तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं

तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं
तेरे बिन इस दिल को कोई रंग लुभाता नहीं

रस्ता तो हो वो जिसपे तुम हो मेरे हमसफ़र
हाथों में तेरा हाथ जब मंज़िल आए नज़र
धूप-छाँव हो या हो बारिश या फिर अँधेरा
तुम संग रहो तो आसान है मेरा हर सफ़र

तेरा ज़िक्र न हो जिसमें, गीत वो सुन पाता नहीं
तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं

मेरे हमदम तुमसे ही ज़िंदगी की ये बहार है
हर फूल में ख़ुशबू, हर लम्हा गुलज़ार है
तेरे दम से रौशनी है मौसम का मिज़ाज 
खिलखिलाती सुबह, शाम भी खुशगवार है

तेरे बिन कोई ख़्वाब, ज़िंदगी का बुन पाता नहीं
तेरी आँखों के सिवा मुझे कुछ और भाता नहीं

मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...