हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है


दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है

भूली हुई हर तस्वीर खुद-ब-खुद लौट आती है

उस शामो-सहर की, बामो-दर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है


परदेस की इन राहों में जब मन भर आता है

हर अपना-सा चेहरा कुछ कहकर रह जाता है

घर से जाने के बाद मुझे घर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है


नींद खुली आँखों में भी कुछ ठहर-सा जाता है

जो पाया न जा सका वही दिल को बहलाता है

ख़्वाब देखा था जो उस मंज़र की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया

हर किनारे ने मुझे बस आज़माया


देकर बाँहों का सहारा तुमने मुझे थामा था

गहराई को अपनी तब मैंने पहचाना था

बहने वाले को कब मगर रुकना आया

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया


न साहिल की चाह रही और न चाहूँ समंदर

तेरी यादों के संग बहूँगा मैं उम्र भर

हर बीता कल मुझसे जुदा होता आया

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है भूली हुई हर तस्वीर खुद-...