पतंजलि का "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः", और जावेद अख़्तर का "मन से रावण जो निकाले, राम उसके मन में हैं", अर्थ में दोनों मुझे एक ही लगते हैं।
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मूरख तू जिएगा कब !
नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...
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सारी दुविधा, द्वंद्व, विषाद, संशय और प्रश्न अर्जुन के मन में है। दुर्योधन के मन में कोई दुविधा नहीं, कोई संशय नहीं। कृष्ण को भी कोई दुविधा न...
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साधो सहज समाधि भली साधो सहज समाधि भली जंतर-मंतर तू तो करदा मस्जद-मंदर तू तो फिरदा हलचल इतनी फिर क्यों अंदर चल दे अब तू होश गली साधो सह...
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छूट गया जो हमसे मुझे उस डगर की याद आती है मुकम्मल हो सकता था जो उस सफर की याद आती है उस शामो-सहर की, उस बामो-दर की याद आती है घर से जाने...
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