शाम का वक्त था
मैं साहिल पे बैठा था
हमेशा की तरह अकेला
सूरज को ढलते देख रहा था
एक अजीब सी कशिश थी चारों तरफ़
सुरूर पुरी तरह मेरे उपर छा रहा था
नमी से भरी हवा चेहरे पे आ रही थी
मैं भी कोई गीत गुनगुना रहा था
समंदर अपनी बाहें फैलाए
बड़े इत्मीनान से लेटा हुआ था
किरणें उसे छूकर जा रही थीं
वो जुदाई के ग़म में डूबा हुआ था
कुछ देर में ख़तम हो जाएगा सब
मैं शायद ऐसा ही सोच रहा था
उठते और गिरते लहरों की शोर में
अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था
ये जो दो लम्हे बचे थे रात से पहले
उनमे मेरा दिन भी सिमट रहा था
ऐसा लगा लहरों ने आवाज़ दी हो मुझे
मैं जब उठ के साहिल से जा रहा था
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है
हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है भूली हुई हर तस्वीर खुद-...
-
सारी दुविधा, द्वंद्व, विषाद, संशय और प्रश्न अर्जुन के मन में है। दुर्योधन के मन में कोई दुविधा नहीं, कोई संशय नहीं। कृष्ण को भी कोई दुविधा न...
-
साधो सहज समाधि भली साधो सहज समाधि भली जंतर-मंतर तू तो करदा मस्जद-मंदर तू तो फिरदा हलचल इतनी फिर क्यों अंदर चल दे अब तू होश गली साधो सह...
-
प्रेम गली अति साँकरी, जा में दुई ना समाय जब "मैं" था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाय कबीर को समझा नहीं जा सकता है, हाँ कबीर हुआ ज...
1 comment:
Ye soch pana hi aapko bada banata hai...
"समंदर अपनी बाहें फैलाए
बड़े इत्मीनान से लेटा हुआ था"
"कुछ देर में ख़तम हो जाएगा सब
मैं शायद ऐसा ही सोच रहा था
उठते और गिरते लहरों की शोर में
अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था"
Post a Comment