रस्ते ही रस्ते हैं यहाँ, कोई मन्ज़िल है कहाँ
भागते रहोगे जब तलक़, तुम रहोगे तन्हा
वो जो मन्ज़िल सी है वहाँ देखो पहुँच कर
एक और मन्ज़िल का रस्ता फिर मिलेगा वहाँ
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रस्ते ही रस्ते हैं यहाँ, कोई मन्ज़िल है कहाँ
भागते रहोगे जब तलक़, तुम रहोगे तन्हा
वो जो मन्ज़िल सी है वहाँ देखो पहुँच कर
एक और मन्ज़िल का रस्ता फिर मिलेगा वहाँ
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चला हूं जब तक बतलाये पथ पर
सबने हृदय से स्वीकार किया
चयन किया स्वयम् पथ का जो मैंने
मुझे उसी जग ने दुत्कार दिया !
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कभी सुख की गंगा में मैं तैरता रहा
तो कभी दुख की यमुना में डूबता पाया
जीवन रूपी संगम पे बैठा मुसाफ़िर
सरस्वती आनंद की पर ढूँढ न पाया
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हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है भूली हुई हर तस्वीर खुद-...