मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू
कर्म से मत भाग तू
मन में अब ठान तू
चुनेगा उत्थान तू

जीवन तो बहता जाए
कौन इसे बाँध पाए
जी ले यहाँ इसी पल तू
कहाँ ये वापस आए

जो होता है स्वीकार कर
सुख-दुःख अंगीकार कर
जो भी मिले अपना ले तू
अब व्यर्थ न विचार कर

यही क्षण है सबसे बड़ा
आज नहीं तो फिर कब
सोच में क्यों उलझा पड़ा
मूरख तू जिएगा कब !

जीत-हार

हार पर अपने अश्रु बहाऊँ क्यूँ
डर कर मैं यूँ रुक जाऊँ क्यूँ
एक रण ही तो हारा हूँ मैं
हिम्मत भी हार जाऊँ क्यूँ

विजय पर अपने इतराऊँ क्यूँ
जीत का जश्न मनाऊँ क्यूँ
जो पाया वो तो प्रसाद है
उपलब्धि अपनी बतलाऊँ क्यूँ

मैं कहाँ तेरे शहर में ठहर पाऊँगा

मैं कहाँ तेरे शहर में ठहर पाऊँगा
चलते-चलते वहाँ से गुज़र जाऊँगा

अब तुम करो या न करो याद मुझे
मैं रोज़ ही तेरा नाम दोहराऊँगा

ठहरूँ कहाँ, रुकूँ मैं किस मोड़ पर
दिल चाहे भी तो मैं निकल जाऊँगा

हर मोड़ ने मुझसे मेरा कुछ छीना है
टूटा हूँ ऐसा, अब तो बिखर जाऊँगा

मुसाफ़िर हूँ, क्या लौट कर आऊँगा
जो छूट गया उसे यहीं छोड़ जाऊँगा

वो था जो छूटा मेरा, डगर याद आ गया

वो था जो छूटा मेरा, डगर याद आ गया
जो ना था पूरा हुआ, सफ़र याद आ गया

ग़म की रातों में, तेरी याद आ गई
कल की बातों में, तेरी बात आ गई
भूला था मैं उसे, वो मगर याद आ गया

दूर इतना आ गया, सब पीछे रह गए
आ जाना लौट कर, वो मुझसे कह गए
हिचकी आई जब मुझे, घर याद आ गया

कितनी दूर निकल आए हैं

छोड़कर अपना सब कुछ पीछे
कितनी दूर निकल आए हैं

सपने थे कितने जीवन को लेके
उनको गिरवी रख आए हैं

गुज़रे कल के ख़यालों में
तन्हा चल कर आए हैं

राहों और सफ़र की यादें
दिल में भर कर लाए हैं

कंधों पर कुछ बोझ पुराने
ख़ुद ही ढोकर लाए हैं

पूछे मन हर मोड़ पे ख़ुद से
क्या राह सही चल पाए हैं

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

पूरा हो न सका जो उस सफ़र की याद आती है


दिन ढलते ही दिल में जब मायूसी छा जाती है

भूली हुई हर तस्वीर खुद-ब-खुद लौट आती है

उस शामो-सहर की, बामो-दर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है


परदेस की इन राहों में जब मन भर आता है

हर अपना-सा चेहरा कुछ कहकर रह जाता है

घर से जाने के बाद मुझे घर की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है


नींद खुली आँखों में भी कुछ ठहर-सा जाता है

जो पाया न जा सका वही दिल को बहलाता है

ख़्वाब देखा था जो उस मंज़र की याद आती है

हमसे छूट गया जो उस डगर की याद आती है

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया

हर किनारे ने मुझे बस आज़माया


देकर बाँहों का सहारा तुमने मुझे थामा था

गहराई को अपनी तब मैंने पहचाना था

बहने वाले को कब मगर रुकना आया

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया


न साहिल की चाह रही और न चाहूँ समंदर

तेरी यादों के संग बहूँगा मैं उम्र भर

हर बीता कल मुझसे जुदा होता आया

मैं बहता रहा, मुझे ठहरना न आया

मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...