जीवन को कई रंग बदलते देखा ...

जीवन क्या कठपुतलियों का एक नृत्य है
जिसकी बागडोर क्रूर समय के हाथ है?
या ये वो पाल वाली नौका है
जो हवा के थपेडों और तेज धार से संघर्षरत है?
या किस्मत इसकी भारतीय रेल के डब्बे सी है
जो अगर जलती नही तो पुल से गिरती है?
या महत्वाकांक्षाओं का भारी बक्सा है
जिसे सर पे लिए हर शख्स कहीं भाग रहा है?
या फिर ये जिम्मेदारियों का लंबा चौडा अहाता है
जहाँ क़ैद होकर इंसान मौत की राह जोहता है?

No comments:

मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...