धरा गगन से मिलती है
सुबह-सुबह जहाँ
कली इक उमीद की खिलती है
सूरज लेकर जहाँ आता विहान
शुरू जहाँ करता उत्थान
फिर बाँट कर अपनी ऊर्जा सारी
जहाँ खतम करता ढलान
निरन्तरता है ये जीवन की
आरोहण व अवरोहण की
उर्ध्व-गमन की, अधोपतन की
उन्नयन की, अवनमन की
शाश्वत है ये क्रम प्रकृति का
सुबह आती, फिर आती शाम
हर दिन जैसे नया इक जीवन
औ रात्रि मृत्युपरांत विश्राम
क्या तुम्हें फिर जाना ही होगा ?
रोये थे हम कितने बेबस होकर
क्या उस दिवस को आना ही होगा ?
मैंने तुमसे कहा था छुपा लो मुझको
समय भी जहाँ न ढूंढ पाये आकर
तुमने मुझे पकड़ लिया था कसकर
"आओ, अपने में छुपा लूँ" कहकर
तेरे उस कोमल मन से खेला मैं
और इक बचपन से खेला मैं
किसी कमजोर मनुष्य की भाँति
चला आया दूर अकेला मैं
फेर जगत के समझ ना पाता
बस संग हवा के बहता जाता
रुकना चाहा पर नहीं रुका मैं
ये दोहरा खेल अब नहीं सुहाता
कभी कितना विवश होकर इंसान
कर्म-पथ पर आगे चलता है
दुविधा कभी होती दूर नहीं
वो तिल-तिल कर जलता है
स्वप्न क्या साकार हुए ?
ख़यालों में था जैसा पाया
हासिल भी उसी प्रकार हुए ?
क्या हुआ भी कुछ या निरा भ्रम था ?
व्यर्थ मेरा क्या सारा श्रम था ?
ख़्वाब में तो था मेरे आसमां
यथार्थ पतन का पूरा क्रम था
न चलूँ अकेला कर्म-पथ पर
क्या ऐसा है मुमकिन नहीं ?
सरल जीवन, इच्छाएं कम हों
बोझ मन पर अनगिन नहीं
क्यों दौड़ रहा हूँ हाँफ-हाँफ कर ?
किसके लिए मैं जीता हूँ ?
न उन्हें ही मधु मैं पिला सका
औ' खुद भी विष ही पीता हूँ
मुझे तब कहाँ फुर्सत थी
रुंधे गले से था रोका तुमने
पर मेरी और ही हसरत थी
इक आवाह्न पर निकल गया
कर झटक कर चल दिया
कहीं पर फैला कर तम
कहीं पर जाकर जल गया
नर क्यों मजबूर इतना है !
किस भ्रम में चूर इतना है !
मैं तुम से दूर हुआ कुछ यूँ
सूर्य धरा से दूर जितना है
अब मन में यही विचार करूँ
समय न और बेकार करूँ
यहाँ के दीये बुझाकर अब
दूर घर का अंधियार करूँ
मैं भी उस पथ का राही हूँ
मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
गतिमान हूँ कब से जाने
मंज़िल का पर अनुमान नहीं
कोई मिला तो छूटा कोई
पर अक्सर तन्हा ही चलता हूँ
थके पाँव सहलाता खुद से
गिर के खुद ही सम्हलता हूँ
कभी-कभी जो रुक जाता हूँ
लेने को थोड़ा सा दम
मन के प्रश्न खड़े हो जाते
दिशा बदलूँ या जाऊँ थम?
पूछे अर्जुन कृष्ण कहाँ है?
अंतर्मन में द्वंद्व यहाँ है
गीता का फिर पाठ पढ़ाओ
दिशाहीन सारी दुनिया है
मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
चलते-चलते इतना जाना
रुक जाना भी समाधान नहीं
सत्य न कोई दूर खड़ा
न कोई अंतिम पड़ाव यहाँ
चलना ही जब उत्तर ठहरा
यही जीवन का सार यहाँ
अपनी-अपनी करिये सनम
हज़ार राहें जहाँ में हैं
अपनी-अपनी चलिए सनम
अनसुने अनजाने यहाँ
हैं कितने अफ़साने यहाँ
किसका फ़साना कौन सुने
खुद कहिये ख़ुद सुनिए सनम
दर्द लबों पर आ न जाए
अश्क़ पलक से छलक न जाए
सबके अपने दर्द यहाँ
दिल की दिल में रखिये सनम
सुख कौन किसे दे देता है
दुःख किसका कोई ले लेता है
ये कथनी मन हल्काने के
सब अपनी करनी भरिये सनम
बुझते पलों में कैसे सुलगते प्राण भरूँ
जो उबलता था, अब धमनियों में है अवरुद्ध
पुनः-प्रवाह हेतु उनमें क्या ऊर्जावान भरूँ
कुछ दुनियादारी कुछ अपनी लाचारी है
गुत्थी पूरी उलझी है, कैसे समाधान करूँ
भ्रम से घिरा लक्ष्य, तम से भरा पथ मेरा
ऐसे में सही दिशा का कैसे अनुमान करूँ
जीवन तू सुगम सरल नहीं है लेकिन
अश्रु बहा रचयिता का क्यों अपमान करूँ
नीचे एक स्विमिंग पूल है
सुबह-सुबह ढेर सारे कबूतर
उसके गिर्द जमाबंद बैठ जाते हैं
फिर कोई एक इधर से उधर उड़कर जाता है
तो कोई उधर से इधर
सब पूल के चारो तरफ ही उड़ते हैं
पर कुछ पल से ज्यादा एक जगह पर नहीं बैठता कोई
लगता है मिलकर म्यूजिकल चेयर खेलते हैं
कायनात में जो एक धुन बजती रहती है
उसी संगीत पर खेलते होंगे
पर सोचता हूँ उसे ऑन-ऑफ कौन करता होगा !
किसके हाथ में था खंज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो
हवा से पूछो तो जिसने गिराया इन शाखों को
किस बावत उठा बवंडर, मुझसे ही तुम पूछते हो
ग़ुबार के नीचे से देखो चीखें किसी की आती हैं
इस मोड़ पे थे किस-किसके घर, मुझसे ही तुम पूछते हो
उस आग को तुमने फूंका था जब वो चिंगारी थी
कैसे जला है ये शहर, मुझसे ही तुम पूछते हो
रोती है रातों को जो ख़्वाब सुनहरे देखती थीं
क्यूँ है उन आखों में डर, मुझसे ही तुम पूछते हो
मुसाफिर से भी पहले, जो कदम उठे इन राहों पर
वो आते क्यूँ नहीं नज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो
एक शाम सुहानी लिख देना
नाम मेरा कोई पूछे तो
बस तेरी दीवानी लिख देना
याद मेरी जो आये तो
अश्क़ों को हर्फ़ बना लेना
शब् की स्याह सफहों पर तुम
दिल की कहानी लिख देना
याद है तुमको वो पल क्या
जब तुम जाने वाले थे
आँखों से तूने जो पोछा था
उसको न पानी लिख देना
बरस रहे थे हम तुम दोनों
भींग रहे थे हम तुम दोनों
खामोशी में जो जन्मी थी वो
नज़म पुरानी लिख देना
गीत जो हमने गाये थे
कसमें जो हमने खायी थीं
मैं उनमे जीने मरने लगी
इसे बस नादानी लिख देना
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
न धूप भरी ज़मीं
न सूरज भरा आसमां
न सुकूँ के दिन-रात
न तेरी चाहतों का जहां
तू चली तो मेरे संग हमसफ़र
मगर उन राहों की मुश्किलो के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मैं तो उड़ता रहा हूँ बस
अपने ख़्वाबों की खातिर
तेरे भी तो ख्वाब होंगे
कैसे भूल गया मैं आखिर
तुमने तो ऊँची परवाज़ दी मुझे
पर बाँधने वाले कुछ रिश्तों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
खुद रही है तू क़ैद में एक
और मुझे आज़ाद किया है
सब कुछ अपना छोड़ कर
मेरा जहां आबाद किया है
तूने क्या माँगा था मैं सोचता रहा
मगर मेरे हज़ार झूठे वादों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
और अनजान मोड़ों से गुज़रना है
बैशाखियाँ फिर से न दे देना मुझको
मुझे तो अब बिन सहारों के चलना है
चाँद सा मामूल नहीं हो सकता मेरा
मुझे देर तलक़ सूरज सा जलना है
अपने आशियाने में मत रोक मुझे
अभी तो सहर होने तक चलना है
देर तो होगी, मुश्किलें भी कम नहीं
हवाओं का रुख़ जो अभी बदलना है
दुनिया जलने-बुझने का सिलसिला सही
किसी दिए को बुझना, किसी को जलना है
दैरो-हरम ही सबब हो गए फ़सादात के
छोड़ो फिर मुसाफ़िर क्या मज़हब का करना है
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !
कन्धा जब झुक जाता है
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
मौला ने जो बक्शी है वो
मेरे जीवन की सौगात हो तुम
वज़ह मेरे रोने हंसने की
मेरे दिल की हर जज़्बात हो तुम
तेरे बिन अधूरा सा मैं
मेरी पूरी क़ायनात हो तुम
ख्यालों में ख्वाबों में तुम
रहता हूँ तेरी यादों में गुम
आँखें हर पल ढूंढे तुमको
कानों में तेरे नाम की धुन
मेरा दिन हो तुम, रात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं
मैं बरामदे में पुरानी खाट पर लेटा था
बिजली गुल थी बहुत देर से पूरे शहर की
और घर के अंदर कोई छोटा दीया भी नहीं जला था
बूँदों की शोर में खोया था मैं
पानी की बड़ी बूँद छत से गिरती थी मेरे ऊपर
ज़रूर दूर कहीं ऊँचे आसमान में
ये बूँदें नीचे आती होंगी तुम्हें छूकर
हलकी रौशनी रोशनदान से छनकर आ रही थी
मेरा ध्यान मेज पर रखी तेरी तस्वीर पर चला गया
पुरानी थी पर ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो
तन्हाई भरी शाम में तेरा ख़याल दिल मेरा जला गया
मैं उठ कर कमरे में गया और लैंप जला ली
आलमारी खोली और वो पुरानी लाल वाली डायरी निकाली
कभी पन्ने पलटता तो कभी खिड़की से झाँकता
अंदर तेरी यादों का साया बाहर रात की चादर काली
संग बिताये लम्हों के एहसासात क़ैद थे पन्नों में
कितना ख़ूबसूरत फ़साना अपना साथ गुज़रा जमाना था
कभी मिले ख़ुदा तो उससे पूछूंगा मैं
ज़िन्दगी तो शुरू की थी अभी, अभी क्यों तुम्हें जाना था?
बैठा ही रहूँ
तेरे इस झरने के नीचे
और तुम बरसाते जाओ
शांति जल
वरना कहाँ मन लगे
ये दुनिया तेरी जंगल
कैसे-कैसे पेड़ यहाँ
और कैसे-कैसे फल
घर-घर हैं ये पेड़ लगे
लम्बे हैं पर छाँव नहीं देते
घने पर हवा नहीं
फलों में इनके विष
और छालों पे कांटे
जाने कैसी जलवायु बदली
बीज ही सारे ख़राब हो गए!
लोग कहते हैं
विचार बीज हैं
कर्म जिनके फल
और सोचता हूँ तो लगता है
चरित्र ही वृक्ष है
प्रेम उसकी छाया
व्यवहार छाल
और वाणी बयार
और बात करें जलवायु की तो
जल गुरुजनों की शिक्षा और अनुशाषन
और वायु वो सारी चीजें
मन जिनमे उलझा रहता दिन भर
और सच तो ये है कि
जलवायु करते हैं असर बीजों पर
खुलकर उड़ने न दिया, पिघलकर बहने न दिया
तेरी जुल्फ़ों के साये में ज़िन्दगी मेरी यूँ बीत ही जाती
मेरी बेताबी ने मगर एक जगह मुझे ठहरने न दिया
जुनूँ ही था जो मारा-मारा फिरता रहा दर-ब-दर
घर की चिंताओं ने चैन से घर पर रहने न दिया
शहर की रौशनी ने मगर मुझे गाँव का रहने न दिया
जिस राह चल रहा हूँ उस पर मेरी मंज़िल तो नहीं
कुछ भूख ने, कुछ डर ने अलग राह चलने न दिया
हर सुबह दफ़्तर जाने की ढूंढता हूँ मैं वजह
चाहता तो हूँ, हसरतों ने मगर कभी रुकने न दिया
ज़र्द पुराने पन्नों को
फाड़कर निकालता है
और डस्ट-बिन में डाल देता है
वैसे ही हमारे रिश्ते को
तुमने छोटे-छोटे पुर्जों में
फाड़कर फेंका था उस दिन
मैं आज भी
उन टुकड़ों को ढूंढता हूँ
उस मोड़ पर जाकर
सुना है पर वक़्त ने
तेज आँधियाँ चलायी थीं
उस रोज
उसी में उड़ गए हों शायद
या फिर हर शाम को
जो बारिश होती है
और सारी रात ठहरती है
उसमे बह गए होंगे
कुछ रिश्तों के निशाँ भी
कितनी आसानी से
मिट जाते हैं ना
पर तुम्हारी यादों ने
जो दास्ताँ दिल के
कागज पर लिखी है
वो शायद कभी न मिट पाये
किस परमानेंट इंक से
लिख गयी हो अपना नाम !
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टुकड़ा हस्ती का टूटकर गिर गया कहीं
आरज़ू उसकी हर पल मैं पास रखता हूँ
मेरा था तो मिल ही जाएगा एक दिन
कैसे कहूँ मैं कि ये विश्वास रखता हूँ
बैठ जाऊं फिर तो लम्बा कहीं विश्राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
परिंदा वो जो अपनी परवाज़ ढूंढता है
हूँ वो रस्ता जिसपे कोई मंजिल नहीं
एक साज़ ऐसा जो आवाज़ ढूंढता है
इस जुस्तजू में उम्र सारी तमाम ना हो जाए
चाहता हूँ हिम या बहती जलधारा
दरिया की मौजें या उसका किनारा
सही राह अक्सर पहचान नहीं पाता
जान नहीं पाता अंतर्मन का इशारा
इस ग़फ़लती में गलत कोई अंजाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
रौशन दिवस को तम में ढलना होता है
कोयला है चट्टान मगर जलना होता है
जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं
मन के विरुद्ध खुद को चलना होता है
लड़ रहा हूँ इस युद्ध में हार मेरे राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
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सुमन बिछे पथ नहीं मिलेंगे
शूलों पर ही चलना होगा
भास्कर की शंखनाद सुनो ...
उठो पार्थ, फिर लड़ना होगा
देते क्यों हवि हो सिसक-सिसक कर जीवन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
महा-भारत रुका नहीं है
विवेक से फिर हो मंत्रणा
कृष्ण, सारथी, सखा वही है
पर विचार नहीं अब कर्म करो, कौरवों ने गर्जन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
समर है ये जीवन का जिसमे
विराम नहीं, विश्राम नहीं
अमर हुए जो जीते लड़कर
हारे हुओं का कोई नाम नहीं
गिर, फिसल मगर तू चल, कर इच्छा-शक्ति मन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
चिंताओं का कोई अर्थ नहीं
चेष्टा कोई व्यर्थ नहीं
अश्रु, स्वेद, रक्त बिना
खुशियों की कोई शर्त नहीं
हो मन कठोर, भुजा में जोर, बेला ये दमन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
अर्जुन उठो, योगी बनो
साधना व कर्म करो
भय, चिंता, अहम, संशय
मेरु-अनल में दहन करो
स्वर्ग-सोपान अंतर्दिश, चेतना हो आरोहण की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
बारंबार ठगी गयी है
साहस को तेरे नमन है
चलती रही तू रुकी नहीं है
कहो तो कब इस जग ने तुझको सच्चा मान दिया है?
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
कब से अपने पैरों पर थी
पर थी तब भी पर-निर्भर
भूल तेरी बस इतनी थी
रही समर्पित जीवन भर
तेरे समर्पण को सबने निर्बलता का नाम दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
जब स्वयं से तू लड़कर जीती
जग से भी तू जीत रही है
शनैः-शनैः ही पर निश्चित ही
रात अँधेरी बीत रही है
तेरे ढृढ़-संकल्प ने ही रास्ता कुछ आसान किया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
रहो अडिग, रहो अटल तुम
नव-विहान को आने दो
आशा की नयी किरण हो
स्वयं को जग पे छाने दो
उगते सूरज को जग में सबने ही सम्मान दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!
पर ये सफ़र है या तेरी कोई जुस्तजु ?
तुम्हे है तलब एक ऐसे शै की
जी तेरी प्यास को बुझा दे
महसूस कर रहे हो शायद तुम
कि मुकम्मल नहीं हो तुम
कही है तेरे अंदर कुछ ऐसा
जो उतर आया है बगावत पर
जंग छेड़ दी है उसने आज
चाहिए उसे आज़ादी
तेरे बाकी के वजूद से
उसने तुमसे कर दिए हैं कई सवाल
जिनके जवाबों की खातिर
तुम चल पड़े हो इस सफर पर
घूम रहे हो तुम शहर-दर-शहर
देखे तुमने नए लोग, नए मंजर
देखे तुमने अपनी माजी के हिस्से
सुने बच्चों और बुजुर्गों के किस्से
अनजान गलियों में जो चले तुम
कई चेहरों के तबस्सुम बने तुम
नए तजुर्बे, नए एहसासात मिले
सवालों के शायद जवाबात मिले
अब ये सफर खत्म होने को है
तुम फिर होगे वहीँ जहाँ से थे चले
पर वो जो शख़्स चला था वो न होगा
तुम्हारी शख़्सियत होगी अलहदा
तेरा नजरिया बिलकुल जुदा
शायद इस सफर में
जिसकी इब्तदा भी थी और इन्तहा भी
तुमने आगाज़ किया एक और सफर का
ये वो सफर है जिसमे
मुसाफ़िर को मंज़िल का इल्म नहीं
न राह मालूम न फासला
पर ये वो सफर है
जो तुम्हे खुद तय करनी है
खुद में तय करनी है
जिसमे मुसाफ़िर खुद
और मंज़िल भी खुद
ये भी एक जुस्तजू है
पर इसके मुकम्मल होते ही
बाकी सारे खोज खत्म हो जाएंगे
रहेगी फिर न कोई आरज़ू बाकी
न कोई तलब न कोई ख्वाहिश
फिर न रह जायेगी
किसी सवाल की कोई अहमियत
इल्म का सूरज ऐसे निकलेगा कि
उसकी रौशनी में
खिल उठेगी तेरी शख़्सियत
वैसे जिंदगी भी तो
एक मुसलसल सफ़र ही तो है
जिसकी न इब्तदा मालुम
और न इन्तहा
रातें मैं रख लेता हूँ
ख़ामोशियाँ तुम चुन लो
बातें मैं रख लेता हूँ
अपने गीत दे दो मुझे
और मेरी नज़में ले जाओ
चाँद का तसव्वुर रख लूँ मैं
एहसास चांदनी का तुम ले जाओ
जब इस मोड़ से बँट रहीं हैं राहें आज
बाँकी सब भी आधा-आधा बाँट लेते हैं
बस उन लम्हों को छोड़ देना यहीं
उन्हें आज के बाद भी मुकम्मल ही रहने देना
पर वो लम्हे मुकम्मल थे तभी
जब इनमे मैं और तुम दोनों शुमार थे
हमेशा बिना किसी शर्त के
बस उन लम्हों की यादों को
थोड़ा तुम ले जाओ थोड़ा मैं
आज के बाद मैं और तुम साथ
इन यादों में ही रहेंगे
मुझे जब तुमसे बातें करनी होगी
या तेरी उंगलियां छूना चाहूँ कभी
यादों के इसी मोड़ पर वापस आऊंगा चल कर
और उन्ही लम्हों में उतर जाऊँगा मैं
उनमे तुम मिलोगी मुझे वैसे ही
जैसे अब तक मिलती रही थी
तुम्हारा भी जब दिल करे
मेरे कानों में कुछ कहने का
या मेरे कंधे पे सर रख कर सो जाने का
तुम भी आ जाना यहीं
तुम मुझे यहाँ वैसे ही पाओगी
तेरी बाहों को थाम कर
इन्ही राहों में तेरे संग चलते हुए
बहुत इमोशनल हो जाता है
और कभी-कभी
बिलकुल इमोशनलेस
तभी तो कभी जम के बारिश होती है
और कभी जम के सूखा
जब जम के बारिश होती है
तो लगता है
अपने इमोशंस सारे वो
एक ही मौसम में खाली कर देता है
फिर बाकी वक़्त जाने क्या करता है
जिस साल वो ज्यादा इमोशनल होता है
उस साल ज्यादा बारिश होती है
मानसून शायद उसका ही कोई इमोशन है
और साइक्लोन भी
कुछ आँखों में झाँक कर
उनके सपनों को देखा है
उनके संग जिया हूँ मैं
उनको महसूस किया है मैंने
संग चला हूँ मैं
कभी उनकी लाठी बनकर
उड़ान भरी है मैंने
कभी उनके पंख बनकर
देखा है मैंने अपनी आँखों से
कि कुछ सपने पानी के
बुलबुलों की तरह उठते और
फिर जैसे यथार्थ की
उँगलियों से टकरा कर
गिर कर टूट जाते
और बह जाते
उन आँखों से आँसू बनकर
पर कुछ सपने जिद्दी होते
उड़ते रहते गुरुत्वहीन बनकर
फिर एक दिन अचानक
बड़ी सहजता से उतर जाते
यथार्थ की धरातल पर
उन आँखों में
एक बड़ी चमक पैदा कर
अब उन आँखों को देखने
तरसती हैं मेरी आँखें
पर जब भी यदा कदा
झांकता हूँ उनमे
देखता हूँ कुछ उदास सपने
कुछ लड़खड़ाते और
कुछ दम तोड़ते सपने
लेकिन फिर भी
पाता हूँ वहाँ
बहुत सारी
खामोश उम्मीदें …
थक गयी है बहते-बहते
रुक कर सांस लेना चाहती है
खुद को समेट कर
महसूस करना चाहती है
समंदर को देखो
बिखरा है पसरा है
बहता नहीं वो
कब से ठहरा है
नदी औरत है
उसमे इमोशंस हैं
वो फ्री फ्लोइंग है
फील करती है वो
मर्द समंदर है
सीने में सब ज़ब्त रखता है
उसमे ठहराव है
लहरें अंदर ही ख़ामोश करता है
दोनों हैं पानी मगर
जुदा हैं दोनों में फ़र्क़ है
एक में फीलिंग्स की मिठास है
दूसरे में लॉजिक का खारापन
बस दो कमीज़ें हैं
नीली और उजली
उन्ही को वो बदल-बदल
दिन में पहनता है
और रात को ठण्ड में
एक काली चादर ओढ़ लेता है
कभी-कभी जब
उसकी कमीज़ पे
काले-काले धब्बे पड़ जाते हैं
तो जाने कहाँ से
बौछारें आ जाती हैं ऊपर से
और धब्बों को मिटा जाती हैं
कुल मिला जुला कर
इन्ही कपड़ों में
मैनेज कर लेता है बेचारा
सचमुच कितना मुफ़लिस है
आसमां ....
हमारी गलियों में
कभी -कभी वो
एक शख़्स आता था
चेहरे पे नक़ाब रख के
उसकी पीठ पर
एक टैंक होती थी
पाइप में एक नोजल लगा के
वो एक केमिकल स्प्रे करता था
नालियों में
हम बच्चे पूछते तो कहता कि
सारे मच्छर और जर्म्स
मर जाएंगे इससे
काश हमने वो
केमिकल भी बनायी होती
जिसे स्प्रे करने से
इंसान के अंदर के
मच्छर भी मर जाते
क्या कुछ नहीं पाल रखा है
हमने ज़ेहन में
इनटॉलेरेंस और हैट्रेड के जर्म्स
जाने कैसे पनप गए
प्यार जो इनका एंटीडोट है
वो तो खुदा ने हमारी रगों में
पूरा भर के दिया था
अब लगता है ब्लड में
उसका लेवल कम हो गया गया है
शायद इंसान जल्द
कुछ ऐसा इज़ाद कर ले
कि आज जैसे ग्लूकोज़
चढ़ाते हैं रगों में
वैसे कल प्यार भी चढ़ा सकें
बस वीकेंड भर के लिए
सैटरडे मॉर्निग दोनों ने तय किया
कि मिलते हैं लंच पर
लंच के टाइम पर उसने
ऑफिस से उसको पिक किया
एक अच्छे चाइनीज़ रेस्टोरेंट में
फिर दोनों ने लंच किया
वापसी में उसने
उसे ऑफिस में ड्राप कर दिया
शाम को वो देर से घर आई
कुक का खाना खाकर दोनों सो गए
संडे का दिन है कल
किसी को ऑफिस नहीं जाना है
एक दूसरे के साथ
बिताने को है पूरा दिन
ये तो लक्ज़री ही है
आज के लाइफ की
रात को फिर वो चला जाएगा
हस्बैंड वाइफ हैं दोनों …
आदतन मैं गाँव में था
बाँकी सब तो ठीक था
पर आँगन की उदासी
बड़ी खल रही थी
मुझे वहां पसरे हुए
सूनेपन का एहसास हो रहा था
वो शायद इसलिए दुखी था
कि उसके सर से बूढ़े पेड़ का
साया उठ गया था
मुझे याद कि कितनी चहल पहल
रहती थी आँगन में दिन भर
बच्चों ने झूला बनाकर रखा था
पेड़ की टहनियों पर
घंटो झूलने के बाद जब आँगन में
कूदते थे तो लगता था कि
ख़्वाबों की फ्लाइट लैंड हुई हो
बूढ़े पेड़ ने कभी उस पर अपने
बड़े होने का एहसास नहीं दिलाया था
उसे पता था कि खड़ा है वो इसलिए कि
उसकी जड़ें ज़मीन से जुडी हुई हैं
पर गाँव में एक नया मंदिर बना था
उसकी लकड़ियाँ वहीँ काम आई हैं
बेरहमी से लोगों ने काटा था
उसकी मजबूत और पुरानी जड़ों को
आँगन की बातों से मुझे लगा
मैं भी तो शहर जाकर काट रहा हूँ
गांव से जुडी मेरी जड़ों को
मैं जाने किस मंदिर के काम आऊंगा!
सूफ़ीयाना कैफ़ीयत
और मन कुछ इस तरह का हो गया है ....
क्या करूँ कहीं रमे ना
काम काज कुछ जमे ना
कहीं रहूँ कुछ भी करूँ
ध्यान तुझसे हटे ना
खो जाऊं बस तुझ ही में
मैं मुझमे अब बचे ना
राहे-फ़ना में बहता जाऊं
उफनती धार अब थमे ना
दरस तेरी मेरा मुकद्दर
तेरे सिवा कुछ दिखे ना
जो है जहाँ में वो तू है
तू नहीं तो कुछ रहे ना
बेरोज़गार
तेज धूप है और ... पथरीले रास्ते हैं .... और सन्नाटा है ...
बवंडर है ... धूल उड़कर आँखों में आती है और छोटे छोटे पत्थर बदन में चुभते हैं ...
कपडे तर हो चुके हैं औए जूते घिस कर फटे हुए मुंह चिढाते हैं ...
फिर अचानक एक भीड़ में पाता हूँ खुद को ... सबकी हालत एक जैसी ...
लेकिन चल रहे हैं एक ही जानिब .... लगता है कुछ मिलने वाला है ...
लेकिन डर है ... कि कोई और छीन न ले उसके हाथों में आने से पहले ......
फिर सब थम सा जाता है .....
दोस्त की आवाज़ सुनता हूँ ..... आँखें खुली तो एहसास हुआ दोपहर का वक़्त है ...
मैं उठता हूँ ... कपडे ठीक कर अपनी फाइल उठाता हूँ ....
और इंटरव्यू के लिए चल देता हूँ ...
वही मंज़र उभरने लगते हैं फिर .....
पता नहीं मैं पहले ख्वाब में था या किसी इंटरव्यू की लाइन में !
जब मैं ख़ुद से मिला
कितनी आगे निकल चुकी है दुनिया ये समझने को
ज़िन्दगी की आपाधापी में ख़ुद को ही भूल गया था
बरसों बाद वक्त निकाला था उस रोज़ ख़ुद से मिलने को
अपने साथ आखिरी बार कब बैठा था ये याद नही
क्या ख़ुद को पहचान पाउँगा भय था इस बात का भी
खैर, हिम्मत की, आगे बढ़ा, ख़ुद की तरफ़ हाथ बढाया
एक आवाज़ सुनी, ये मेरी तन्हाई में खलल देने कौन आया
मैंने कहा मैं अपनी कुछ उलझनें दूर करने आया हूँ
ज़िन्दगी से क्या चाहता हूँ कुछ सवाल करने आया हूँ
कब से चल रहा हूँ अब तो वक्त का भी अंदाज़ा नही
थक चुका हूँ मैं बहुत, थोड़ा आराम करने आया हूं
फिर वही आवाज़ सुनी, मैं तो हमेशा तेरे साथ ही था
तुम ही थे मशरूफ़ बहुत, मुझे तो तेरा इंतज़ार था
कुछ वक़्त है तुम्हारे पास कि कुछ वक्त निकाल पाओ?
जरूरी ये कि बातें करें हम, थोड़ी देर दुनिया भूल जाओ
मैं बैठ गया गीली रेत पर, सामने ख़ुद भी बैठा था
सब कुछ भूल गया था मैं, माहौल ही कुछ ऐसा था
ख़ुद ने कहा चलना जीवन का नाम है बस चलते रहो
पर क्या इल्म है अपनी मंज़िल का, आख़िर कहाँ जा रहे हो?
मेरी मंज़िलऔर मेरा ठिकाना तो लोगों ने मुक़र्रर किया है
रास्ते बनाए दुनिया ने जिन पे मैंने बस सफ़र किया है
ख़ुद की बात सुनी है कब, सुन के भी कभी समझा नहीं
जो चाहता था वो कर पाऊंगा , ऐसा रहा कभी हौसला नहीं
देर से ही सही पर बात मेरी समझ में आ गई
मेरी जिंदगी बस मेरी है किसी और की नहीं
क्यों सुनूँ किसी और की बात बस ख़ुद का कहा सुनूँ
ख़ुद ने जो बताया अब उसी रास्ते पर चलूँ
हो सकता है शुरू में थोड़ा भटकना पड़े
पर खुशी होगी मुझे इस बात की
कि मैं चला वो राह जो ख़ुद ने चुनी
हाँ हाँ वो राह जो ख़ुद मैंने चुनी
वो गूंज रहा है अब भी एक विलंबित ख़याल की तरह ....
कशिश उसके धुन की
ज़िन्दगी हो गई गोया
रात चौदहवीं की
फिर मेरे आसमां में
कोई जगमगाता रहा
साज़ दिल के बजते रहे
वो गुनगुनाता रहा
सहर की आमद हुई
फिर शोर बढ़ने लगा
सुर ढीले होते चले
साज़ धीमा पड़ने लगा
अब बिगड़ रही ज़िन्दगी
बड़े मियाँ के बिगड़ते
हाल की तरह
पर अब भी मन में वो
गूंज रहा है एक विलंबित
ख़याल की तरह .……
भाग रहा कहाँ यूँ बेतहाशा आदमी, है किस चीज़ का इस क़दर प्यासा आदमी .....
सुबह सुबह मैं भी सूरज के साथ निकला
दोनों में किसी का रस्ता नहीं बदला
शुरू हो गई थी जद्दोज़हद एक और दिन की
ढल गया शाम को, दिन भर इतना चला .........
सब चल रहे हैं, पर किधर ये इल्म नहीं। आंखों में कुछ सपने हैं, दिल में अरमान कई। लम्बी दौड़ती सड़कें हैं, मंजिल का नामोनिशां नहीं। एक होड़ है आगे निकलने की, कहीं पहुँचने की। इसी आपाधापी में सब कुछ भूले पड़े हैं। छोटी छोटी बातों में अब खुशी नहीं मिलती है, हाँ इंतज़ार रहता है एक किसी बड़े कारण का, जिस दिन बहुत खुश होंगे। उस दिन, उस पल की तैयारी में लगे हैं। ज़िन्दगी, तुझमे अब वो बात नहीं रही, तेरी ऊँगली थाम कर चलने में अब मज़ा नहीं आता है। तू धीमी हो गई है, ज़माने की रफ़्तार बढ़ गई है। एक जिद लिए दौड़ रहे हैं, तुम्हे बहुत पीछे छोड़ दिया है।
ज़िन्दगी, मैं तेरी टैक्सी में बैठा हूँ
तुमने उम्र का मीटर ऑन कर दिया है
बड़ा मंहगा सफर है, इसमें तो
साँसों का बटुआ खाली हो जाएगा
एक दरिया की तरह
तुम आए थे ठहराव बन कर
दोनों हाथों का किनारा देकर
तुमने पूरा समेट लिया था मुझे
पहली बार मुझे अपनी गहराई
का एहसास हुआ था तब
पर तुम तो जानते थे
रुकना मेरी फितरत थी नही
बह गया एक दिन फिर
उन मजबूत किनारों को तोड़कर
तुम पीछे छूटते गए
और मैं बहता गया
अब आलम ये है की
मंजिल का इल्म नही
और समंदर की चाहत नहीं
एक कश्ती लेकिन अब भी
बह रही है संग मेरे
वो तेरी यादों की है
शायद ही किनारा लग पाएगी अब
आरज़ू माना अपने हैं वो हालात कहाँ से लाओगे
दिल संग हो चुका अब दरिया-ऐ-चश्म बहता नहीं
अब बिछडे तो अश्कों की बरसात कहाँ से लाओगे
वो तेरा फिर कहना कि एक मुलाक़ात लाज़िमी है
हम मिल जाएँ पर करने को बात कहाँ से लाओगे
दरमियान अपने एतबार कहीं गुम हो चुका है अब
वो खामोशी, वो सुखन, वो ख़यालात कहाँ से लाओगे
ज़माना बदल जाओगे मुसाफिर किस ख्वाब में जीते हो
वो हौसले, वो इरादे, वो जज़्बात कहाँ से लाओगे
निशाँ अब भी है बांकी ....
उन्होंने कभी मोहब्बत के बीज डाले थे
सींचा करते थे उसे अरमानों से
हरा भरा पौधा निकल आया था वहां रिश्ते का एक
वक्त के साए में बढ़ता रहा वह
बड़ा पेड़ हो गया था
विश्वास की मजबूत डालियाँ थीं उसकी
सपनों के पंछियों का बसेरा था उन पर
फिर एक दिन कहीं से तूफ़ान आया था
डालियाँ टूट गयीं थीं सारी
घोसले बिखर कर ज़मीं पे आ गिरे थे
ठूंठ पेड़ अभी भी खड़ा है वहीँ
यादों की जड़ें जो फ़ैल गयीं थीं
पूरी तरह ज़मीं के अन्दर
उन्ही मजबूत जड़ों ने उसे
संभाल रखा है .....
पलकों में मोती सा छुपा रखा क्या है
तमाशा देखने वालों घरों को जाओ
रात गुजर चुकी अब बचा क्या है
जले हैं घर जिनके पूछो उनसे जाकर
क्या बचा पाये हैं और जला क्या है
गाँव अपना छोड़ तुम शहर आ गए
बूढे माँ बाप वहां, यहाँ ऐसा क्या है
रातों को अक्सर टहलता है फलक में
कभी आधा कभी पूरा ये अजूबा क्या है
लब से कहा कुछ न आँखें पढने दी
उश्शाक बतलाएं हमें ये अदा क्या है
बाहर निकले तुम न हमें घर आने दिया
बात क्या है आख़िर तुम्हे हुआ क्या है
गरीब की छप्पर से धुंआ निकला है
देखो तो उसके घर जला क्या है
किस ख्वाहिश को इस बार मारा है
तेरी आंखों से फिर बह रहा क्या है
ढूंढ लूंगा एक दिन तुमको ऐ जिंदगी
मुसाफिर को चलने की सज़ा क्या है
मेरा भारत महान?
जिसके लिए इतनी लड़ाईयां लड़ी थीं
इतनी सारी कुर्बानियों की
हमने कहानियां पढ़ी थीं
फिर क्यूँ भूल गए वो कुर्बानियां
अपने पूर्वजों की वो मेहरबानियाँ
ये उनके सपनों का प्रजातंत्र नहीं है
खो गया लगता इसका मूलमंत्र कहीं है
आज भी इंसान पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है
विचारों से व्यवहारों से परतंत्र कहीं है
मजबूत जड़ से भी शाखाएं मजबूत पनप नहीं सकीं
गाँधी के सपनों की दुनिया बस नही सकी
शिक्षा का प्रसार हम कर नहीं सके
सुविधाओं में सुधार हम कर नहीं सके
तंत्र में लोगों का विश्वास जगा नही सके
योग्य उम्मीदवारों की कतार लगा नही सके
लोग आज भी यहाँ दुःखहाल हैं
गाँवों के मंजर और भी बदहाल हैं
शासक आज भी यहाँ शोषक है
चुनावी जोड़ तोड़ बड़ा रोचक है
शासित आज भी यहाँ शोषित है
रामधीन का बेटा आज भी कुपोषित है
नेताओं मंत्रियों को अपनी जिम्मेदारियों का भान नहीं है
जनता को भी अपने कर्तव्यों का ज्ञान नहीं है
कदाचित ये सपनों का भारत महान नहीं है ........
बारिश
वक्त ले आया है उन्ही हवाओं को
दिल के आसमां में
फिर जज़्बातों के बादल उमडेंगे
बारिश होगी फिर रात भर
आंखों से ......
त्रिवेणी
तेरी मांग का सिन्दूर मुझे दिख गया था
मेरे अरमानों के खून का रंग अभी भी था उसमे
वाह रे मीर, खुदा-ऐ-सुखन ....
"कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था"
और ज़ौक फरमाते हैं .....
"न हुआ पर न हुआ मीर का अंदाज़ नसीब"
उसी मीर के बारे में एक video हाथ लगी है .... share कर रहा हूँ ......
लहरों ने आवाज़ दी .....
मैं साहिल पे बैठा था
हमेशा की तरह अकेला
सूरज को ढलते देख रहा था
एक अजीब सी कशिश थी चारों तरफ़
सुरूर पुरी तरह मेरे उपर छा रहा था
नमी से भरी हवा चेहरे पे आ रही थी
मैं भी कोई गीत गुनगुना रहा था
समंदर अपनी बाहें फैलाए
बड़े इत्मीनान से लेटा हुआ था
किरणें उसे छूकर जा रही थीं
वो जुदाई के ग़म में डूबा हुआ था
कुछ देर में ख़तम हो जाएगा सब
मैं शायद ऐसा ही सोच रहा था
उठते और गिरते लहरों की शोर में
अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था
ये जो दो लम्हे बचे थे रात से पहले
उनमे मेरा दिन भी सिमट रहा था
ऐसा लगा लहरों ने आवाज़ दी हो मुझे
मैं जब उठ के साहिल से जा रहा था
न उतरा हूँ न उतरूंगा
मैं सूरज हूँ मैं चमकूंगा
तुम दूर बैठ कर देखोगे
सबकी जुबां पे चढ़ जाऊँगा
आवारा बादल का टुकड़ा हूँ
न जाने कहाँ, पर बरसूँगा
मस्त हवा का झोंका हूँ
खुशबु ले कर उड़ जाऊँगा
दूर हटो ऐ दुनिया वालों
आज सुनो, बस मैं बोलूँगा
याद करोगे देर तक तुम
चालें ऐसी कुछ चल जाऊंगा
गौर से देख लो मुझको
गया, फिर हाथ न आऊंगा
उन्मादी दरिया का पानी हूँ
हर बंध तोड़ बह जाऊँगा
जुनू है ऐसा जीवन का
मौत से भी लड़ जाऊँगा
बूँदें मोहब्बत की ...
वो आँधी जो बारिश लाएगी
बड़े-बड़े बादल के काले टुकड़े
मुसलाधार बरसाएंगे मोहब्बत की बूँदें
सुना है दूर उस पहाड़ी के पीछे है वो जगह
पर इतना आसान नहीं है वहां तक पहुंचना
इस बार सबको मिलकर बड़ी कोशिश करनी होगी
चाहते गर मोहब्बत का नाम-ओ-निशाँ बचाकर रखना
जीवन को कई रंग बदलते देखा ...
जिसकी बागडोर क्रूर समय के हाथ है?
या ये वो पाल वाली नौका है
जो हवा के थपेडों और तेज धार से संघर्षरत है?
या किस्मत इसकी भारतीय रेल के डब्बे सी है
जो अगर जलती नही तो पुल से गिरती है?
या महत्वाकांक्षाओं का भारी बक्सा है
जिसे सर पे लिए हर शख्स कहीं भाग रहा है?
या फिर ये जिम्मेदारियों का लंबा चौडा अहाता है
जहाँ क़ैद होकर इंसान मौत की राह जोहता है?
मुसाफिर तू तन्हा कहाँ है!
एक दरिया गुनगुनाती है संग मेरे
कुछ यादें, कुछ बातें, कुछ नज्में मेरी
कोई खुशबु, कुछ ख्वाब, कई चेहरे
गज़लों की एक पुरानी किताब भी
एक पोटली ग़म की और दूसरी फटी हुई
चलते रहने की जरुरत का एहसास भी
एक ही रस्ते पर सब चलते हैं संग मेरे
मैं तन्हा कहाँ हूँ!
थोड़ा गालिबाना हो जाएँ ....
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या ...
.... ग़ालिब के बारे में बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और कहा गया है लेकिन मेरी पहचान इस अजीम शख्सियत से एक दूसरे उतने ही बड़ी शख्सियत ने कराई। मैं और मेरी जेनरेशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसके लिए ताउम्र गुलज़ार साहब का कर्ज़दार रहेगा जिन्होंने अपने टीवी सीरियल के ज़रिये हमें गालिबियत से रूबरू कराया। ये सीरियल बेहतरीन था और ग़ालिब को maases के बीच लोकप्रिय करने में बहुत कामयाब रहा। ये बात दीगर होती है लोग जिस तेरह से गालिबाना अंदाज़-ऐ-बयाँ का इस्तेमाल करते हैं रोज़मर्रा की बोलचाल की भाषा में। मुझे लगता है की ग़ालिब के अलावा कबीर ही दूसरे कवि होंगे जो आवाम में इतने या इससे थोड़े अधिक मशहूर होंगे। मीर, जिनका लोहा ग़ालिब भी मानते थे, को लोकप्रिय करने के लिए फिर एक काबिल शख्सियत को आगे आना पड़ेगा। ऐसे कुछ और नाम होंगे।
ग़ालिब, गुलज़ार फरमाते हैं कि उनके लिए एक आम पड़ोसी के जैसा था जिसे आम का बेहद शौक़ था और जो शराब से अपने लगाव को कभी किसी से छुपाता नही था। दरअसल, अपनी मुफलिसी और मुश्किलों को ग़लत करने के लिए ग़ालिब ने शराब से दोस्ती बढ़ा ली थी। अपनी इस दोस्ती को ग़ालिब ऐसे बयाँ करते हैं -
ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी-कभी
पीटा हूँ रोज़-ऐ-अब्र -ओ- शब्-ऐ-माहताब में
मैं आज भी याद करता हूँ ग़ालिब को इक बे-खौफ शायर के रूप में जिसने जिंदगी अपने तरीके से जी जब कि हालात और ज़माना दोनों लंबे अरसे तक उनके ख़िलाफ़ रहे।
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना, कि यूँ होता तो क्या होता?
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