कौन हमें
अपनों से दूर कर
खींचता है अपनी तरफ !

हमारे एम्बीशन्स हैं शायद
मैगनेट की तरह उनसे
चिपक जाते हैं हम

और रिश्ते तो
वैसे भी कमजोर
हाइड्रोजन बॉन्ड की तरह हैं
उनको टूटने में
कहाँ वक़्त लगता है !
बाहर मुसलसल बारिश हो रही थी
मैं बरामदे में पुरानी खाट पर लेटा था
बिजली गुल थी बहुत देर से पूरे शहर की
और घर के अंदर कोई छोटा दीया भी नहीं जला था

बूँदों की शोर में खोया था मैं
पानी की बड़ी बूँद छत से गिरती थी मेरे ऊपर
ज़रूर दूर कहीं ऊँचे आसमान में
ये बूँदें नीचे आती होंगी तुम्हें छूकर

हलकी रौशनी रोशनदान से छनकर आ रही थी
मेरा ध्यान मेज पर रखी तेरी तस्वीर पर चला गया
पुरानी थी पर ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो
तन्हाई भरी शाम में तेरा ख़याल दिल मेरा जला गया

मैं उठ कर कमरे में गया और लैंप जला ली
आलमारी खोली और वो पुरानी लाल वाली डायरी निकाली
कभी पन्ने पलटता तो कभी खिड़की से झाँकता
अंदर तेरी यादों का साया बाहर रात की चादर काली

संग बिताये लम्हों के एहसासात क़ैद थे पन्नों में
कितना ख़ूबसूरत फ़साना अपना साथ गुज़रा जमाना था
कभी मिले ख़ुदा तो उससे पूछूंगा मैं
ज़िन्दगी तो शुरू की थी अभी, अभी क्यों तुम्हें जाना था?


मन करता है
बैठा ही रहूँ
तेरे इस झरने के नीचे
और तुम बरसाते जाओ
शांति जल

वरना कहाँ मन लगे
ये दुनिया तेरी जंगल
कैसे-कैसे पेड़ यहाँ
और कैसे-कैसे फल

घर-घर हैं ये पेड़ लगे
लम्बे हैं पर छाँव नहीं देते
घने पर हवा नहीं
फलों में इनके विष
और छालों पे कांटे

जाने कैसी जलवायु बदली
बीज ही सारे ख़राब हो गए!

लोग कहते हैं
विचार बीज हैं
कर्म जिनके फल
और सोचता हूँ तो लगता है
चरित्र ही वृक्ष है
प्रेम उसकी छाया
व्यवहार छाल
और वाणी बयार

और बात करें जलवायु की तो
जल गुरुजनों की शिक्षा और अनुशाषन
और वायु वो सारी चीजें
मन जिनमे उलझा रहता दिन भर

और सच तो ये है कि
जलवायु करते हैं असर बीजों पर








फ़िक्र-ए-दुनिया ने कभी बेफ़िक्र होकर रहने न दिया
खुलकर उड़ने न दिया, पिघलकर बहने न दिया

तेरी जुल्फ़ों के साये में ज़िन्दगी मेरी यूँ बीत ही जाती
मेरी बेताबी ने मगर एक जगह मुझे ठहरने न दिया

जुनूँ  ही था जो मारा-मारा फिरता रहा दर-ब-दर
घर की चिंताओं ने चैन से घर पर रहने न दिया

आऊँगा एक दिन लौट, माँ से था ये वादा मेरा
शहर की रौशनी ने मगर मुझे गाँव का रहने न दिया

जिस राह चल रहा हूँ उस पर मेरी मंज़िल तो नहीं
कुछ भूख ने, कुछ डर ने अलग राह चलने न दिया

हर सुबह दफ़्तर जाने की ढूंढता हूँ मैं वजह
चाहता तो हूँ, हसरतों ने मगर कभी रुकने न दिया


मूरख तू जिएगा कब !

नींद से अब जाग तू कर्म से मत भाग तू मन में अब ठान तू चुनेगा उत्थान तू जीवन तो बहता जाए कौन इसे बाँध पाए जी ले यहाँ इसी पल तू कहाँ ये वा...