शाम का वक्त था
मैं साहिल पे बैठा था
हमेशा की तरह अकेला
सूरज को ढलते देख रहा था
एक अजीब सी कशिश थी चारों तरफ़
सुरूर पुरी तरह मेरे उपर छा रहा था
नमी से भरी हवा चेहरे पे आ रही थी
मैं भी कोई गीत गुनगुना रहा था
समंदर अपनी बाहें फैलाए
बड़े इत्मीनान से लेटा हुआ था
किरणें उसे छूकर जा रही थीं
वो जुदाई के ग़म में डूबा हुआ था
कुछ देर में ख़तम हो जाएगा सब
मैं शायद ऐसा ही सोच रहा था
उठते और गिरते लहरों की शोर में
अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था
ये जो दो लम्हे बचे थे रात से पहले
उनमे मेरा दिन भी सिमट रहा था
ऐसा लगा लहरों ने आवाज़ दी हो मुझे
मैं जब उठ के साहिल से जा रहा था
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1 comment:
Ye soch pana hi aapko bada banata hai...
"समंदर अपनी बाहें फैलाए
बड़े इत्मीनान से लेटा हुआ था"
"कुछ देर में ख़तम हो जाएगा सब
मैं शायद ऐसा ही सोच रहा था
उठते और गिरते लहरों की शोर में
अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था"
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