रहे हर पल
और दिन यूँ बीतते गए
रातें गुज़रती गईं
ख़्वाब तुम्हारे दम तोड़ते गए
तुम ख़ुद से ही दूर होते चले गए
पर उस दिन कुछ यूँ होगा
जब ज़माना अपनी रफ़्तार में दौड़ रहा होगा
और सभी कहीं-न-कहीं मशरूफ़ होंगे हर दिन की तरह
तुम्हारी साँसें धीमी पड़ने लगेंगी
आँखों के आगे अँधेरा छाने लगेगा
न कुछ सोच पाओगे, न चल पाओगे, न बोल पाओगे
तुम मन-ही-मन अपने ख़ुदा को याद करोगे
उससे मिन्नतें करोगे
कि अता कर दे वो तुम्हें थोड़ी सी और मोहलत
कि तुमने तो ज़िन्दगी अभी तक जी ही नहीं है
कि थोड़ा वक़्त मिले तो
कर लोगे वो सब जो करना चाहते थे पर कर न सके
थोड़ा वक़्त ताकि तुम ख़ुद के साथ बैठ सको
और अपनी तरह से जीना सीख सको
ताकि ख़्वाबों को फिर ज़िंदा कर सको
और उन ख़्वाबों को जी सको
पर इतने में साँसें रुक जाएँगी
आँखों की पलकें हिला न सकोगे
ज़िन्दगी का दामन हाथों से छूट जाएगा
और तुम इस जहां से चले जा चुके होगे
अच्छा मान लो
और एक दिन यूँ होगा
उस दिन भी जो बाँकी दिनों जैसा ही होगा
सूरज चुपके से आसमां में आ रहा होगा
और ज़माना धीरे से रफ़्तार पकड़ रहा होगा
उस दिन भी कोई शख़्स कहीं जा रहा होगा
तो कोई कहीं से आ रहा होगा
कोई कुछ कर रहा होगा
ताकि उसके बाद कुछ और कर सके
तो कोई कहीं जाने की तैयारी कर रहा होगा
तुम भी हर दिन की तरह ही
इधर-उधर भाग रहे होगे
उस दिन भी तुम ख़्वाहिशों को दूर झटक रहे होगे
वो जो उस दिन भी तेरे पाँवों से लटक रही होंगी
और गुज़ारिश कर रही होंगी वो तुमसे
कि आज कहीं भी मत जाओ
कि आज कुछ मत निपटाओ
कि आज कुछ भी नहीं है ज़रूरी
कि आज बस बैठे रहो
या औंधे पड़े बिस्तर पे लेटे रहो
या हॉल में पसरे रहो दिन भर
या फिर बालकॉनी में ही पड़े रहो
उकेरो डायरी में वो नज़में जिन्हें दिल में समेटे हो
साहिर की नयी किताब जो मंगाई है उसमें ही डूब जाओ
या जगजीत की फ़ेवरिट प्लेलिस्ट ही लगा लो यू-ट्यूब पर
पर आज घर की दहलीज पार मत करो
बस यूँ ही बैठे रहो तन्हाइयों में
ये ज़िन्दगी जो उलझ सी गयी है
गिरहें इसकी सुलझ सी जाएँगी
तुम जो आज अगर रुक जाओ तो
एक सिरे से थोड़ी ढील मिल जायेगी
तो गिरहें सुलझने लगेंगी
नयी गिरहें और न पड़ेंगी
तुम्हें बैठना था न ख़ुद के साथ ?
इतनी आवाज़ें जो गूँज रही थीं अंदर
उन्हें सुनना था न तुम्हें ?
आज तक उन्हें अनसुनी करते रहे तुम
कहीं-न-कहीं जाते रहे हर दिन
कुछ-न-कुछ करते रहे हर पल
और दिन यूँ बीतते गए
रातें गुज़रती गईं
ख़्वाब तुम्हारे दम तोड़ते गए
तुम ख़ुद से ही दूर होते चले गए
पर उस दिन कुछ यूँ होगा
जब ज़माना अपनी रफ़्तार में दौड़ रहा होगा
और सभी कहीं-न-कहीं मशरूफ़ होंगे हर दिन की तरह
तुम्हारी साँसें धीमी पड़ने लगेंगी
आँखों के आगे अँधेरा छाने लगेगा
न कुछ सोच पाओगे, न चल पाओगे, न बोल पाओगे
तुम मन-ही-मन अपने ख़ुदा को याद करोगे
उससे मिन्नतें करोगे
कि अता कर दे वो तुम्हें थोड़ी सी और मोहलत
कि तुमने तो ज़िन्दगी अभी तक जी ही नहीं है
कि थोड़ा वक़्त मिले तो
कर लोगे वो सब जो करना चाहते थे पर कर न सके
थोड़ा वक़्त ताकि तुम ख़ुद के साथ बैठ सको
और अपनी तरह से जीना सीख सको
ताकि ख़्वाबों को फिर ज़िंदा कर सको
और उन ख़्वाबों को जी सको
पर इतने में साँसें रुक जाएँगी
आँखों की पलकें हिला न सकोगे
ज़िन्दगी का दामन हाथों से छूट जाएगा
और तुम इस जहां से चले जा चुके होगे
अच्छा मान लो
कि ये बस बुरा सा एक ख़्वाब ही था
और इसे देख कर तुम नींद से जग पड़े थे
फिर समझ लो कि ख़ुदा ने सुन ली है तुम्हारी
थोड़ी मोहलत और मिल गयी है तुम्हें
तो क्या कल का सबेरा नया होगा ?
क्या तुम दिल की सुनोगे कल, रुक जाओगे ?
या फिर वही होगा जो होता आया है आज तक ?
चलो, तुम्हीं पर छोड़ देता हूँ
और इसे देख कर तुम नींद से जग पड़े थे
फिर समझ लो कि ख़ुदा ने सुन ली है तुम्हारी
थोड़ी मोहलत और मिल गयी है तुम्हें
तो क्या कल का सबेरा नया होगा ?
क्या तुम दिल की सुनोगे कल, रुक जाओगे ?
या फिर वही होगा जो होता आया है आज तक ?
चलो, तुम्हीं पर छोड़ देता हूँ
अंतिम लक्ष्य
मेरा अंतिम लक्ष्य
न कोई उत्सव
न ही सन्नाटा
न चुनौतियाँ
न उन पे विजय
न ही मृत्यु
और न मृत्यु पे विजय
न ऐश्वर्य
न ही वैराग्य
मेरा अंतिम लक्ष्य
शून्य
मन की वो स्थिति
जहाँ कोई लक्ष्य नहीं
न भय, न मोह
आशा न निराशा
न विजय की लालसा
न पराजय का भय
न अपूरित कामनाएँ
न नवीन स्वप्न
न कहीं होने की चाह
न कुछ बनने की, न बनाने की
किसी से कोई उम्मीद नहीं
न मंज़िल कोई, न राहों का छलावा
चढ़ने को न कोई सोपान
न विजित होने को कोई शिखर
बस आकाश एक विस्तृत असीमित
शांति और संतोष से प्रकाशित
न कोई उत्सव
न ही सन्नाटा
न चुनौतियाँ
न उन पे विजय
न ही मृत्यु
और न मृत्यु पे विजय
न ऐश्वर्य
न ही वैराग्य
मेरा अंतिम लक्ष्य
शून्य
मन की वो स्थिति
जहाँ कोई लक्ष्य नहीं
न भय, न मोह
आशा न निराशा
न विजय की लालसा
न पराजय का भय
न अपूरित कामनाएँ
न नवीन स्वप्न
न कहीं होने की चाह
न कुछ बनने की, न बनाने की
किसी से कोई उम्मीद नहीं
न मंज़िल कोई, न राहों का छलावा
चढ़ने को न कोई सोपान
न विजित होने को कोई शिखर
बस आकाश एक विस्तृत असीमित
शांति और संतोष से प्रकाशित
स्वयं में एक विश्वास कि
परिस्थितियाँ, अनुकूल या प्रतिकूल
लहरों की भाँति आएँ और चली जाएँ
और मैं रहूँ तटस्थ
न अचंभित, न विचलित
अपने में होकर पूर्णतः स्थित
बस शून्य में मिलकर
ऐसे एक हो जाऊँ
कि मैं का अवशेष न रहे
बहता रहूँ
जीवन की धार बहती रहे
अबाध मैं भी संग बहूँ
बाधाएँ न थाम सकें
किसी के रोके से ना रुकूँ
पाषाणों से टकराऊँ
राहों में जो मिले खड़े
कंठों में उतरूँ ऐसे
फिर कोई प्यासा न रहे
पर्वत पे हूँ उत्श्रृंखल
विनय का परन्तु भाव रहे
बस्तियों से जब निकलूँ
मर्यादित मदिर प्रवाह रहे
ढलानों में सिमट जाऊँ
मैदानों में फैलाव मिले
समर्पण सागर में अंतिम
फिर न कोई चाह रहे
अबाध मैं भी संग बहूँ
बाधाएँ न थाम सकें
किसी के रोके से ना रुकूँ
पाषाणों से टकराऊँ
राहों में जो मिले खड़े
कंठों में उतरूँ ऐसे
फिर कोई प्यासा न रहे
पर्वत पे हूँ उत्श्रृंखल
विनय का परन्तु भाव रहे
बस्तियों से जब निकलूँ
मर्यादित मदिर प्रवाह रहे
ढलानों में सिमट जाऊँ
मैदानों में फैलाव मिले
समर्पण सागर में अंतिम
फिर न कोई चाह रहे
ऑफिस में एक आफ्टर-नून
उस आफ्टर-नून
जब अचानक मौसम
बदल सा गया था
फ्लोर पे एक कॉर्नर में
टेबल पर रखे लैपटॉप से
दो थकी आँखें निकलीं
और धीरे-धीरे
गिलास-विण्डो से
बाहर चलकर
आसमां में
तैरते बादलों के टुकड़ों पर
जाकर टिक गयीं
चेयर पे आगे-पीछे होते
उस इंसान को
वो नज़्म याद आ गई
जो कल रात
मुकम्मल होने से
पहले ही सो गई थी
और जिसे वो
घर पर ही छोड़ कर
सुबह-सुबह ऑफिस
आ गया था
फिर घड़ी पर
उसकी नज़रें गईं
और एक आह सी
निकल गई
अपनी अधूरी नज़्म से
मिलने के लिए
उसे अभी भी
कुछ घंटों का
इंतज़ार करना था
जब अचानक मौसम
बदल सा गया था
फ्लोर पे एक कॉर्नर में
टेबल पर रखे लैपटॉप से
दो थकी आँखें निकलीं
और धीरे-धीरे
गिलास-विण्डो से
बाहर चलकर
आसमां में
तैरते बादलों के टुकड़ों पर
जाकर टिक गयीं
चेयर पे आगे-पीछे होते
उस इंसान को
वो नज़्म याद आ गई
जो कल रात
मुकम्मल होने से
पहले ही सो गई थी
और जिसे वो
घर पर ही छोड़ कर
सुबह-सुबह ऑफिस
आ गया था
फिर घड़ी पर
उसकी नज़रें गईं
और एक आह सी
निकल गई
अपनी अधूरी नज़्म से
मिलने के लिए
उसे अभी भी
कुछ घंटों का
इंतज़ार करना था
बड़े शहर में
बना लिया एक बड़ा सा घर
बड़े से एक शहर में
अपनों से दूर हो गया
पर मैं इस चक्कर में
अपनों से दूर तो हुआ
ख़ुद से भी दूरी बढ़ी
ज़िन्दगी मेरी खुश थी पर
अपने पुराने घर में
वहाँ खुशियों का अम्बार था
संग पूरा परिवार था
हर पल था मस्ती का
हर दिन रविवार था
बड़े हुए विवश हुए
इधर-उधर बिखर गए
खो गया कहीं
वो जो सुकून था क़रार था
बड़े से एक शहर में
अपनों से दूर हो गया
पर मैं इस चक्कर में
अपनों से दूर तो हुआ
ख़ुद से भी दूरी बढ़ी
ज़िन्दगी मेरी खुश थी पर
अपने पुराने घर में
वहाँ खुशियों का अम्बार था
संग पूरा परिवार था
हर पल था मस्ती का
हर दिन रविवार था
बड़े हुए विवश हुए
इधर-उधर बिखर गए
खो गया कहीं
वो जो सुकून था क़रार था
बहता पानी
किसी बड़े
5-स्टार होटल के
रूफ़-टॉप
स्विमिंग पूल का
पानी होने से बेहतर
मैं पसंद करूँगा
कहीं
एक छोटे से
देहात में
एक छोटी सी नदी का
बहता पानी बन जाना
5-स्टार होटल के
रूफ़-टॉप
स्विमिंग पूल का
पानी होने से बेहतर
मैं पसंद करूँगा
कहीं
एक छोटे से
देहात में
एक छोटी सी नदी का
बहता पानी बन जाना
तुम मुझे मिली
तुम मुझे मिली, मुझको ज़िन्दगी मिली
दूर ग़म हुए, हर ख़ुशी मिली
बादलों से चाँदनी खिली
बेनूर आँखों को रौशनी मिली
जो भी मिला वो हँस के मिला
हर शै से मेरी दोस्ती हुई
मैं और ही कहीं का हो के रह गया
तुम भी कहीं और ही चली
तू मुझमें गुम हुई, मैं तुझमे गम हुआ
चैन भी गया, होश भी गुम हुआ
मेरी धड़कनों में तुम खो गई
तेरी साँसों में मैं गुम हुआ
ख़ुदा से तुझे मैंने माँगा है
ज़िन्दगी मेरी गुलज़ार हो गई
बागों में फूल खिल गए
फ़िजा भी खुशगवार हो गई
हाथों में तेरा हाथ अब लिए
राहों में साथ साथ चल दिए
तेरी हिम्मत से हौसला मिला
शूल भी राह के फूल बन गए
दूर ग़म हुए, हर ख़ुशी मिली
बादलों से चाँदनी खिली
बेनूर आँखों को रौशनी मिली
जो भी मिला वो हँस के मिला
हर शै से मेरी दोस्ती हुई
मैं और ही कहीं का हो के रह गया
तुम भी कहीं और ही चली
तू मुझमें गुम हुई, मैं तुझमे गम हुआ
चैन भी गया, होश भी गुम हुआ
मेरी धड़कनों में तुम खो गई
तेरी साँसों में मैं गुम हुआ
ख़ुदा से तुझे मैंने माँगा है
ज़िन्दगी मेरी गुलज़ार हो गई
बागों में फूल खिल गए
फ़िजा भी खुशगवार हो गई
हाथों में तेरा हाथ अब लिए
राहों में साथ साथ चल दिए
तेरी हिम्मत से हौसला मिला
शूल भी राह के फूल बन गए
हिंदी, तुम कहाँ हो !
सूर के पदों में
या तुलसी के चौपाईयों में
रहीम, कबीर, बिहारी के दोहों में
दिनकर, निराला, गुप्त, प्रसाद या
बच्चन की कविताओं में
हिंदी, तुझे ढूँढूँ कहाँ !
संदेह से घिर उठता हूँ
जब तेरे इतने रूपों में
तुझे देखता हूँ
दूरदर्शन की चर्चाओं में
या बॉलीवुड की सीमाओं में
या फिर राह चलते
आम हिंदुस्तानी की जुबां पे
हिंदी, तुम कहाँ हो !
क्या तुम ग़ज़लों में नहीं ?
क्या तुम नज़्मों में नहीं ?
तुम नहीं तो कौन है फिर !
तुम स्टेशन में नहीं ?
ट्रेन में भी नहीं ?
कमरे, कुर्सी, बाल्टी में भी नहीं ?
बनारस की जुबान हो
या लखनऊ, दिल्ली या मुंबई की ?
भय में हो पर ख़ौफ़ में नहीं ?
आकाश में पर फलक़ में नहीं ?
चंद्र में तुम, महताब में नहीं ?
सूर्य में तुम, ख़ुर्शीदो-आफ़ताब में नहीं ?
पाठ्य-पुस्तकों में तुम भिन्न हो
दिन-भर की बातचीत में रंग कुछ और है
समाचार पत्रों में कुछ और ही
माना तुम मीर की नहीं, ग़ालिब की नहीं
पर तुम्हें क्या कबीर की कहूँ ?
सूर और तुलसी की ?
और गुलज़ार की भी ?
या फिर सिर्फ पंत, निराला, प्रसाद,
दिनकर, गुप्त और बच्चन की ?
तुम गंगा हो
निश्चय ही इस राष्ट्र की पहचान हो
संस्कृत के हिमालय से निकली
मैदानों में बह चली
कई नदियाँ तुझसे जुड़ीं
और कई तुझसे निकलीं
समा लिया तुमने सबको
समभाव से
सबको साथ लेकर
निरंतर बहती जा रही हो
तेरे पानी के रंग कई
पर सबमे है
वही मिठास
और एक समान ही
बुझाती हो तुम
हर प्यासे की प्यास
तेरी मूल धारा में
अन्य धाराओं का समावेश
और सबका सामंजस्य
ही तुझको महान बनाता है
देश की संस्कृति की तरह ही
या तुलसी के चौपाईयों में
रहीम, कबीर, बिहारी के दोहों में
दिनकर, निराला, गुप्त, प्रसाद या
बच्चन की कविताओं में
हिंदी, तुझे ढूँढूँ कहाँ !
संदेह से घिर उठता हूँ
जब तेरे इतने रूपों में
तुझे देखता हूँ
दूरदर्शन की चर्चाओं में
या बॉलीवुड की सीमाओं में
या फिर राह चलते
आम हिंदुस्तानी की जुबां पे
हिंदी, तुम कहाँ हो !
क्या तुम ग़ज़लों में नहीं ?
क्या तुम नज़्मों में नहीं ?
तुम नहीं तो कौन है फिर !
तुम स्टेशन में नहीं ?
ट्रेन में भी नहीं ?
कमरे, कुर्सी, बाल्टी में भी नहीं ?
बनारस की जुबान हो
या लखनऊ, दिल्ली या मुंबई की ?
भय में हो पर ख़ौफ़ में नहीं ?
आकाश में पर फलक़ में नहीं ?
चंद्र में तुम, महताब में नहीं ?
सूर्य में तुम, ख़ुर्शीदो-आफ़ताब में नहीं ?
पाठ्य-पुस्तकों में तुम भिन्न हो
दिन-भर की बातचीत में रंग कुछ और है
समाचार पत्रों में कुछ और ही
माना तुम मीर की नहीं, ग़ालिब की नहीं
पर तुम्हें क्या कबीर की कहूँ ?
सूर और तुलसी की ?
और गुलज़ार की भी ?
या फिर सिर्फ पंत, निराला, प्रसाद,
दिनकर, गुप्त और बच्चन की ?
तुम गंगा हो
निश्चय ही इस राष्ट्र की पहचान हो
संस्कृत के हिमालय से निकली
मैदानों में बह चली
कई नदियाँ तुझसे जुड़ीं
और कई तुझसे निकलीं
समा लिया तुमने सबको
समभाव से
सबको साथ लेकर
निरंतर बहती जा रही हो
तेरे पानी के रंग कई
पर सबमे है
वही मिठास
और एक समान ही
बुझाती हो तुम
हर प्यासे की प्यास
तेरी मूल धारा में
अन्य धाराओं का समावेश
और सबका सामंजस्य
ही तुझको महान बनाता है
देश की संस्कृति की तरह ही
बाबाजी बाबाजी
गिर कर उठ कर
अटक भटक कर
दर पर आ गया
घर पर आ गया
लायक बना दो मुझे
कि देख पाऊँ तुझे
दूजा अब कोई काम नहीं
तेरे सिवा कोई नाम नहीं
जिस हाल रखोगे रहूँगा
ले जाओगे जहाँ जाऊँगा
जो चाहा वो तो दे दिया
क्या रहा जो मांगूँगा
परम पिता तो तुम्हीं हो
बालक दास तुम्हारा मैं
चरणों से दूर मत करना
तुम बिन जी न पाउँगा
तेरी धार में अब बहता फिरूँ
बाबाजी बाबाजी कहता फिरूँ
अटक भटक कर
दर पर आ गया
घर पर आ गया
लायक बना दो मुझे
कि देख पाऊँ तुझे
दूजा अब कोई काम नहीं
तेरे सिवा कोई नाम नहीं
जिस हाल रखोगे रहूँगा
ले जाओगे जहाँ जाऊँगा
जो चाहा वो तो दे दिया
क्या रहा जो मांगूँगा
परम पिता तो तुम्हीं हो
बालक दास तुम्हारा मैं
चरणों से दूर मत करना
तुम बिन जी न पाउँगा
तेरी धार में अब बहता फिरूँ
बाबाजी बाबाजी कहता फिरूँ
मेरे राघव मेरे राम
ओ मेरे राघव मेरे राम
जीवन मेरा तेरे नाम
बस इतना कह दो मुझसे
आऊँ कैसे मैं तेरे काम
तेरी राह पे चलते चलते
पा जाऊँगा अपना मुक़ाम
चरणों में रहने दो मुझे
दुःख चाहे दे दो तमाम
फिसल जाऊँ जब दुनिया में
बाहें मेरी तू लेना थाम
स्लोप पर हूँ
मैं कहाँ हूँ !
किस राह से
किधर जा रहा हूँ !
कोई खींचता है मुझे
तो कोई फेंकता है
तो कोई धकेलता है
एक स्लोप पर हूँ
जाने मैं कब से
ख़ुद से तो अब
रुक पाना मुमकिन नहीं
किस राह से
किधर जा रहा हूँ !
कोई खींचता है मुझे
तो कोई फेंकता है
तो कोई धकेलता है
एक स्लोप पर हूँ
जाने मैं कब से
ख़ुद से तो अब
रुक पाना मुमकिन नहीं
ख़ुदा के घर चलो
ज़िन्दगी कहीं मुड़ी
मैं कहीं और मुड़ गया
ख़ुद से ही बिछड़ गया
दुनिया से जब जुड़ गया
किस ओर मुड़ूँ मैं
किस ओर चलूँ मैं
है प्रश्न वही फिर
सामने मेरे खड़ा
ये मेरी आँखों का धुँआ है
या चराग बुझ रहे कहीं
चलो ख़ुदा के घर चलो
बाहर तंग अँधेरा है
मैं कहीं और मुड़ गया
ख़ुद से ही बिछड़ गया
दुनिया से जब जुड़ गया
किस ओर मुड़ूँ मैं
किस ओर चलूँ मैं
है प्रश्न वही फिर
सामने मेरे खड़ा
ये मेरी आँखों का धुँआ है
या चराग बुझ रहे कहीं
चलो ख़ुदा के घर चलो
बाहर तंग अँधेरा है
क्या कहूँ !
तुम से दिल की बात क्या कहूँ !
कैसे हैं मेरे जज़्बात, क्या कहूँ !
मुद्दत बाद मिले हो तुम
यहाँ कैसे थे हालात, क्या कहूँ !
कैसे तेरे आने की आस में
कटे न दिन रात, क्या कहूँ !
मौसम आते जाते हैं पर
थमते न बरसात क्या कहूँ !
वादे तेरे, तेरी कसमें
हैं बस बीती बात, क्या कहूँ !
कैसे हैं मेरे जज़्बात, क्या कहूँ !
मुद्दत बाद मिले हो तुम
यहाँ कैसे थे हालात, क्या कहूँ !
कैसे तेरे आने की आस में
कटे न दिन रात, क्या कहूँ !
मौसम आते जाते हैं पर
थमते न बरसात क्या कहूँ !
वादे तेरे, तेरी कसमें
हैं बस बीती बात, क्या कहूँ !
उलझन
दिल को समझाता हूँ
ख़ुद को बहलाता हूँ
मंज़िल तक नज़र नहीं
लेकिन चलता जाता हूँ
आँखों में धुँआ सा है
रस्ता भी सूना सा है
मन क्या ढूँढ़ रहा है
कुछ नहीं अपना सा है
सफ़र ये जो ज़िन्दगी है
कब से भरमा रही है
किस ज़ानिब मुझे जाना है
कहाँ ले के जा रही है
ख़ुद को बहलाता हूँ
मंज़िल तक नज़र नहीं
लेकिन चलता जाता हूँ
आँखों में धुँआ सा है
रस्ता भी सूना सा है
मन क्या ढूँढ़ रहा है
कुछ नहीं अपना सा है
सफ़र ये जो ज़िन्दगी है
कब से भरमा रही है
किस ज़ानिब मुझे जाना है
कहाँ ले के जा रही है
सफ़र जो थोड़ा मुश्किल लगे
बैठ गया क्यों हार कर
राही तू यूँ राहगुजर पर
चल उठ कुछ ईरादा कर
नज़र कर अपनी मंज़िल पर
कदम क्यों तेरे डगमगाए
चाहे लाख मुसीबतें आएं
संदेह के बादल मंडराएं
आत्म-विश्वास कम न हो पाए
राह जो आगे बंद मिले
चिंता क्यों मन में पले
दुगुने कर ले हौसले
बंद सारी राहें खुलें
सफ़र जो थोड़ा मुश्किल लगे
बुझा-बुझा क्यों दिल लगे
मौजें जो क़ातिल लगें
और दूर तुझसे साहिल लगे
ख़ुद से कर ले अब फैसला
कम न होगा कभी हौसला
चलता रहे चाहे अकेला
या संग चले कोई काफ़िला
राही तू यूँ राहगुजर पर
चल उठ कुछ ईरादा कर
नज़र कर अपनी मंज़िल पर
कदम क्यों तेरे डगमगाए
चाहे लाख मुसीबतें आएं
संदेह के बादल मंडराएं
आत्म-विश्वास कम न हो पाए
राह जो आगे बंद मिले
चिंता क्यों मन में पले
दुगुने कर ले हौसले
बंद सारी राहें खुलें
सफ़र जो थोड़ा मुश्किल लगे
बुझा-बुझा क्यों दिल लगे
मौजें जो क़ातिल लगें
और दूर तुझसे साहिल लगे
ख़ुद से कर ले अब फैसला
कम न होगा कभी हौसला
चलता रहे चाहे अकेला
या संग चले कोई काफ़िला
ख़ुद को बना हमसफ़र
ख़ुद से भाग कर कहाँ जाएगा मुसाफ़िर
तन्हाईयों में तू वापस आएगा मुसाफ़िर
यहाँ जो चैन है, सुकुनो-क़रार है
भटकेगा कहाँ ऐ बेक़रार मुसाफ़िर
थक-हार कर सफ़र में बैठेगा जब कभी
ये डगर तुमको याद आएँगे मुसाफ़िर
काफ़िले निकल जाएँगे साथ तेरा छोड़कर
बस एक यही रिश्ता रह जाएगा मुसाफ़िर
गरम रेत पर कब तक चल पाएगा अकेला
ख़ुद को बना ले अपना हमसफ़र मुसाफ़िर
तन्हाईयों में तू वापस आएगा मुसाफ़िर
यहाँ जो चैन है, सुकुनो-क़रार है
भटकेगा कहाँ ऐ बेक़रार मुसाफ़िर
थक-हार कर सफ़र में बैठेगा जब कभी
ये डगर तुमको याद आएँगे मुसाफ़िर
काफ़िले निकल जाएँगे साथ तेरा छोड़कर
बस एक यही रिश्ता रह जाएगा मुसाफ़िर
गरम रेत पर कब तक चल पाएगा अकेला
ख़ुद को बना ले अपना हमसफ़र मुसाफ़िर
एक साल और बीता
जीवन का एक साल और बीत गया
वक़्त मेरी लम्बी कर अतीत गया
संघर्ष का क्रम मगर जारी रहा
धूप-छाँव में द्वंद्व भारी रहा
पाने-खोने का चलता रहा सिलसिला
मौसम बदलते रहे रुका नहीं काफ़िला
सफ़र का ये पड़ाव भी निकल गया
एक और दरिया सागर से मिल गया
रुख़सार से नक़ाब थोड़ा और हट गया
साया ज़िन्दगी का कुछ और सिमट गया
वाक़िफ़ी इससे थोड़ी और पुरानी हो गई
राहें कुछ और अपनी पहचानी हो गईं
भँवर मगर और गहराता चला गया
ख़ुद को मैं और कमजोर पाता चला गया
जीत-हार से ख़ुद को ऊपर उठाता चला गया
मैं जीवन का साथ बस निभाता चला गया
अपने दामन में अब यादें भर रहा हूँ
आगे सफ़र की अभी तैयारी कर रहा हूँ
अभी ऐसे जाने कितने और मुक़ाम आएँगे
हर बार हम यूँ ही आज़माये जाएँगे
वक़्त मेरी लम्बी कर अतीत गया
संघर्ष का क्रम मगर जारी रहा
धूप-छाँव में द्वंद्व भारी रहा
पाने-खोने का चलता रहा सिलसिला
मौसम बदलते रहे रुका नहीं काफ़िला
सफ़र का ये पड़ाव भी निकल गया
एक और दरिया सागर से मिल गया
रुख़सार से नक़ाब थोड़ा और हट गया
साया ज़िन्दगी का कुछ और सिमट गया
वाक़िफ़ी इससे थोड़ी और पुरानी हो गई
राहें कुछ और अपनी पहचानी हो गईं
भँवर मगर और गहराता चला गया
ख़ुद को मैं और कमजोर पाता चला गया
जीत-हार से ख़ुद को ऊपर उठाता चला गया
मैं जीवन का साथ बस निभाता चला गया
अपने दामन में अब यादें भर रहा हूँ
आगे सफ़र की अभी तैयारी कर रहा हूँ
अभी ऐसे जाने कितने और मुक़ाम आएँगे
हर बार हम यूँ ही आज़माये जाएँगे
ज़िन्दगी थोड़ी मुझे भी चाहिए
इस शहर में अगर ज़िन्दगी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
बाँकी हवाओं में गर ताजगी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
दौर ये तूफां का है, चराग बुझे हुए हैं सारे
आज सितारों में गर रौशनी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
हर तरफ शोर कितना, चीखों की आवाज़ें हैं
बची कहीं गर खामोशी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
सहरे की धूप में चल चल कर थक चुका हूँ
कहीं बादलों में गर नमी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
बाँकी हवाओं में गर ताजगी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
दौर ये तूफां का है, चराग बुझे हुए हैं सारे
आज सितारों में गर रौशनी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
हर तरफ शोर कितना, चीखों की आवाज़ें हैं
बची कहीं गर खामोशी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
सहरे की धूप में चल चल कर थक चुका हूँ
कहीं बादलों में गर नमी है तो थोड़ी मुझे भी चाहिए
चलते रहना है
बैठ गए यूँ ही थोड़ा सा लेने को दम
पिछड़ गए हैं माना, पर हारे नहीं हैं हम
चलते चलते राहों में थोड़े भटक से गए
मुड़ जाएँगे फिर से सही दिशा में कदम
हौसला है पा लेंगे मंज़िल को एक दिन
बदल जाने दो अगर बदलते हैं मौसम
पड़ाव को सफ़र की इंतेहा समझ बैठे
हरियाली देख हो गए थे थोड़े खुशफ़हम
चलो चलें फिर से कि काफ़िला चल पड़ा
शबो-दिन चलना है मुसाफ़िर का करम
पिछड़ गए हैं माना, पर हारे नहीं हैं हम
चलते चलते राहों में थोड़े भटक से गए
मुड़ जाएँगे फिर से सही दिशा में कदम
हौसला है पा लेंगे मंज़िल को एक दिन
बदल जाने दो अगर बदलते हैं मौसम
पड़ाव को सफ़र की इंतेहा समझ बैठे
हरियाली देख हो गए थे थोड़े खुशफ़हम
चलो चलें फिर से कि काफ़िला चल पड़ा
शबो-दिन चलना है मुसाफ़िर का करम
मौला मेरी अरज़ सुनो
एक नियाज़ी की गुहार पर
मौला अब न इंकार कर
मत फेर नज़रें इधर से
कब से खड़ा तेरे द्वार पर
छोटी सी एक फ़रियाद है
दुखियारे मन की आस है
एक तेरा दामन मेहफ़ूज़
बस तेरा ही विश्वास है
बन्दे को अब ना निराश कर
जी रहा हूँ तेरी आस पर
तेरा ही नाम बसा है मौला
मेरी एक-एक साँस पर
मौला अब न इंकार कर
मत फेर नज़रें इधर से
कब से खड़ा तेरे द्वार पर
छोटी सी एक फ़रियाद है
दुखियारे मन की आस है
एक तेरा दामन मेहफ़ूज़
बस तेरा ही विश्वास है
बन्दे को अब ना निराश कर
जी रहा हूँ तेरी आस पर
तेरा ही नाम बसा है मौला
मेरी एक-एक साँस पर
तुम हताश क्यों होते हो ?
उठो और चलो
तुम हताश क्यों होते हो ?
दुःख तोआएँगे ही
इन्हें देख क्यों रोते हो ?
जब तक कि ये सफ़र है
ज़िन्दगी की राहगुज़र है
सफ़र में धूप तो रहेगी
साये को सर पे न पाकर
तुम उदास क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
जब तक कि ये मेला है
सुख-दुःख का रेला है
जान कि तू अकेला है
हाथों से हाथ छूटेंगे ही
राहों में साथ छूटेंगे ही
आज जो तेरे संग हैं
कल तुमसे रूठेंगे ही
जो कोई आज रूठा तो
तुम निराश क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
दुःख तोआएँगे ही
इन्हें देख क्यों रोते हो ?
जब तक कि ये सफ़र है
ज़िन्दगी की राहगुज़र है
सफ़र में धूप तो रहेगी
साये को सर पे न पाकर
तुम उदास क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
जब तक कि ये मेला है
सुख-दुःख का रेला है
जान कि तू अकेला है
हाथों से हाथ छूटेंगे ही
राहों में साथ छूटेंगे ही
आज जो तेरे संग हैं
कल तुमसे रूठेंगे ही
जो कोई आज रूठा तो
तुम निराश क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
तुम हताश क्यों होते हो ?
दौड़ चुके हो बहुत, अब सुनो
दौड़ो, भागो, थको
और थक के सो जाओ
उठो, फिर दौड़ो, थको
और फिर सो जाओ
फिर उठो, दौड़ो, थको
और सो जाओ
कब से होता आ रहा है !
कब तक होता रहेगा ?
तेरी मंज़िल जब तक है बाहर
तब तक होता रहेगा
चाहते हो जो तुम
सुख सारे बटोर कर
रेत को मुठ्ठी में भर
सब हासिल कर लेना
पर ज़िन्दगी दुखों के सिवा कुछ भी नहीं
रेत भी हाथों से फिसल ही जाती
हासिल कुछ होता नहीं
जमा कुछ भी रहता नहीं
दौड़ चुके हो बहुत, अब सुनो
थम जाओ, समझो, जान लो
जिस दिशा में भाग रहे थे
उसे उल्टी कर लो
साँसों की डोर थाम
अंदर की ओर चलो
जागो एक बार ऐसे
की फिर सोना न पड़े
और थक के सो जाओ
उठो, फिर दौड़ो, थको
और फिर सो जाओ
फिर उठो, दौड़ो, थको
और सो जाओ
कब से होता आ रहा है !
कब तक होता रहेगा ?
तेरी मंज़िल जब तक है बाहर
तब तक होता रहेगा
चाहते हो जो तुम
सुख सारे बटोर कर
रेत को मुठ्ठी में भर
सब हासिल कर लेना
पर ज़िन्दगी दुखों के सिवा कुछ भी नहीं
रेत भी हाथों से फिसल ही जाती
हासिल कुछ होता नहीं
जमा कुछ भी रहता नहीं
दौड़ चुके हो बहुत, अब सुनो
थम जाओ, समझो, जान लो
जिस दिशा में भाग रहे थे
उसे उल्टी कर लो
साँसों की डोर थाम
अंदर की ओर चलो
जागो एक बार ऐसे
की फिर सोना न पड़े
क्या ढूंढ रहा हूँ मैं !
मुड़ के देखता हूँ राहों को जिनपे यहाँ तक चल आया हूँ
क्या था जिसकी खोज में इतनी दूर निकल आया हूँ
कुछ हुआ भी हासिल तो अगले ही क्षण खो दिया उसे
पा कर जिसे थम जाऊँगा, वो शै कहाँ ढूंढ पाया हूँ
मैं धरा से गगन तक नहीं उड़ जाना चाहता था
नदी था, मैं बस समंदर तक बह जाना चाहता था
मेरे लिए भी आसान था सब छोड़ कहीं चले जाना
पर संघर्षमय रहकर ही मैं सत्य को पाना चाहता था
सत्य की गठरी छिपी नहीं हिमालय की गुफाओं में
न गंगा की डुबकियों में, न साधुओं की जटाओं में
मंदिरों में बंद नहीं ये, यही है बाहर खुली हवाओं में
यही मेरे मन में, ह्रदय में, धमनियों में, शिराओं में
पर जन्मों की तृष्णा में डूबा, पार अब जाने कब लगूँ
चिर-निद्रा में सोया हुआ, मैं क्या जाने अब कब जगूँ
क्या था जिसकी खोज में इतनी दूर निकल आया हूँ
कुछ हुआ भी हासिल तो अगले ही क्षण खो दिया उसे
पा कर जिसे थम जाऊँगा, वो शै कहाँ ढूंढ पाया हूँ
मैं धरा से गगन तक नहीं उड़ जाना चाहता था
नदी था, मैं बस समंदर तक बह जाना चाहता था
मेरे लिए भी आसान था सब छोड़ कहीं चले जाना
पर संघर्षमय रहकर ही मैं सत्य को पाना चाहता था
सत्य की गठरी छिपी नहीं हिमालय की गुफाओं में
न गंगा की डुबकियों में, न साधुओं की जटाओं में
मंदिरों में बंद नहीं ये, यही है बाहर खुली हवाओं में
यही मेरे मन में, ह्रदय में, धमनियों में, शिराओं में
पर जन्मों की तृष्णा में डूबा, पार अब जाने कब लगूँ
चिर-निद्रा में सोया हुआ, मैं क्या जाने अब कब जगूँ
कविता जिसे मैं जानता था
क्या हो गया उस कविता को
जिसे मैं जानता था
कैसे बदल गयी वो !
वो सजती सँवरती थी
इठला कर चलती थी
शोख़ थी वो, उसमें चंचलता थी
दिल के हिमालय से पिघलकर
बड़ी रवानी से बहती थी
मृतप्राय हो चुकी है शायद
अस्तित्व खो रही है अपना
किसी विलुप्त प्राणी की तरह
अभी जिसे मैं देखता हूँ
जिसने उसके नाम का
बस मुखौटा पहन रखा है
हमशकल है उसी की
मगर उसमें वो लोच नहीं,
उसमें वो रवानी नहीं
दिलों तक वो पहुँचती नहीं
न वो अंतर के द्वंद्व पे
कुछ कहती है
न दर्द किसी का ढोती है
न ही माशूक़ से
मोहब्बत की बात करती है
न आत्मा की परमात्मा से मिलन की
हाँ इन सब की जगह
मुद्दों ने ली है
बिकुल एक श्वेत-श्याम
अख़बार की तरह
जिसमें जीवन का कोई रंग नहीं
जो न दिल से निकलती है
न दिल तक पहुँचती है
उम्मीद छोड़ दूँ क्या मैं
या वो आएगी वापस ?
कविता जिसे मैं जानता था
क्या हो गया उसे !
कैसे बदल गयी वो !
जिसे मैं जानता था
कैसे बदल गयी वो !
वो सजती सँवरती थी
इठला कर चलती थी
शोख़ थी वो, उसमें चंचलता थी
दिल के हिमालय से पिघलकर
बड़ी रवानी से बहती थी
मृतप्राय हो चुकी है शायद
अस्तित्व खो रही है अपना
किसी विलुप्त प्राणी की तरह
अभी जिसे मैं देखता हूँ
जिसने उसके नाम का
बस मुखौटा पहन रखा है
हमशकल है उसी की
मगर उसमें वो लोच नहीं,
उसमें वो रवानी नहीं
दिलों तक वो पहुँचती नहीं
न वो अंतर के द्वंद्व पे
कुछ कहती है
न दर्द किसी का ढोती है
न ही माशूक़ से
मोहब्बत की बात करती है
न आत्मा की परमात्मा से मिलन की
हाँ इन सब की जगह
मुद्दों ने ली है
बिकुल एक श्वेत-श्याम
अख़बार की तरह
जिसमें जीवन का कोई रंग नहीं
जो न दिल से निकलती है
न दिल तक पहुँचती है
उम्मीद छोड़ दूँ क्या मैं
या वो आएगी वापस ?
कविता जिसे मैं जानता था
क्या हो गया उसे !
कैसे बदल गयी वो !
ख़्वाब तुम्हारा
दीवारें गिरेंगी
तो फ़ासले मिटेंगे
दिल मिलेंगे
हाथ मिलेंगे
क़दम एक साथ उठेंगे
फिर सफ़र कितना भी मुश्किल क्यों न हो
दूर कितनी भी मंज़िल क्यों न हो
चलेंगें जब साथ राहों में
तो होंगीं कम दूरियाँ
आसां होंगीं मुश्किलें
हासिल होंगीं मंज़िलें
एक के बाद एक
फिर पाने को होगा
बस आसमान
ये ख़्वाब जो तुमने देखा है
यक़ीन मानो
मुक़म्मल होगा एक दिन
तो फ़ासले मिटेंगे
दिल मिलेंगे
हाथ मिलेंगे
क़दम एक साथ उठेंगे
फिर सफ़र कितना भी मुश्किल क्यों न हो
दूर कितनी भी मंज़िल क्यों न हो
चलेंगें जब साथ राहों में
तो होंगीं कम दूरियाँ
आसां होंगीं मुश्किलें
हासिल होंगीं मंज़िलें
एक के बाद एक
फिर पाने को होगा
बस आसमान
ये ख़्वाब जो तुमने देखा है
यक़ीन मानो
मुक़म्मल होगा एक दिन
अब नहीं होता
डर कर जीवन अब और नहीं होता
बुलशिट सहन अब और नहीं होता
सपने हैं कई बंद इक बक्से में
ये बोझ वहन अब और नहीं होता
ये कहें ऐसा कर लो अच्छा होगा
वो कहें वैसा कर लो अच्छा होगा
मन चाहता है कुछ और ही करना
पूछ कर चयन अब और नहीं होता
गुस्सा छुपा के है रखना सीखा
सब को बस खुश रखना सीखा
पर जो अंदर है अब वही हो बाहर
झूठ प्रदर्शन अब और नहीं होता
जीकर इतना तो हमने जाना
पाना-खोना बस अफसाना
मिल जाए तो अच्छा, पाने को पर
चंचल मन अब और नहीं होता
बुलशिट सहन अब और नहीं होता
सपने हैं कई बंद इक बक्से में
ये बोझ वहन अब और नहीं होता
ये कहें ऐसा कर लो अच्छा होगा
वो कहें वैसा कर लो अच्छा होगा
मन चाहता है कुछ और ही करना
पूछ कर चयन अब और नहीं होता
गुस्सा छुपा के है रखना सीखा
सब को बस खुश रखना सीखा
पर जो अंदर है अब वही हो बाहर
झूठ प्रदर्शन अब और नहीं होता
जीकर इतना तो हमने जाना
पाना-खोना बस अफसाना
मिल जाए तो अच्छा, पाने को पर
चंचल मन अब और नहीं होता
ऐसे में
ये शाम भी उदास है
ठहरी-ठहरी साँस है
जाने किसकी आस है
कोई आस है न पास है
ऐसे में
तुमको जो बुला सकूँ
बुला के ये बता सकूँ
बता के ये जता सकूँ
कि तुमको न भुला सकूँ
ऐसे में
तुम यहाँ जो आ सको
दो पल संग बिता सको
कोई गीत गुनगुना सको
हँसा सको मुझे रुला सको
ऐसे में
दिल को फिर यकीं हो
तुम हो यहीं कहीं हो
न शाम फिर उदास हो
न ये दिल ही ग़मगीं हो
ठहरी-ठहरी साँस है
जाने किसकी आस है
कोई आस है न पास है
ऐसे में
तुमको जो बुला सकूँ
बुला के ये बता सकूँ
बता के ये जता सकूँ
कि तुमको न भुला सकूँ
ऐसे में
तुम यहाँ जो आ सको
दो पल संग बिता सको
कोई गीत गुनगुना सको
हँसा सको मुझे रुला सको
ऐसे में
दिल को फिर यकीं हो
तुम हो यहीं कहीं हो
न शाम फिर उदास हो
न ये दिल ही ग़मगीं हो
मेरी शख़्सियत के
किसी हिस्से में
एक बर्क़ सी लहराती है
एक हसरत
कोई ख़्वाहिश, कोई आरज़ू
फिर शुरू होता है
एक सिलसिला
ख़यालों का, तस्सवुर का
सोच के समंदर में
मैं डूबता हूँ, उभरता हूँ
फिर जब इरादों का
साहिल मिल जाता है
तो उतरता हूँ ज़मीन पर
क़दम बढ़ाता हूँ
इब्तिदा होती है
एक सफ़र की
कोई सफ़र लम्बा होता है
तो कोई छोटा
कभी मंज़िल मिलती है
तो कभी नहीं
पर कमोबेश
यही सिलसिला होता है
जब भी मैं कुछ करता हूँ
पर इसका एक हिस्सा ही
ज़मीन के बाहर होता है
बड़ा हिस्सा तो मेरे ज़ेहन के
अंदर ही होता है
एक पेड़ की तरह ही
जिसकी जड़ें ज़मीन के
अंदर होती हैं
किसी-किसी पेड़ को
ज़मीन के बाहर आने में
ज्यादा वक़्त लगता है
तो कुछ जल्दी भी आ जाते हैं
किसी हिस्से में
एक बर्क़ सी लहराती है
एक हसरत
कोई ख़्वाहिश, कोई आरज़ू
फिर शुरू होता है
एक सिलसिला
ख़यालों का, तस्सवुर का
सोच के समंदर में
मैं डूबता हूँ, उभरता हूँ
फिर जब इरादों का
साहिल मिल जाता है
तो उतरता हूँ ज़मीन पर
क़दम बढ़ाता हूँ
इब्तिदा होती है
एक सफ़र की
कोई सफ़र लम्बा होता है
तो कोई छोटा
कभी मंज़िल मिलती है
तो कभी नहीं
पर कमोबेश
यही सिलसिला होता है
जब भी मैं कुछ करता हूँ
पर इसका एक हिस्सा ही
ज़मीन के बाहर होता है
बड़ा हिस्सा तो मेरे ज़ेहन के
अंदर ही होता है
एक पेड़ की तरह ही
जिसकी जड़ें ज़मीन के
अंदर होती हैं
किसी-किसी पेड़ को
ज़मीन के बाहर आने में
ज्यादा वक़्त लगता है
तो कुछ जल्दी भी आ जाते हैं
जानता हूँ जाना चाहता हूँ मैं किधर
जानता हूँ जाना चाहता हूँ मैं किधर
एक डर मगर रोकता है कदम अक्सर
सच है कि दिल में अफ़सोस होता है बहुत
अब भी कभी जब देखता हूँ पलटकर
आवाज़ देकर राहें बुलाया करती थीं
हर बार रुक जाते हम मोड़ पे आकर
इब्तिदा में मंज़िल कब साफ़ आती है नज़र
कोहरा हट ही जाता है चलते रहने से मगर
मुसाफ़िर हुआ यूँ भी सफ़र में अक्सर
राह ग़लत थी, जाना मंज़िल पे आकर
तुझे मैं जब भुला सकूँ !
दिल में वो प्रीत दे
मैं गीत गुनगुना सकूँ
ये इजाज़त भी दे
तुमको मैं सुना सकूँ
राहों में संग हो
चाहे जिस भी मोड़ तक
छोड़ना तभी मुझे
तुझे मैं जब भुला सकूँ
हो ये यकीं का रिश्ता
पक्का और कच्चा
तुम मुझे आज़मा सको
मैं तुझे आज़मा सकूँ
ख़्वाब तेरे हों जुदा
पर मुझे तुम बता सको
मुख़्तलिफ़ सोचूँ जो
तो मैं तुझे बता सकूँ
तुम मुझको थाम लो
मैं तुमको थाम लूँ
दूर हों न यूँ भी कभी
जो तुझे न मैं बुला सकूँ
दिल में वो प्रीत दे
मैं गीत गुनगुना सकूँ
ये इजाज़त भी दे
तुमको मैं सुना सकूँ
राहों में संग हो
चाहे जिस भी मोड़ तक
छोड़ना तभी मुझे
तुझे मैं जब भुला सकूँ
हो ये यकीं का रिश्ता
पक्का और कच्चा
तुम मुझे आज़मा सको
मैं तुझे आज़मा सकूँ
ख़्वाब तेरे हों जुदा
पर मुझे तुम बता सको
मुख़्तलिफ़ सोचूँ जो
तो मैं तुझे बता सकूँ
तुम मुझको थाम लो
मैं तुमको थाम लूँ
दूर हों न यूँ भी कभी
जो तुझे न मैं बुला सकूँ
करना या बस होना !
ज़िन्दगी एक जंग है
एक मुसलसल जंग
करने और होने के दरमियान
करना जो इंसान का फ़ुतूर
और होना उसका मुस्तक़बिल
करना जो होने नहीं देता
लेकिन होने तक का रास्ता
करने से ही होकर गुज़रता है
करना कभी बादल बनकर छाता है
होना कभी सूरज बनकर आता है
करना जैसे पहाड़ से निकल कर
समंदर तक दरिया का बहना
होना जैसे पहाड़ पे फैली बर्फ
और पसरे समंदर का पानी
करना जैसे क़ैदे-ज़ीस्त कोई
होना सारे ग़म से नजात जैसे
करना जैसे सीने में आग, सर पे जुनूँ
बेताबी, बेचैनी, छटपटाहट, जुस्तुजू
होना लेकिन जैसे इन सब का न होना
जैसे चांदनी रात, उस रात का सुकूँ
घास में ठहरी शबनम की बूँद
करना जैसे हो बिखर जाना
और होना जैसे सिमट जाना
करना जग को पाकर ख़ुद को खोना
होना ख़ुद में खोकर ख़ुद को पाना
करने का दायरा फैलता जाता
करने का, करते रहने का सिलसिला
चलता है, चलता ही रहता
जब तक कि ख़्वाहिशें हैं, आरज़ू हैं
इंसान कुछ करता है
उसके बाद कुछ और
और फिर कुछ और
पर तिश्नगी मिटती नहीं
बेताबी, बेचैनी कम होती नहीं
कुछ करना तो है ज़िंदा रहने की ख़ातिर
कुछ जिम्मेदारियों की ख़ातिर
पर कुछ करना ऐसा भी है कि जिन्हें
करने- न करने पर इख़्तियार है उसे
पर वो रुकता नहीं, सिलसिला थमता नहीं
जब तक कि ख़्वाहिशें हैं, आरज़ू हैं
पर करते रहने से मर जाता है होना
सच तो ये है कि न होने से
रुक पाएगा नहीं करने का सिलसिला
पर कुछ करने से ही पैदा होंगे
होने के इम्कान, ये भी सच है
तो करें हम सोच कर करने का इंतिख़ाब
ऐसे कि सिमट जाए करने का दायरा
और निकल आए होने का आफ़्ताब
छोटी होती जाए करने की ज़मीं
बड़ा होता जाए होने का आसमां
ग़ैर-जरुरी करना गिरें शाख से
सूखे हुए पत्तों की तरह
और होने में होकर ही इंसान
करे बस वो जो है जरुरी करना
और करने से हुआ है क्या
इंसान को हासिल ?
कुछ तबस्सुम, कुछ आँसू
खुशियाँ कुछ पा लेने की
ग़म कुछ खो देने का
और फिर आने वाले कल का ख़ौफ़
या उससे बेइन्तिहा उम्मीदें
और फिर उनके टूटने का ग़म
होना लेकिन है अभी इसी पल में होना
न अगले पल से और न
आने वाले कल से कोई उम्मीद
और न अगले पल का, न ही
आने वाले कल का कोई ख़ौफ़
एक मुसलसल जंग
करने और होने के दरमियान
करना जो इंसान का फ़ुतूर
और होना उसका मुस्तक़बिल
करना जो होने नहीं देता
लेकिन होने तक का रास्ता
करने से ही होकर गुज़रता है
करना कभी बादल बनकर छाता है
होना कभी सूरज बनकर आता है
करना जैसे पहाड़ से निकल कर
समंदर तक दरिया का बहना
होना जैसे पहाड़ पे फैली बर्फ
और पसरे समंदर का पानी
करना जैसे क़ैदे-ज़ीस्त कोई
होना सारे ग़म से नजात जैसे
करना जैसे सीने में आग, सर पे जुनूँ
बेताबी, बेचैनी, छटपटाहट, जुस्तुजू
होना लेकिन जैसे इन सब का न होना
जैसे चांदनी रात, उस रात का सुकूँ
घास में ठहरी शबनम की बूँद
करना जैसे हो बिखर जाना
और होना जैसे सिमट जाना
करना जग को पाकर ख़ुद को खोना
होना ख़ुद में खोकर ख़ुद को पाना
करने का दायरा फैलता जाता
करने का, करते रहने का सिलसिला
चलता है, चलता ही रहता
जब तक कि ख़्वाहिशें हैं, आरज़ू हैं
इंसान कुछ करता है
उसके बाद कुछ और
और फिर कुछ और
पर तिश्नगी मिटती नहीं
बेताबी, बेचैनी कम होती नहीं
कुछ करना तो है ज़िंदा रहने की ख़ातिर
कुछ जिम्मेदारियों की ख़ातिर
पर कुछ करना ऐसा भी है कि जिन्हें
करने- न करने पर इख़्तियार है उसे
पर वो रुकता नहीं, सिलसिला थमता नहीं
जब तक कि ख़्वाहिशें हैं, आरज़ू हैं
पर करते रहने से मर जाता है होना
सच तो ये है कि न होने से
रुक पाएगा नहीं करने का सिलसिला
पर कुछ करने से ही पैदा होंगे
होने के इम्कान, ये भी सच है
तो करें हम सोच कर करने का इंतिख़ाब
ऐसे कि सिमट जाए करने का दायरा
और निकल आए होने का आफ़्ताब
छोटी होती जाए करने की ज़मीं
बड़ा होता जाए होने का आसमां
ग़ैर-जरुरी करना गिरें शाख से
सूखे हुए पत्तों की तरह
और होने में होकर ही इंसान
करे बस वो जो है जरुरी करना
और करने से हुआ है क्या
इंसान को हासिल ?
कुछ तबस्सुम, कुछ आँसू
खुशियाँ कुछ पा लेने की
ग़म कुछ खो देने का
और फिर आने वाले कल का ख़ौफ़
या उससे बेइन्तिहा उम्मीदें
और फिर उनके टूटने का ग़म
होना लेकिन है अभी इसी पल में होना
न अगले पल से और न
आने वाले कल से कोई उम्मीद
और न अगले पल का, न ही
आने वाले कल का कोई ख़ौफ़
दीवाना हो गया हूँ बस मैं तेरे नाम का
तेरी इनायत के बिना हूँ मैं किस काम का
लगा रहता हूँ दिन भर काम में मगर
सारा दिन इंतज़ार करता हूँ मैं शाम का
क्या-क्या करता हूँ दुनिया में रहकर
समझता यही हूँ कि हर काम है राम का
बस तेरे रस्ते चलता रहूँ, दे हौसला तू
रस्ता रह चुका है जो पहले भी तमाम का
तेरे नाम में डूब जियूँ, तेरा ही काज करूँ
हंस कर जीता जाऊँ जीवन गुमनाम का
तेरी इनायत के बिना हूँ मैं किस काम का
लगा रहता हूँ दिन भर काम में मगर
सारा दिन इंतज़ार करता हूँ मैं शाम का
क्या-क्या करता हूँ दुनिया में रहकर
समझता यही हूँ कि हर काम है राम का
बस तेरे रस्ते चलता रहूँ, दे हौसला तू
रस्ता रह चुका है जो पहले भी तमाम का
तेरे नाम में डूब जियूँ, तेरा ही काज करूँ
हंस कर जीता जाऊँ जीवन गुमनाम का
सोच रहा हूँ आज फिर
मैं अपने अंदर उतर कर देखूँ
कि वहां का माज़रा क्या है
तो पाता हूँ कि
दरवाजे पर जंग है
और ज़ीने पे धुल पड़ी है
गोया कोई सालों से
आया न हो इधर
हॉल की दीवारों पर
समझदारी का रंग चढ़ा है
जज़बातों के कमरे के ऊपर
प्रैक्टिकैलटी की लॉक चढ़ी है
इस लाइब्रेरी-कम-ऑफिस में
जहाँ बैठ कर मैं
अनवाइंड होता था
इस क़दर अँधेरा क्यों है वहां !
और संवेदनाओं को
समेट कर कोने में
किसने रख दिया है
दूसरे कमरे में जहाँ
मैंने यादों को
सहेज कर रखा था
वहां की बत्ती
आज भी जलती है
लेकिन इन यादों को
बड़े वाले कमरे में
शिफ्ट करना पड़ेगा
ये कमरा अब
छोटा पड़ने लगा है
काफी काम पड़ा हुआ है इधर
अब इधर आते रहना होगा
इस बे-तरतीब से
मकां को ठीक करना पड़ेगा
अगली बार
तुम्हे भी साथ लेकर जाऊँगा
मैं अपने अंदर उतर कर देखूँ
कि वहां का माज़रा क्या है
तो पाता हूँ कि
दरवाजे पर जंग है
और ज़ीने पे धुल पड़ी है
गोया कोई सालों से
आया न हो इधर
हॉल की दीवारों पर
समझदारी का रंग चढ़ा है
जज़बातों के कमरे के ऊपर
प्रैक्टिकैलटी की लॉक चढ़ी है
इस लाइब्रेरी-कम-ऑफिस में
जहाँ बैठ कर मैं
अनवाइंड होता था
इस क़दर अँधेरा क्यों है वहां !
और संवेदनाओं को
समेट कर कोने में
किसने रख दिया है
दूसरे कमरे में जहाँ
मैंने यादों को
सहेज कर रखा था
वहां की बत्ती
आज भी जलती है
लेकिन इन यादों को
बड़े वाले कमरे में
शिफ्ट करना पड़ेगा
ये कमरा अब
छोटा पड़ने लगा है
काफी काम पड़ा हुआ है इधर
अब इधर आते रहना होगा
इस बे-तरतीब से
मकां को ठीक करना पड़ेगा
अगली बार
तुम्हे भी साथ लेकर जाऊँगा
रात के ख़ामोश अंधेरों में
दिन भर के ख़याल जब ऊँघने लगते हैं
दबे पाँव सबसे नज़रें बचाकर आती हैं
तुम्हारी यादें दिल पर दस्तक देती हैं
और उनकी उंगलियाँ थाम कर मैं
तसव्वुर की राहों में निकल जाता हूँ
चाँद आसमां में बादलों से निकलता है
लहू में घुलकर कुछ रगों में बहने लगता है
लगता है आज की रात फिर देर से बुझेगी
मैं डायरी और पेन निकाल लूँ जरा
एक नयी नज़म लिहाफ़ के अंदर
अंगड़ाई ले रही है
दिन भर के ख़याल जब ऊँघने लगते हैं
दबे पाँव सबसे नज़रें बचाकर आती हैं
तुम्हारी यादें दिल पर दस्तक देती हैं
और उनकी उंगलियाँ थाम कर मैं
तसव्वुर की राहों में निकल जाता हूँ
चाँद आसमां में बादलों से निकलता है
लहू में घुलकर कुछ रगों में बहने लगता है
लगता है आज की रात फिर देर से बुझेगी
मैं डायरी और पेन निकाल लूँ जरा
एक नयी नज़म लिहाफ़ के अंदर
अंगड़ाई ले रही है
सबेरा
वो सुबह जो मिल न सकी
वो कली जो खिल न सकी
उम्मीद जो पल न सकी
वो शब जो ढल न सकी
परिंदा वो सुबह का जो
ख़्वाब से हमें जगा गया
नए दिन की उम्मीद करना
फिर से हमें सिखा गया
कह दो कोई उस परिंदे से जाकर
कुछ आँखों में नींद नहीं होती
कुछ नींदों में ख़्वाब नहीं होते
कई ख़्वाब यहाँ पूरे नहीं होते
होती हैं कई रातें ऐसी भी
जिनके हिस्से सबेरे नहीं होते
वो कली जो खिल न सकी
उम्मीद जो पल न सकी
वो शब जो ढल न सकी
परिंदा वो सुबह का जो
ख़्वाब से हमें जगा गया
नए दिन की उम्मीद करना
फिर से हमें सिखा गया
कह दो कोई उस परिंदे से जाकर
कुछ आँखों में नींद नहीं होती
कुछ नींदों में ख़्वाब नहीं होते
कई ख़्वाब यहाँ पूरे नहीं होते
होती हैं कई रातें ऐसी भी
जिनके हिस्से सबेरे नहीं होते
वो अफ़साने किसको सुनाते
इसलिए चुप रह जाते हैं
हैं कुछ लोग जो जाकर भी
यादों में रह जाते हैं
छोड़कर दामन जब था जाना
मेरी राहों में आये क्यों थे
महका कर दिन-रातों को
साँसों में समाये क्यों थे
दिन पहाड़ सा बैठा रहता
रात भी कहाँ गुज़रती है
तेरी एक ख़बर पाने को
रूह मारी-मारी फिरती है
कुछ उठता दिल से रह-रह कर
कुछ पलकों से बह जाता है
गा देता हूँ कभी गीत कोई
कुछ होठों में रह जाता है
आओ मुझसे ख़ुद को ले जाओ
मेरा मैं मुझे वापस कर दो
न मुझमे तुम बचे, न तुझमे मैं
करम अब इतना बस कर दो
इसलिए चुप रह जाते हैं
हैं कुछ लोग जो जाकर भी
यादों में रह जाते हैं
छोड़कर दामन जब था जाना
मेरी राहों में आये क्यों थे
महका कर दिन-रातों को
साँसों में समाये क्यों थे
दिन पहाड़ सा बैठा रहता
रात भी कहाँ गुज़रती है
तेरी एक ख़बर पाने को
रूह मारी-मारी फिरती है
कुछ उठता दिल से रह-रह कर
कुछ पलकों से बह जाता है
गा देता हूँ कभी गीत कोई
कुछ होठों में रह जाता है
आओ मुझसे ख़ुद को ले जाओ
मेरा मैं मुझे वापस कर दो
न मुझमे तुम बचे, न तुझमे मैं
करम अब इतना बस कर दो
अपने अंदर झाँक कर देखा
रहता है आख़िर कौन यहाँ
अँधेरा पाया और उमस भी
और वीरान पड़ी एक बस्ती
ढही ईमारत, सुनसान राहें
हर कोने से उठती आहें
सन्नाटा कुछ बयान करती
अज़नबी की पहचान करती
सोज़ बहुत और ग़ुबार भरा
अंदर था हाहाकार मचा
क्या कोई यहाँ रहता है !
क्या अब भी कोई रहता है !
टूटी हुई कमजोर एक काया
बस इतना मैं देख पाया
चेहरे पर दर्द की रेखा
मैंने अपने आप को देखा
परेशां और ग़मगीन पड़ा
बदन सलाखों में जकड़ा
अंदर एक क़ैदी इंसान
जर्जर और लहू-लुहान
मेरा मन तड़प रहा था
मुझसे कुछ कह रहा था
इस क़ैद से अब आज़ाद करो
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो
मैं था अंदर क़ैद मेरे
ख़ुद पे ज़ुल्म हज़ार किये
अब तो थोड़ी रौशनी हो
सुकूँ और क़रार मिले
जंजीरें टूटने लगीं
तमस भी हटने लगा
दर्द काफ़ूर हो गया कहीं
मैं मुझसे नहीं रहा अज़नबी !
रहता है आख़िर कौन यहाँ
अँधेरा पाया और उमस भी
और वीरान पड़ी एक बस्ती
ढही ईमारत, सुनसान राहें
हर कोने से उठती आहें
सन्नाटा कुछ बयान करती
अज़नबी की पहचान करती
सोज़ बहुत और ग़ुबार भरा
अंदर था हाहाकार मचा
क्या कोई यहाँ रहता है !
क्या अब भी कोई रहता है !
टूटी हुई कमजोर एक काया
बस इतना मैं देख पाया
चेहरे पर दर्द की रेखा
मैंने अपने आप को देखा
परेशां और ग़मगीन पड़ा
बदन सलाखों में जकड़ा
अंदर एक क़ैदी इंसान
जर्जर और लहू-लुहान
मेरा मन तड़प रहा था
मुझसे कुछ कह रहा था
इस क़ैद से अब आज़ाद करो
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो
मैं था अंदर क़ैद मेरे
ख़ुद पे ज़ुल्म हज़ार किये
अब तो थोड़ी रौशनी हो
सुकूँ और क़रार मिले
जंजीरें टूटने लगीं
तमस भी हटने लगा
दर्द काफ़ूर हो गया कहीं
मैं मुझसे नहीं रहा अज़नबी !
जीते हैं सभी
इसलिए मैं भी जीऊँ !
करते हैं जो सभी
वो मैं भी करूँ !
मक़सद कुछ साफ नहीं
दिखती आगे राह नहीं
चलते हैं जो सभी
वो राह मैं भी चलूँ !
वजह काफी नहीं इतनी
जीवन के होने की
कारण होंगे और कई
जरुरत आहे समझने की
जीवन का अर्थ है क्या
क्या कर्तव्यों का आधार
दुनिया के इस रंगमंच पे
जाने क्या मेरा क़िरदार !
सवाल ऐसे कई अनगिनत
उठते हैं मन में अविरत
इनके ही फेरों में उलझा
चलता रहा हूँ अपने पथ
पर अब मौन का वक़्त नहीं
चुप्पी तोड़नी होगी अभी
अब एक शुरुआत लाज़िमी है
पहले काफी देर हो चुकी
इसलिए मैं भी जीऊँ !
करते हैं जो सभी
वो मैं भी करूँ !
मक़सद कुछ साफ नहीं
दिखती आगे राह नहीं
चलते हैं जो सभी
वो राह मैं भी चलूँ !
वजह काफी नहीं इतनी
जीवन के होने की
कारण होंगे और कई
जरुरत आहे समझने की
जीवन का अर्थ है क्या
क्या कर्तव्यों का आधार
दुनिया के इस रंगमंच पे
जाने क्या मेरा क़िरदार !
सवाल ऐसे कई अनगिनत
उठते हैं मन में अविरत
इनके ही फेरों में उलझा
चलता रहा हूँ अपने पथ
पर अब मौन का वक़्त नहीं
चुप्पी तोड़नी होगी अभी
अब एक शुरुआत लाज़िमी है
पहले काफी देर हो चुकी
मैं था या शायद न था
किधर था, कहाँ था
था तो किस लिए, किसके लिए था
ख़ुद को था कहाँ ख़ुद का पता
ज़िन्दगी व्यस्त और गुम कहीं
दिन और रात का इल्म नहीं
तलब न जाने किस चीज की
जाने क्या ज़ुस्तज़ू दिल में थी
न सोचा कभी पहले मगर
है कोई एक शख़्स हमसफ़र
जरूरतें जुदा जिसकी
या कहें तो कुछ भी नहीं
दर्द मिले तो एहसास हुआ
सांसें थीं पर जिन्दा न था
मेरे संग पूरी दुनिया थी
ख़ुद से पर जुदा तन्हा था
फिर आई नयी एक सहर
कई सारे सवाल लेकर
कौन हूँ मैं ?
हूँ या नहीं हूँ मैं ?
एक सूरज सा शख़्स आया था कहीं से
जो लगा जीवन के सूत्र जानता हो जैसे
उसके संग देर तलक़ बैठा रहा
रूबरू हुआ ख़ुद से और ख़ुदा से
चलता तो हूँ अब भी मगर
है पर मुझको मेरी ख़बर
सब मेरे अपने से अब लगते हैं
जीवन हो गया एक सुहाना सफ़र
किधर था, कहाँ था
था तो किस लिए, किसके लिए था
ख़ुद को था कहाँ ख़ुद का पता
ज़िन्दगी व्यस्त और गुम कहीं
दिन और रात का इल्म नहीं
तलब न जाने किस चीज की
जाने क्या ज़ुस्तज़ू दिल में थी
न सोचा कभी पहले मगर
है कोई एक शख़्स हमसफ़र
जरूरतें जुदा जिसकी
या कहें तो कुछ भी नहीं
दर्द मिले तो एहसास हुआ
सांसें थीं पर जिन्दा न था
मेरे संग पूरी दुनिया थी
ख़ुद से पर जुदा तन्हा था
फिर आई नयी एक सहर
कई सारे सवाल लेकर
कौन हूँ मैं ?
हूँ या नहीं हूँ मैं ?
एक सूरज सा शख़्स आया था कहीं से
जो लगा जीवन के सूत्र जानता हो जैसे
उसके संग देर तलक़ बैठा रहा
रूबरू हुआ ख़ुद से और ख़ुदा से
चलता तो हूँ अब भी मगर
है पर मुझको मेरी ख़बर
सब मेरे अपने से अब लगते हैं
जीवन हो गया एक सुहाना सफ़र
बहते क्यूँ हो, क्यूँ हो चंचल ?
बहते क्यूँ हो, क्यूँ हो चंचल ?
नदिया के सुन ओ जल कल-कल
तीर पे थिर जा, थम जा दो पल
भटक रहे क्यों हो यूँ बेकल ?
आये कहाँ से, कहाँ को है जाना ?
कुछ है तेरा ठौर ठिकाना ?
क्यूँ है तुमको बहते जाना ?
अपना घर पर न बिसराना
भटक-भटक कर क्या पाते हो ?
जन्मों से आते जाते हो
किन रस्तों पे खो जाते हो ?
सांझ पहर फिर पछताते हो
जिस घर से आये उसी घर जाना
रुक जाए तो पा जाए ठिकाना
दो पल जीवन फिर ना गँवाना
लूट ले जो छुपा है खजाना
साँस है चाबी, तेरा मन है चोर
ले जाता यही सागर की ओर
थाम के पतरी सांस की डोर
बह जा तू अब कैलाश की ओर
नदिया के सुन ओ जल कल-कल
तीर पे थिर जा, थम जा दो पल
भटक रहे क्यों हो यूँ बेकल ?
आये कहाँ से, कहाँ को है जाना ?
कुछ है तेरा ठौर ठिकाना ?
क्यूँ है तुमको बहते जाना ?
अपना घर पर न बिसराना
भटक-भटक कर क्या पाते हो ?
जन्मों से आते जाते हो
किन रस्तों पे खो जाते हो ?
सांझ पहर फिर पछताते हो
जिस घर से आये उसी घर जाना
रुक जाए तो पा जाए ठिकाना
दो पल जीवन फिर ना गँवाना
लूट ले जो छुपा है खजाना
साँस है चाबी, तेरा मन है चोर
ले जाता यही सागर की ओर
थाम के पतरी सांस की डोर
बह जा तू अब कैलाश की ओर
बहते क्यूँ हो, क्यूँ हो चंचल ?
नदिया के सुन ओ जल कल-कल
तीर पे थिर जा, थम जा दो पल
भटक रहे क्यों हो यूँ बेकल ?
नदिया के सुन ओ जल कल-कल
तीर पे थिर जा, थम जा दो पल
भटक रहे क्यों हो यूँ बेकल ?
तेरे आने से पहले घर का ये समां न था
कैसे कहूँ पहले का तुझसे रिश्ता न था
उम्र भर की ज़िंदगी का कुछ यह तज़ुर्बा था
अपना लग कर भी यहाँ कुछ अपना न था
आये थे यहाँ कहीं और जाने के वास्ते
रस्ता ही था ये कोई मंज़िल का निशां न था
वक़्त बदलता है, हालात बदल जाते हैं
मैं भी जैसा हूँ पहले कभी वैसा न था
कुछ करने की चाहत, कहीं होने की मशक़्क़त
जीता भला कैसे इन्हीं में गर मरता न था
ख़ुदा हर लम्हे में है, हर शै में है ख़ुदा
मुसाफ़िर अकेला होगा कभी तन्हा न था
कैसे कहूँ पहले का तुझसे रिश्ता न था
उम्र भर की ज़िंदगी का कुछ यह तज़ुर्बा था
अपना लग कर भी यहाँ कुछ अपना न था
आये थे यहाँ कहीं और जाने के वास्ते
रस्ता ही था ये कोई मंज़िल का निशां न था
वक़्त बदलता है, हालात बदल जाते हैं
मैं भी जैसा हूँ पहले कभी वैसा न था
कुछ करने की चाहत, कहीं होने की मशक़्क़त
जीता भला कैसे इन्हीं में गर मरता न था
ख़ुदा हर लम्हे में है, हर शै में है ख़ुदा
मुसाफ़िर अकेला होगा कभी तन्हा न था
मेरा था आँगन
मेरा शजर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
टूटे वो सपने
छूटे वो अपने
दो कौड़ी दे के
सब छीना जग ने
मेरी थीं वो रातें
मेरा सहर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
तन्हा सा मन
सूना ये गगन
रुठ गया क्यों
मुझसे यूँ जीवन
मेरी थीं गलियाँ
मेरा शहर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
मेरा था आँगन
मेरा शजर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
मेरा शजर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
टूटे वो सपने
छूटे वो अपने
दो कौड़ी दे के
सब छीना जग ने
मेरी थीं वो रातें
मेरा सहर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
तन्हा सा मन
सूना ये गगन
रुठ गया क्यों
मुझसे यूँ जीवन
मेरी थीं गलियाँ
मेरा शहर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
मेरा था आँगन
मेरा शजर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था
है कहता दिल मेरा
आ चल कदम बढ़ा
एक बार कर ले हौसला
चल दे उस राह पर
बात सुन मेरी
इस अँधेरे के पार होगी रौशनी
चल कदम तो बढ़ा
क्यों संशय कर रहा
मेरी उंगलियां थाम ले
मैं चल तो रहा हूँ संग तेरे
सुन ले बात मेरी
अस्तित्व के तेरे हिस्से हैं कई
एक दूजे से बेख़बर
चल रहे हैं इधर-उधर
अपनी आँखें जरा बंद कर
जान मेरी आँखों में देखकर
एक हिस्सा ऐसा है
जो ठहरा हुआ है
हिस्सा है रोशन वही
जुड़े हैं उसी से सभी
तुम हो वही, उसी से हो तुम
आ जाओ ख़ुद को देख लो
जान लो, पा लो ख़ुद को
रौशनी में आओ
रौशनी बन जाओ
क्षितिज, जिस मोड़ पे
धरा गगन से मिलती है
सुबह-सुबह जहाँ
कली इक उमीद की खिलती है
सूरज लेकर जहाँ आता विहान
शुरू जहाँ करता उत्थान
फिर बाँट कर अपनी ऊर्जा सारी
जहाँ खतम करता ढलान
निरन्तरता है ये जीवन की
आरोहण व अवरोहण की
उर्ध्व-गमन की, अधोपतन की
उन्नयन की, अवनमन की
शाश्वत है ये क्रम प्रकृति का
सुबह आती, फिर आती शाम
हर दिन जैसे नया इक जीवन
औ रात्रि मृत्युपरांत विश्राम
धरा गगन से मिलती है
सुबह-सुबह जहाँ
कली इक उमीद की खिलती है
सूरज लेकर जहाँ आता विहान
शुरू जहाँ करता उत्थान
फिर बाँट कर अपनी ऊर्जा सारी
जहाँ खतम करता ढलान
निरन्तरता है ये जीवन की
आरोहण व अवरोहण की
उर्ध्व-गमन की, अधोपतन की
उन्नयन की, अवनमन की
शाश्वत है ये क्रम प्रकृति का
सुबह आती, फिर आती शाम
हर दिन जैसे नया इक जीवन
औ रात्रि मृत्युपरांत विश्राम
उस रात मुझसे जब था कहा तुमने
क्या तुम्हें फिर जाना ही होगा ?
रोये थे हम कितने बेबस होकर
क्या उस दिवस को आना ही होगा ?
मैंने तुमसे कहा था छुपा लो मुझको
समय भी जहाँ न ढूंढ पाये आकर
तुमने मुझे पकड़ लिया था कसकर
"आओ, अपने में छुपा लूँ" कहकर
तेरे उस कोमल मन से खेला मैं
और इक बचपन से खेला मैं
किसी कमजोर मनुष्य की भाँति
चला आया दूर अकेला मैं
फेर जगत के समझ ना पाता
बस संग हवा के बहता जाता
रुकना चाहा पर नहीं रुका मैं
ये दोहरा खेल अब नहीं सुहाता
कभी कितना विवश होकर इंसान
कर्म-पथ पर आगे चलता है
दुविधा कभी होती दूर नहीं
वो तिल-तिल कर जलता है
क्या तुम्हें फिर जाना ही होगा ?
रोये थे हम कितने बेबस होकर
क्या उस दिवस को आना ही होगा ?
मैंने तुमसे कहा था छुपा लो मुझको
समय भी जहाँ न ढूंढ पाये आकर
तुमने मुझे पकड़ लिया था कसकर
"आओ, अपने में छुपा लूँ" कहकर
तेरे उस कोमल मन से खेला मैं
और इक बचपन से खेला मैं
किसी कमजोर मनुष्य की भाँति
चला आया दूर अकेला मैं
फेर जगत के समझ ना पाता
बस संग हवा के बहता जाता
रुकना चाहा पर नहीं रुका मैं
ये दोहरा खेल अब नहीं सुहाता
कभी कितना विवश होकर इंसान
कर्म-पथ पर आगे चलता है
दुविधा कभी होती दूर नहीं
वो तिल-तिल कर जलता है
मिल गयी हसरतों की दुनिया ?
स्वप्न क्या साकार हुए ?
ख़यालों में था जैसा पाया
हासिल भी उसी प्रकार हुए ?
क्या हुआ भी कुछ या निरा भ्रम था ?
व्यर्थ मेरा क्या सारा श्रम था ?
ख़्वाब में तो था मेरे आसमां
यथार्थ पतन का पूरा क्रम था
न चलूँ अकेला कर्म-पथ पर
क्या ऐसा है मुमकिन नहीं ?
सरल जीवन, इच्छाएं कम हों
बोझ मन पर अनगिन नहीं
क्यों दौड़ रहा हूँ हाँफ-हाँफ कर ?
किसके लिए मैं जीता हूँ ?
न उन्हें ही मधु मैं पिला सका
औ' खुद भी विष ही पीता हूँ
स्वप्न क्या साकार हुए ?
ख़यालों में था जैसा पाया
हासिल भी उसी प्रकार हुए ?
क्या हुआ भी कुछ या निरा भ्रम था ?
व्यर्थ मेरा क्या सारा श्रम था ?
ख़्वाब में तो था मेरे आसमां
यथार्थ पतन का पूरा क्रम था
न चलूँ अकेला कर्म-पथ पर
क्या ऐसा है मुमकिन नहीं ?
सरल जीवन, इच्छाएं कम हों
बोझ मन पर अनगिन नहीं
क्यों दौड़ रहा हूँ हाँफ-हाँफ कर ?
किसके लिए मैं जीता हूँ ?
न उन्हें ही मधु मैं पिला सका
औ' खुद भी विष ही पीता हूँ
तुम्हें जब मेरी जरुरत थी
मुझे तब कहाँ फुर्सत थी
रुंधे गले से था रोका तुमने
पर मेरी और ही हसरत थी
इक आवाह्न पर निकल गया
कर झटक कर चल दिया
कहीं पर फैला कर तम
कहीं पर जाकर जल गया
नर क्यों मजबूर इतना है !
किस भ्रम में चूर इतना है !
मैं तुम से दूर हुआ कुछ यूँ
सूर्य धरा से दूर जितना है
अब मन में यही विचार करूँ
समय न और बेकार करूँ
यहाँ के दीये बुझाकर अब
दूर घर का अंधियार करूँ
मुझे तब कहाँ फुर्सत थी
रुंधे गले से था रोका तुमने
पर मेरी और ही हसरत थी
इक आवाह्न पर निकल गया
कर झटक कर चल दिया
कहीं पर फैला कर तम
कहीं पर जाकर जल गया
नर क्यों मजबूर इतना है !
किस भ्रम में चूर इतना है !
मैं तुम से दूर हुआ कुछ यूँ
सूर्य धरा से दूर जितना है
अब मन में यही विचार करूँ
समय न और बेकार करूँ
यहाँ के दीये बुझाकर अब
दूर घर का अंधियार करूँ
मैं भी उस पथ का राही हूँ
मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
गतिमान हूँ कब से जाने
मंज़िल का पर अनुमान नहीं
कोई मिला तो छूटा कोई
पर अक्सर तन्हा ही चलता हूँ
थके पाँव सहलाता खुद से
गिर के खुद ही सम्हलता हूँ
कभी-कभी जो रुक जाता हूँ
लेने को थोड़ा सा दम
मन के प्रश्न खड़े हो जाते
दिशा बदलूँ या जाऊँ थम?
पूछे अर्जुन कृष्ण कहाँ है?
अंतर्मन में द्वंद्व यहाँ है
गीता का फिर पाठ पढ़ाओ
दिशाहीन सारी दुनिया है
मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
चलते-चलते इतना जाना
रुक जाना भी समाधान नहीं
सत्य न कोई दूर खड़ा
न कोई अंतिम पड़ाव यहाँ
चलना ही जब उत्तर ठहरा
यही जीवन का सार यहाँ
अपनी-अपनी कहिये सनम
अपनी-अपनी करिये सनम
हज़ार राहें जहाँ में हैं
अपनी-अपनी चलिए सनम
अनसुने अनजाने यहाँ
हैं कितने अफ़साने यहाँ
किसका फ़साना कौन सुने
खुद कहिये ख़ुद सुनिए सनम
दर्द लबों पर आ न जाए
अश्क़ पलक से छलक न जाए
सबके अपने दर्द यहाँ
दिल की दिल में रखिये सनम
सुख कौन किसे दे देता है
दुःख किसका कोई ले लेता है
ये कथनी मन हल्काने के
सब अपनी करनी भरिये सनम
अपनी-अपनी करिये सनम
हज़ार राहें जहाँ में हैं
अपनी-अपनी चलिए सनम
अनसुने अनजाने यहाँ
हैं कितने अफ़साने यहाँ
किसका फ़साना कौन सुने
खुद कहिये ख़ुद सुनिए सनम
दर्द लबों पर आ न जाए
अश्क़ पलक से छलक न जाए
सबके अपने दर्द यहाँ
दिल की दिल में रखिये सनम
सुख कौन किसे दे देता है
दुःख किसका कोई ले लेता है
ये कथनी मन हल्काने के
सब अपनी करनी भरिये सनम
ख़ुदा के वास्ते फिर ना कोई ख़ुदा हो जाए
अच्छा हो मोहब्बत वाला ही मसीहा हो जाए
कितना क़रीब ले आती है दो दिलों को मोहब्बत
कि मैं उसके जैसा और वो मुझ सा हो जाए
ज़िन्दगी कब तक मुझसे छुपती रहोगी
कभी घर पे आओ, थोड़ी सी तो राब्ता हो जाए
अब तो थक गया हूँ सहर से चल-चल कर
कोई दोपहर में पीपल वाली हवा हो जाए
इस क़दर पहन लेते हैं लिबास अपने ऊपर
कि अपनी नज़र में ही कोई गुमशुदा हो जाए
उमीद का दामन मत छोड़ तू ऐ मुसाफ़िर
आएगा फिर कोई कि हिन्द में ज़लज़ला हो जाए
जीवन तेरा कैसे फिर से निर्माण करूँ
बुझते पलों में कैसे सुलगते प्राण भरूँ
जो उबलता था, अब धमनियों में है अवरुद्ध
पुनः-प्रवाह हेतु उनमें क्या ऊर्जावान भरूँ
कुछ दुनियादारी कुछ अपनी लाचारी है
गुत्थी पूरी उलझी है, कैसे समाधान करूँ
भ्रम से घिरा लक्ष्य, तम से भरा पथ मेरा
ऐसे में सही दिशा का कैसे अनुमान करूँ
जीवन तू सुगम सरल नहीं है लेकिन
अश्रु बहा रचयिता का क्यों अपमान करूँ
बुझते पलों में कैसे सुलगते प्राण भरूँ
जो उबलता था, अब धमनियों में है अवरुद्ध
पुनः-प्रवाह हेतु उनमें क्या ऊर्जावान भरूँ
कुछ दुनियादारी कुछ अपनी लाचारी है
गुत्थी पूरी उलझी है, कैसे समाधान करूँ
भ्रम से घिरा लक्ष्य, तम से भरा पथ मेरा
ऐसे में सही दिशा का कैसे अनुमान करूँ
जीवन तू सुगम सरल नहीं है लेकिन
अश्रु बहा रचयिता का क्यों अपमान करूँ
होटल की खिड़की से झांकता हूँ
नीचे एक स्विमिंग पूल है
सुबह-सुबह ढेर सारे कबूतर
उसके गिर्द जमाबंद बैठ जाते हैं
फिर कोई एक इधर से उधर उड़कर जाता है
तो कोई उधर से इधर
सब पूल के चारो तरफ ही उड़ते हैं
पर कुछ पल से ज्यादा एक जगह पर नहीं बैठता कोई
लगता है मिलकर म्यूजिकल चेयर खेलते हैं
कायनात में जो एक धुन बजती रहती है
उसी संगीत पर खेलते होंगे
पर सोचता हूँ उसे ऑन-ऑफ कौन करता होगा !
नीचे एक स्विमिंग पूल है
सुबह-सुबह ढेर सारे कबूतर
उसके गिर्द जमाबंद बैठ जाते हैं
फिर कोई एक इधर से उधर उड़कर जाता है
तो कोई उधर से इधर
सब पूल के चारो तरफ ही उड़ते हैं
पर कुछ पल से ज्यादा एक जगह पर नहीं बैठता कोई
लगता है मिलकर म्यूजिकल चेयर खेलते हैं
कायनात में जो एक धुन बजती रहती है
उसी संगीत पर खेलते होंगे
पर सोचता हूँ उसे ऑन-ऑफ कौन करता होगा !
मेरी बर्बादी का मंजर मुझसे ही तुम पूछते हो
किसके हाथ में था खंज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो
हवा से पूछो तो जिसने गिराया इन शाखों को
किस बावत उठा बवंडर, मुझसे ही तुम पूछते हो
ग़ुबार के नीचे से देखो चीखें किसी की आती हैं
इस मोड़ पे थे किस-किसके घर, मुझसे ही तुम पूछते हो
उस आग को तुमने फूंका था जब वो चिंगारी थी
कैसे जला है ये शहर, मुझसे ही तुम पूछते हो
रोती है रातों को जो ख़्वाब सुनहरे देखती थीं
क्यूँ है उन आखों में डर, मुझसे ही तुम पूछते हो
मुसाफिर से भी पहले, जो कदम उठे इन राहों पर
वो आते क्यूँ नहीं नज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो
किसके हाथ में था खंज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो
हवा से पूछो तो जिसने गिराया इन शाखों को
किस बावत उठा बवंडर, मुझसे ही तुम पूछते हो
ग़ुबार के नीचे से देखो चीखें किसी की आती हैं
इस मोड़ पे थे किस-किसके घर, मुझसे ही तुम पूछते हो
उस आग को तुमने फूंका था जब वो चिंगारी थी
कैसे जला है ये शहर, मुझसे ही तुम पूछते हो
रोती है रातों को जो ख़्वाब सुनहरे देखती थीं
क्यूँ है उन आखों में डर, मुझसे ही तुम पूछते हो
मुसाफिर से भी पहले, जो कदम उठे इन राहों पर
वो आते क्यूँ नहीं नज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो
मेरे नाम के हिस्से में
एक शाम सुहानी लिख देना
नाम मेरा कोई पूछे तो
बस तेरी दीवानी लिख देना
याद मेरी जो आये तो
अश्क़ों को हर्फ़ बना लेना
शब् की स्याह सफहों पर तुम
दिल की कहानी लिख देना
याद है तुमको वो पल क्या
जब तुम जाने वाले थे
आँखों से तूने जो पोछा था
उसको न पानी लिख देना
बरस रहे थे हम तुम दोनों
भींग रहे थे हम तुम दोनों
खामोशी में जो जन्मी थी वो
नज़म पुरानी लिख देना
गीत जो हमने गाये थे
कसमें जो हमने खायी थीं
मैं उनमे जीने मरने लगी
इसे बस नादानी लिख देना
एक शाम सुहानी लिख देना
नाम मेरा कोई पूछे तो
बस तेरी दीवानी लिख देना
याद मेरी जो आये तो
अश्क़ों को हर्फ़ बना लेना
शब् की स्याह सफहों पर तुम
दिल की कहानी लिख देना
याद है तुमको वो पल क्या
जब तुम जाने वाले थे
आँखों से तूने जो पोछा था
उसको न पानी लिख देना
बरस रहे थे हम तुम दोनों
भींग रहे थे हम तुम दोनों
खामोशी में जो जन्मी थी वो
नज़म पुरानी लिख देना
गीत जो हमने गाये थे
कसमें जो हमने खायी थीं
मैं उनमे जीने मरने लगी
इसे बस नादानी लिख देना
मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
न धूप भरी ज़मीं
न सूरज भरा आसमां
न सुकूँ के दिन-रात
न तेरी चाहतों का जहां
तू चली तो मेरे संग हमसफ़र
मगर उन राहों की मुश्किलो के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मैं तो उड़ता रहा हूँ बस
अपने ख़्वाबों की खातिर
तेरे भी तो ख्वाब होंगे
कैसे भूल गया मैं आखिर
तुमने तो ऊँची परवाज़ दी मुझे
पर बाँधने वाले कुछ रिश्तों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
खुद रही है तू क़ैद में एक
और मुझे आज़ाद किया है
सब कुछ अपना छोड़ कर
मेरा जहां आबाद किया है
तूने क्या माँगा था मैं सोचता रहा
मगर मेरे हज़ार झूठे वादों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
न धूप भरी ज़मीं
न सूरज भरा आसमां
न सुकूँ के दिन-रात
न तेरी चाहतों का जहां
तू चली तो मेरे संग हमसफ़र
मगर उन राहों की मुश्किलो के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मैं तो उड़ता रहा हूँ बस
अपने ख़्वाबों की खातिर
तेरे भी तो ख्वाब होंगे
कैसे भूल गया मैं आखिर
तुमने तो ऊँची परवाज़ दी मुझे
पर बाँधने वाले कुछ रिश्तों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
खुद रही है तू क़ैद में एक
और मुझे आज़ाद किया है
सब कुछ अपना छोड़ कर
मेरा जहां आबाद किया है
तूने क्या माँगा था मैं सोचता रहा
मगर मेरे हज़ार झूठे वादों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
ज़िन्दगी अँधेरी राहों पर चलना है
और अनजान मोड़ों से गुज़रना है
बैशाखियाँ फिर से न दे देना मुझको
मुझे तो अब बिन सहारों के चलना है
चाँद सा मामूल नहीं हो सकता मेरा
मुझे देर तलक़ सूरज सा जलना है
अपने आशियाने में मत रोक मुझे
अभी तो सहर होने तक चलना है
देर तो होगी, मुश्किलें भी कम नहीं
हवाओं का रुख़ जो अभी बदलना है
दुनिया जलने-बुझने का सिलसिला सही
किसी दिए को बुझना, किसी को जलना है
दैरो-हरम ही सबब हो गए फ़सादात के
छोड़ो फिर मुसाफ़िर क्या मज़हब का करना है
और अनजान मोड़ों से गुज़रना है
बैशाखियाँ फिर से न दे देना मुझको
मुझे तो अब बिन सहारों के चलना है
चाँद सा मामूल नहीं हो सकता मेरा
मुझे देर तलक़ सूरज सा जलना है
अपने आशियाने में मत रोक मुझे
अभी तो सहर होने तक चलना है
देर तो होगी, मुश्किलें भी कम नहीं
हवाओं का रुख़ जो अभी बदलना है
दुनिया जलने-बुझने का सिलसिला सही
किसी दिए को बुझना, किसी को जलना है
दैरो-हरम ही सबब हो गए फ़सादात के
छोड़ो फिर मुसाफ़िर क्या मज़हब का करना है
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
जीवन-दुःख के बोझ तले
कन्धा जब झुक जाता है
कन्धा जब झुक जाता है
अंतस की घोर तपिश में
हृदय पुष्प मुरझाता है
ऐसे में कोई लगाए हृदय से
ऐसे में कोई लगाए हृदय से अश्रुधार बंध जाता है
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
बूँद-बूँद को जब तरसे मन
पतझड़ हो जाए ये जीवन
आशाओं के मेघ छटें और
धू-धू हो सपनों का वन
आये कहीं से स्नेह के छीटें
आये कहीं से स्नेह के छीटें सावन फिर आ जाता है
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
नित दिन एक नया समंदर
प्रस्तुत होता मंथन को
कर्त्तव्यों के बड़े पर्वत जब
सम्मुख हों आरोहण को
अपनों का ही प्यार उसे तब
अपनों का ही प्यार उसे तब संघर्ष-शक्ति दे पाता है
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
आत्म-विश्वास जब क्षत-विक्षत
जग-दुत्कारों से हो मन आहत
असफलता की सरिताओं में
बह-बह कर आजीवन अविरत
किये वादों का स्मरण ही तब
किये वादों का स्मरण ही तब नव-विश्वास जगाता है
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
मेरा दिन हो तुम, रात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
मौला ने जो बक्शी है वो
मेरे जीवन की सौगात हो तुम
वज़ह मेरे रोने हंसने की
मेरे दिल की हर जज़्बात हो तुम
तेरे बिन अधूरा सा मैं
मेरी पूरी क़ायनात हो तुम
ख्यालों में ख्वाबों में तुम
रहता हूँ तेरी यादों में गुम
आँखें हर पल ढूंढे तुमको
कानों में तेरे नाम की धुन
मेरा दिन हो तुम, रात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
मौला ने जो बक्शी है वो
मेरे जीवन की सौगात हो तुम
वज़ह मेरे रोने हंसने की
मेरे दिल की हर जज़्बात हो तुम
तेरे बिन अधूरा सा मैं
मेरी पूरी क़ायनात हो तुम
ख्यालों में ख्वाबों में तुम
रहता हूँ तेरी यादों में गुम
आँखें हर पल ढूंढे तुमको
कानों में तेरे नाम की धुन
मेरा दिन हो तुम, रात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
वही ख़ुशबू
वही चेहरा
वही आँखें
वही लम्स
वही आवाज़
वही अंदाज़
वही निस्बत
वही आलम
ख़याल है या
फिर ख़्वाब है कोई !
पर जब
खुली आँखें तो
बस तनहा मैं
ख़ामोश कमरा
सोयी दीवारें
उदास रात
और गीली हवा
तू तो नहीं है कहीं
चाँद भी नहीं है
बंद कर लूँ फिर आँखें
फिर डूब जाऊँ
उन ख़यालों में
फिर वही ख़ुशबू
वही आवाज़
वही चेहरा
हाय तेरा चेहरा !
तुम कितनी सुन्दर
हो !तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं
तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं
तेरे बिन इस दिल को कोई रंग लुभाता नहीं
रस्ता तो हो वो जिसपे तुम हो मेरे हमसफ़र
हाथों में तेरा हाथ जब मंज़िल आए नज़र
धूप-छाँव हो या हो बारिश या फिर अँधेरा
तुम संग रहो तो आसान है मेरा हर सफ़र
तेरा ज़िक्र न हो जिसमें, गीत वो सुन पाता नहीं
तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं
मेरे हमदम तुमसे ही ज़िंदगी की ये बहार है
हर फूल में ख़ुशबू, हर लम्हा गुलज़ार है
तेरे दम से रौशनी है मौसम का मिज़ाज
खिलखिलाती सुबह, शाम भी खुशगवार है
तेरे बिन कोई ख़्वाब, ज़िंदगी का बुन पाता नहीं
तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं
जीवन तो जीना होता है
होठों को सीना होता है
खट्टी या मीठी लगे
इस रस को पीना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
कभी कितना दे जाती है
कभी सब कुछ ले जाती है
देती है तो लेना होता है
लेती है तो देना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
बारिश आकर भिगा जाती है
धूप आकर सुखा जाती है
सर्दी, गर्मी, वर्षा का
यहाँ फिक्स महीना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
अपनों को खोना होता है
सपनो को संजोना होता है
सुख-दुःख आते जाते हैं
हँसना और रोना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
पहले भी लोग आये थे
आगे भी लोग आएँगे
इंसां किसी भी वक़्त का हो
वक़्त के हाथ का खिलौना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
डरकर रहो तो मारती है
डटकर लड़ो तो हारती है
बढ़कर गले लगाती जब
खून बहकर पसीना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
बहने से रस्ते खुल जाते हैं
चलने से रस्ते मिल जाते हैं
राहों में ठोकरें मिलती हैं
गिर के खुद सम्हलना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
दर्द को दिल में छुपाकर के
हरपल मुस्कुराना होता है
पलकों में अश्क़ छुपाकर के
गीत कोई गुनगुनाना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
एक ही लीक पर चलते रहो
हां में बस हाँ मिलाते रहो
अलग सोचने वालों का
दुश्मन सारा ज़माना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
अंदर तक जाना होता है
ख़ुद को वहां पाना होता है
वहाँ जो फैली शांति है
बाहर तक लाना होता है
जीवन तो जीना होता है
जीवन तो जीना होता है
बाहर मुसलसल बारिश हो रही थी
मैं बरामदे में पुरानी खाट पर लेटा था
बिजली गुल थी बहुत देर से पूरे शहर की
और घर के अंदर कोई छोटा दीया भी नहीं जला था
बूँदों की शोर में खोया था मैं
पानी की बड़ी बूँद छत से गिरती थी मेरे ऊपर
ज़रूर दूर कहीं ऊँचे आसमान में
ये बूँदें नीचे आती होंगी तुम्हें छूकर
हलकी रौशनी रोशनदान से छनकर आ रही थी
मेरा ध्यान मेज पर रखी तेरी तस्वीर पर चला गया
पुरानी थी पर ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो
तन्हाई भरी शाम में तेरा ख़याल दिल मेरा जला गया
मैं उठ कर कमरे में गया और लैंप जला ली
आलमारी खोली और वो पुरानी लाल वाली डायरी निकाली
कभी पन्ने पलटता तो कभी खिड़की से झाँकता
अंदर तेरी यादों का साया बाहर रात की चादर काली
संग बिताये लम्हों के एहसासात क़ैद थे पन्नों में
कितना ख़ूबसूरत फ़साना अपना साथ गुज़रा जमाना था
कभी मिले ख़ुदा तो उससे पूछूंगा मैं
ज़िन्दगी तो शुरू की थी अभी, अभी क्यों तुम्हें जाना था?
मैं बरामदे में पुरानी खाट पर लेटा था
बिजली गुल थी बहुत देर से पूरे शहर की
और घर के अंदर कोई छोटा दीया भी नहीं जला था
बूँदों की शोर में खोया था मैं
पानी की बड़ी बूँद छत से गिरती थी मेरे ऊपर
ज़रूर दूर कहीं ऊँचे आसमान में
ये बूँदें नीचे आती होंगी तुम्हें छूकर
हलकी रौशनी रोशनदान से छनकर आ रही थी
मेरा ध्यान मेज पर रखी तेरी तस्वीर पर चला गया
पुरानी थी पर ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो
तन्हाई भरी शाम में तेरा ख़याल दिल मेरा जला गया
मैं उठ कर कमरे में गया और लैंप जला ली
आलमारी खोली और वो पुरानी लाल वाली डायरी निकाली
कभी पन्ने पलटता तो कभी खिड़की से झाँकता
अंदर तेरी यादों का साया बाहर रात की चादर काली
संग बिताये लम्हों के एहसासात क़ैद थे पन्नों में
कितना ख़ूबसूरत फ़साना अपना साथ गुज़रा जमाना था
कभी मिले ख़ुदा तो उससे पूछूंगा मैं
ज़िन्दगी तो शुरू की थी अभी, अभी क्यों तुम्हें जाना था?
मन करता है
बैठा ही रहूँ
तेरे इस झरने के नीचे
और तुम बरसाते जाओ
शांति जल
वरना कहाँ मन लगे
ये दुनिया तेरी जंगल
कैसे-कैसे पेड़ यहाँ
और कैसे-कैसे फल
घर-घर हैं ये पेड़ लगे
लम्बे हैं पर छाँव नहीं देते
घने पर हवा नहीं
फलों में इनके विष
और छालों पे कांटे
जाने कैसी जलवायु बदली
बीज ही सारे ख़राब हो गए!
लोग कहते हैं
विचार बीज हैं
कर्म जिनके फल
और सोचता हूँ तो लगता है
चरित्र ही वृक्ष है
प्रेम उसकी छाया
व्यवहार छाल
और वाणी बयार
और बात करें जलवायु की तो
जल गुरुजनों की शिक्षा और अनुशाषन
और वायु वो सारी चीजें
मन जिनमे उलझा रहता दिन भर
और सच तो ये है कि
जलवायु करते हैं असर बीजों पर
बैठा ही रहूँ
तेरे इस झरने के नीचे
और तुम बरसाते जाओ
शांति जल
वरना कहाँ मन लगे
ये दुनिया तेरी जंगल
कैसे-कैसे पेड़ यहाँ
और कैसे-कैसे फल
घर-घर हैं ये पेड़ लगे
लम्बे हैं पर छाँव नहीं देते
घने पर हवा नहीं
फलों में इनके विष
और छालों पे कांटे
जाने कैसी जलवायु बदली
बीज ही सारे ख़राब हो गए!
लोग कहते हैं
विचार बीज हैं
कर्म जिनके फल
और सोचता हूँ तो लगता है
चरित्र ही वृक्ष है
प्रेम उसकी छाया
व्यवहार छाल
और वाणी बयार
और बात करें जलवायु की तो
जल गुरुजनों की शिक्षा और अनुशाषन
और वायु वो सारी चीजें
मन जिनमे उलझा रहता दिन भर
और सच तो ये है कि
जलवायु करते हैं असर बीजों पर
फ़िक्र-ए-दुनिया ने कभी बेफ़िक्र होकर रहने न दिया
खुलकर उड़ने न दिया, पिघलकर बहने न दिया
तेरी जुल्फ़ों के साये में ज़िन्दगी मेरी यूँ बीत ही जाती
मेरी बेताबी ने मगर एक जगह मुझे ठहरने न दिया
जुनूँ ही था जो मारा-मारा फिरता रहा दर-ब-दर
घर की चिंताओं ने चैन से घर पर रहने न दिया
खुलकर उड़ने न दिया, पिघलकर बहने न दिया
तेरी जुल्फ़ों के साये में ज़िन्दगी मेरी यूँ बीत ही जाती
मेरी बेताबी ने मगर एक जगह मुझे ठहरने न दिया
जुनूँ ही था जो मारा-मारा फिरता रहा दर-ब-दर
घर की चिंताओं ने चैन से घर पर रहने न दिया
आऊँगा एक दिन लौट, माँ से था ये वादा मेरा
शहर की रौशनी ने मगर मुझे गाँव का रहने न दिया
जिस राह चल रहा हूँ उस पर मेरी मंज़िल तो नहीं
कुछ भूख ने, कुछ डर ने अलग राह चलने न दिया
हर सुबह दफ़्तर जाने की ढूंढता हूँ मैं वजह
चाहता तो हूँ, हसरतों ने मगर कभी रुकने न दिया
शहर की रौशनी ने मगर मुझे गाँव का रहने न दिया
जिस राह चल रहा हूँ उस पर मेरी मंज़िल तो नहीं
कुछ भूख ने, कुछ डर ने अलग राह चलने न दिया
हर सुबह दफ़्तर जाने की ढूंढता हूँ मैं वजह
चाहता तो हूँ, हसरतों ने मगर कभी रुकने न दिया
कोई जैसे डायरी के
ज़र्द पुराने पन्नों को
फाड़कर निकालता है
और डस्ट-बिन में डाल देता है
वैसे ही हमारे रिश्ते को
तुमने छोटे-छोटे पुर्जों में
फाड़कर फेंका था उस दिन
मैं आज भी
उन टुकड़ों को ढूंढता हूँ
उस मोड़ पर जाकर
सुना है पर वक़्त ने
तेज आँधियाँ चलायी थीं
उस रोज
उसी में उड़ गए हों शायद
या फिर हर शाम को
जो बारिश होती है
और सारी रात ठहरती है
उसमे बह गए होंगे
कुछ रिश्तों के निशाँ भी
कितनी आसानी से
मिट जाते हैं ना
पर तुम्हारी यादों ने
जो दास्ताँ दिल के
कागज पर लिखी है
वो शायद कभी न मिट पाये
किस परमानेंट इंक से
लिख गयी हो अपना नाम !
ज़र्द पुराने पन्नों को
फाड़कर निकालता है
और डस्ट-बिन में डाल देता है
वैसे ही हमारे रिश्ते को
तुमने छोटे-छोटे पुर्जों में
फाड़कर फेंका था उस दिन
मैं आज भी
उन टुकड़ों को ढूंढता हूँ
उस मोड़ पर जाकर
सुना है पर वक़्त ने
तेज आँधियाँ चलायी थीं
उस रोज
उसी में उड़ गए हों शायद
या फिर हर शाम को
जो बारिश होती है
और सारी रात ठहरती है
उसमे बह गए होंगे
कुछ रिश्तों के निशाँ भी
कितनी आसानी से
मिट जाते हैं ना
पर तुम्हारी यादों ने
जो दास्ताँ दिल के
कागज पर लिखी है
वो शायद कभी न मिट पाये
किस परमानेंट इंक से
लिख गयी हो अपना नाम !
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
------------------------------------------------------------
टुकड़ा हस्ती का टूटकर गिर गया कहीं
आरज़ू उसकी हर पल मैं पास रखता हूँ
मेरा था तो मिल ही जाएगा एक दिन
कैसे कहूँ मैं कि ये विश्वास रखता हूँ
बैठ जाऊं फिर तो लम्बा कहीं विश्राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
------------------------------------------------------------
टुकड़ा हस्ती का टूटकर गिर गया कहीं
आरज़ू उसकी हर पल मैं पास रखता हूँ
मेरा था तो मिल ही जाएगा एक दिन
कैसे कहूँ मैं कि ये विश्वास रखता हूँ
बैठ जाऊं फिर तो लम्बा कहीं विश्राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
मैं हूँ वो नदी जो समंदर जानती नहीं
परिंदा वो जो अपनी परवाज़ ढूंढता है
हूँ वो रस्ता जिसपे कोई मंजिल नहीं
एक साज़ ऐसा जो आवाज़ ढूंढता है
इस जुस्तजू में उम्र सारी तमाम ना हो जाए
परिंदा वो जो अपनी परवाज़ ढूंढता है
हूँ वो रस्ता जिसपे कोई मंजिल नहीं
एक साज़ ऐसा जो आवाज़ ढूंढता है
इस जुस्तजू में उम्र सारी तमाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
चाहता हूँ हिम या बहती जलधारा
दरिया की मौजें या उसका किनारा
सही राह अक्सर पहचान नहीं पाता
जान नहीं पाता अंतर्मन का इशारा
इस ग़फ़लती में गलत कोई अंजाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
रौशन दिवस को तम में ढलना होता है
कोयला है चट्टान मगर जलना होता है
जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं
मन के विरुद्ध खुद को चलना होता है
लड़ रहा हूँ इस युद्ध में हार मेरे राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
चाहता हूँ हिम या बहती जलधारा
दरिया की मौजें या उसका किनारा
सही राह अक्सर पहचान नहीं पाता
जान नहीं पाता अंतर्मन का इशारा
इस ग़फ़लती में गलत कोई अंजाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
रौशन दिवस को तम में ढलना होता है
कोयला है चट्टान मगर जलना होता है
जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं
मन के विरुद्ध खुद को चलना होता है
लड़ रहा हूँ इस युद्ध में हार मेरे राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
-------------------------------------------------------
सुमन बिछे पथ नहीं मिलेंगे
शूलों पर ही चलना होगा
भास्कर की शंखनाद सुनो ...
उठो पार्थ, फिर लड़ना होगा
देते क्यों हवि हो सिसक-सिसक कर जीवन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
-------------------------------------------------------
सुमन बिछे पथ नहीं मिलेंगे
शूलों पर ही चलना होगा
भास्कर की शंखनाद सुनो ...
उठो पार्थ, फिर लड़ना होगा
देते क्यों हवि हो सिसक-सिसक कर जीवन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
द्वंद्व मन का मिटा नहीं है
महा-भारत रुका नहीं है
विवेक से फिर हो मंत्रणा
कृष्ण, सारथी, सखा वही है
पर विचार नहीं अब कर्म करो, कौरवों ने गर्जन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
समर है ये जीवन का जिसमे
विराम नहीं, विश्राम नहीं
अमर हुए जो जीते लड़कर
हारे हुओं का कोई नाम नहीं
गिर, फिसल मगर तू चल, कर इच्छा-शक्ति मन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
चिंताओं का कोई अर्थ नहीं
चेष्टा कोई व्यर्थ नहीं
अश्रु, स्वेद, रक्त बिना
खुशियों की कोई शर्त नहीं
हो मन कठोर, भुजा में जोर, बेला ये दमन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
अर्जुन उठो, योगी बनो
साधना व कर्म करो
भय, चिंता, अहम, संशय
मेरु-अनल में दहन करो
स्वर्ग-सोपान अंतर्दिश, चेतना हो आरोहण की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
महा-भारत रुका नहीं है
विवेक से फिर हो मंत्रणा
कृष्ण, सारथी, सखा वही है
पर विचार नहीं अब कर्म करो, कौरवों ने गर्जन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
समर है ये जीवन का जिसमे
विराम नहीं, विश्राम नहीं
अमर हुए जो जीते लड़कर
हारे हुओं का कोई नाम नहीं
गिर, फिसल मगर तू चल, कर इच्छा-शक्ति मन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
चिंताओं का कोई अर्थ नहीं
चेष्टा कोई व्यर्थ नहीं
अश्रु, स्वेद, रक्त बिना
खुशियों की कोई शर्त नहीं
हो मन कठोर, भुजा में जोर, बेला ये दमन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
अर्जुन उठो, योगी बनो
साधना व कर्म करो
भय, चिंता, अहम, संशय
मेरु-अनल में दहन करो
स्वर्ग-सोपान अंतर्दिश, चेतना हो आरोहण की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
पग-पग तू छली गयी है
बारंबार ठगी गयी है
साहस को तेरे नमन है
चलती रही तू रुकी नहीं है
कहो तो कब इस जग ने तुझको सच्चा मान दिया है?
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
कब से अपने पैरों पर थी
पर थी तब भी पर-निर्भर
भूल तेरी बस इतनी थी
रही समर्पित जीवन भर
तेरे समर्पण को सबने निर्बलता का नाम दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
जब स्वयं से तू लड़कर जीती
जग से भी तू जीत रही है
शनैः-शनैः ही पर निश्चित ही
रात अँधेरी बीत रही है
तेरे ढृढ़-संकल्प ने ही रास्ता कुछ आसान किया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
रहो अडिग, रहो अटल तुम
नव-विहान को आने दो
आशा की नयी किरण हो
स्वयं को जग पे छाने दो
उगते सूरज को जग में सबने ही सम्मान दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
बारंबार ठगी गयी है
साहस को तेरे नमन है
चलती रही तू रुकी नहीं है
कहो तो कब इस जग ने तुझको सच्चा मान दिया है?
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
कब से अपने पैरों पर थी
पर थी तब भी पर-निर्भर
भूल तेरी बस इतनी थी
रही समर्पित जीवन भर
तेरे समर्पण को सबने निर्बलता का नाम दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
जब स्वयं से तू लड़कर जीती
जग से भी तू जीत रही है
शनैः-शनैः ही पर निश्चित ही
रात अँधेरी बीत रही है
तेरे ढृढ़-संकल्प ने ही रास्ता कुछ आसान किया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
रहो अडिग, रहो अटल तुम
नव-विहान को आने दो
आशा की नयी किरण हो
स्वयं को जग पे छाने दो
उगते सूरज को जग में सबने ही सम्मान दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
एक नए सफ़र पर चल पड़े हो तुम
पर ये सफ़र है या तेरी कोई जुस्तजु ?
तुम्हे है तलब एक ऐसे शै की
जी तेरी प्यास को बुझा दे
महसूस कर रहे हो शायद तुम
कि मुकम्मल नहीं हो तुम
कही है तेरे अंदर कुछ ऐसा
जो उतर आया है बगावत पर
जंग छेड़ दी है उसने आज
चाहिए उसे आज़ादी
तेरे बाकी के वजूद से
उसने तुमसे कर दिए हैं कई सवाल
जिनके जवाबों की खातिर
तुम चल पड़े हो इस सफर पर
घूम रहे हो तुम शहर-दर-शहर
देखे तुमने नए लोग, नए मंजर
देखे तुमने अपनी माजी के हिस्से
सुने बच्चों और बुजुर्गों के किस्से
अनजान गलियों में जो चले तुम
कई चेहरों के तबस्सुम बने तुम
नए तजुर्बे, नए एहसासात मिले
सवालों के शायद जवाबात मिले
अब ये सफर खत्म होने को है
तुम फिर होगे वहीँ जहाँ से थे चले
पर वो जो शख़्स चला था वो न होगा
तुम्हारी शख़्सियत होगी अलहदा
तेरा नजरिया बिलकुल जुदा
शायद इस सफर में
जिसकी इब्तदा भी थी और इन्तहा भी
तुमने आगाज़ किया एक और सफर का
ये वो सफर है जिसमे
मुसाफ़िर को मंज़िल का इल्म नहीं
न राह मालूम न फासला
पर ये वो सफर है
जो तुम्हे खुद तय करनी है
खुद में तय करनी है
जिसमे मुसाफ़िर खुद
और मंज़िल भी खुद
ये भी एक जुस्तजू है
पर इसके मुकम्मल होते ही
बाकी सारे खोज खत्म हो जाएंगे
रहेगी फिर न कोई आरज़ू बाकी
न कोई तलब न कोई ख्वाहिश
फिर न रह जायेगी
किसी सवाल की कोई अहमियत
इल्म का सूरज ऐसे निकलेगा कि
उसकी रौशनी में
खिल उठेगी तेरी शख़्सियत
वैसे जिंदगी भी तो
एक मुसलसल सफ़र ही तो है
जिसकी न इब्तदा मालुम
और न इन्तहा
पर ये सफ़र है या तेरी कोई जुस्तजु ?
तुम्हे है तलब एक ऐसे शै की
जी तेरी प्यास को बुझा दे
महसूस कर रहे हो शायद तुम
कि मुकम्मल नहीं हो तुम
कही है तेरे अंदर कुछ ऐसा
जो उतर आया है बगावत पर
जंग छेड़ दी है उसने आज
चाहिए उसे आज़ादी
तेरे बाकी के वजूद से
उसने तुमसे कर दिए हैं कई सवाल
जिनके जवाबों की खातिर
तुम चल पड़े हो इस सफर पर
घूम रहे हो तुम शहर-दर-शहर
देखे तुमने नए लोग, नए मंजर
देखे तुमने अपनी माजी के हिस्से
सुने बच्चों और बुजुर्गों के किस्से
अनजान गलियों में जो चले तुम
कई चेहरों के तबस्सुम बने तुम
नए तजुर्बे, नए एहसासात मिले
सवालों के शायद जवाबात मिले
अब ये सफर खत्म होने को है
तुम फिर होगे वहीँ जहाँ से थे चले
पर वो जो शख़्स चला था वो न होगा
तुम्हारी शख़्सियत होगी अलहदा
तेरा नजरिया बिलकुल जुदा
शायद इस सफर में
जिसकी इब्तदा भी थी और इन्तहा भी
तुमने आगाज़ किया एक और सफर का
ये वो सफर है जिसमे
मुसाफ़िर को मंज़िल का इल्म नहीं
न राह मालूम न फासला
पर ये वो सफर है
जो तुम्हे खुद तय करनी है
खुद में तय करनी है
जिसमे मुसाफ़िर खुद
और मंज़िल भी खुद
ये भी एक जुस्तजू है
पर इसके मुकम्मल होते ही
बाकी सारे खोज खत्म हो जाएंगे
रहेगी फिर न कोई आरज़ू बाकी
न कोई तलब न कोई ख्वाहिश
फिर न रह जायेगी
किसी सवाल की कोई अहमियत
इल्म का सूरज ऐसे निकलेगा कि
उसकी रौशनी में
खिल उठेगी तेरी शख़्सियत
वैसे जिंदगी भी तो
एक मुसलसल सफ़र ही तो है
जिसकी न इब्तदा मालुम
और न इन्तहा
दिन तुम रख लो
रातें मैं रख लेता हूँ
ख़ामोशियाँ तुम चुन लो
बातें मैं रख लेता हूँ
अपने गीत दे दो मुझे
और मेरी नज़में ले जाओ
चाँद का तसव्वुर रख लूँ मैं
एहसास चांदनी का तुम ले जाओ
जब इस मोड़ से बँट रहीं हैं राहें आज
बाँकी सब भी आधा-आधा बाँट लेते हैं
बस उन लम्हों को छोड़ देना यहीं
उन्हें आज के बाद भी मुकम्मल ही रहने देना
पर वो लम्हे मुकम्मल थे तभी
जब इनमे मैं और तुम दोनों शुमार थे
हमेशा बिना किसी शर्त के
बस उन लम्हों की यादों को
थोड़ा तुम ले जाओ थोड़ा मैं
आज के बाद मैं और तुम साथ
इन यादों में ही रहेंगे
मुझे जब तुमसे बातें करनी होगी
या तेरी उंगलियां छूना चाहूँ कभी
यादों के इसी मोड़ पर वापस आऊंगा चल कर
और उन्ही लम्हों में उतर जाऊँगा मैं
उनमे तुम मिलोगी मुझे वैसे ही
जैसे अब तक मिलती रही थी
तुम्हारा भी जब दिल करे
मेरे कानों में कुछ कहने का
या मेरे कंधे पे सर रख कर सो जाने का
तुम भी आ जाना यहीं
तुम मुझे यहाँ वैसे ही पाओगी
तेरी बाहों को थाम कर
इन्ही राहों में तेरे संग चलते हुए
रातें मैं रख लेता हूँ
ख़ामोशियाँ तुम चुन लो
बातें मैं रख लेता हूँ
अपने गीत दे दो मुझे
और मेरी नज़में ले जाओ
चाँद का तसव्वुर रख लूँ मैं
एहसास चांदनी का तुम ले जाओ
जब इस मोड़ से बँट रहीं हैं राहें आज
बाँकी सब भी आधा-आधा बाँट लेते हैं
बस उन लम्हों को छोड़ देना यहीं
उन्हें आज के बाद भी मुकम्मल ही रहने देना
पर वो लम्हे मुकम्मल थे तभी
जब इनमे मैं और तुम दोनों शुमार थे
हमेशा बिना किसी शर्त के
बस उन लम्हों की यादों को
थोड़ा तुम ले जाओ थोड़ा मैं
आज के बाद मैं और तुम साथ
इन यादों में ही रहेंगे
मुझे जब तुमसे बातें करनी होगी
या तेरी उंगलियां छूना चाहूँ कभी
यादों के इसी मोड़ पर वापस आऊंगा चल कर
और उन्ही लम्हों में उतर जाऊँगा मैं
उनमे तुम मिलोगी मुझे वैसे ही
जैसे अब तक मिलती रही थी
तुम्हारा भी जब दिल करे
मेरे कानों में कुछ कहने का
या मेरे कंधे पे सर रख कर सो जाने का
तुम भी आ जाना यहीं
तुम मुझे यहाँ वैसे ही पाओगी
तेरी बाहों को थाम कर
इन्ही राहों में तेरे संग चलते हुए
ख़ुदा भी कभी-कभी
बहुत इमोशनल हो जाता है
और कभी-कभी
बिलकुल इमोशनलेस
तभी तो कभी जम के बारिश होती है
और कभी जम के सूखा
जब जम के बारिश होती है
तो लगता है
अपने इमोशंस सारे वो
एक ही मौसम में खाली कर देता है
फिर बाकी वक़्त जाने क्या करता है
जिस साल वो ज्यादा इमोशनल होता है
उस साल ज्यादा बारिश होती है
मानसून शायद उसका ही कोई इमोशन है
और साइक्लोन भी
बहुत इमोशनल हो जाता है
और कभी-कभी
बिलकुल इमोशनलेस
तभी तो कभी जम के बारिश होती है
और कभी जम के सूखा
जब जम के बारिश होती है
तो लगता है
अपने इमोशंस सारे वो
एक ही मौसम में खाली कर देता है
फिर बाकी वक़्त जाने क्या करता है
जिस साल वो ज्यादा इमोशनल होता है
उस साल ज्यादा बारिश होती है
मानसून शायद उसका ही कोई इमोशन है
और साइक्लोन भी
बचपन से ही मैंने
कुछ आँखों में झाँक कर
उनके सपनों को देखा है
उनके संग जिया हूँ मैं
उनको महसूस किया है मैंने
संग चला हूँ मैं
कभी उनकी लाठी बनकर
उड़ान भरी है मैंने
कभी उनके पंख बनकर
देखा है मैंने अपनी आँखों से
कि कुछ सपने पानी के
बुलबुलों की तरह उठते और
फिर जैसे यथार्थ की
उँगलियों से टकरा कर
गिर कर टूट जाते
और बह जाते
उन आँखों से आँसू बनकर
पर कुछ सपने जिद्दी होते
उड़ते रहते गुरुत्वहीन बनकर
फिर एक दिन अचानक
बड़ी सहजता से उतर जाते
यथार्थ की धरातल पर
उन आँखों में
एक बड़ी चमक पैदा कर
अब उन आँखों को देखने
तरसती हैं मेरी आँखें
पर जब भी यदा कदा
झांकता हूँ उनमे
देखता हूँ कुछ उदास सपने
कुछ लड़खड़ाते और
कुछ दम तोड़ते सपने
लेकिन फिर भी
पाता हूँ वहाँ
बहुत सारी
खामोश उम्मीदें …
कुछ आँखों में झाँक कर
उनके सपनों को देखा है
उनके संग जिया हूँ मैं
उनको महसूस किया है मैंने
संग चला हूँ मैं
कभी उनकी लाठी बनकर
उड़ान भरी है मैंने
कभी उनके पंख बनकर
देखा है मैंने अपनी आँखों से
कि कुछ सपने पानी के
बुलबुलों की तरह उठते और
फिर जैसे यथार्थ की
उँगलियों से टकरा कर
गिर कर टूट जाते
और बह जाते
उन आँखों से आँसू बनकर
पर कुछ सपने जिद्दी होते
उड़ते रहते गुरुत्वहीन बनकर
फिर एक दिन अचानक
बड़ी सहजता से उतर जाते
यथार्थ की धरातल पर
उन आँखों में
एक बड़ी चमक पैदा कर
अब उन आँखों को देखने
तरसती हैं मेरी आँखें
पर जब भी यदा कदा
झांकता हूँ उनमे
देखता हूँ कुछ उदास सपने
कुछ लड़खड़ाते और
कुछ दम तोड़ते सपने
लेकिन फिर भी
पाता हूँ वहाँ
बहुत सारी
खामोश उम्मीदें …
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