Friday, May 4, 2018

दीवारें गिरेंगी
तो फ़ासले मिटेंगे
दिल मिलेंगे
हाथ मिलेंगे
क़दम एक साथ उठेंगे
फिर सफ़र कितना भी मुश्किल क्यों न हो
दूर कितनी भी मंज़िल क्यों न हो
चलेंगें जब साथ राहों में
तो होंगीं कम दूरियाँ
आसां होंगीं मुश्किलें
हासिल होंगीं मंज़िलें
एक के बाद एक
फिर पाने को होगा
बस आसमान
ये ख़्वाब जो तुमने देखा है
यक़ीन मानो
मुक़म्मल होगा एक दिन


Saturday, April 28, 2018

डर कर जीवन अब नहीं होता
बुलशिट सहन अब नहीं होता
सपने कई हैं बंद बक्से में
ये बोझ वहन अब नहीं होता

ये कहें ऐसा कर अच्छा होगा
वो कहें वैसा कर अच्छा होगा
मन चाहे कुछ और ही करना
पूछ कर चयन अब नहीं होता

गुस्सा छुपा के रखना सीखा
सब को खुश बस रखना सीखा
पर जो अंदर है वही हो बाहर
झूठ प्रदर्शन अब नहीं होता

जीकर इतना तो हमने जाना
पाना-खोना बस अफसाना
मिले तो अच्छा, पाने को पर
चंचल मन अब नहीं होता 

Thursday, April 26, 2018

शाम भी उदास है
ठहरी-ठहरी साँस है
जाने किसकी आस है
कोई आस है न पास है

ऐसे में ....

तुमको जो बुला सकूँ
बुला के ये बता सकूँ
बता के ये जता सकूँ
कि तुमको न भुला सकूँ

मेरी शख़्सियत के
किसी हिस्से में
एक बर्क़ सी लहराती है
एक हसरत
कोई ख़्वाहिश, कोई आरज़ू
फिर शुरू होता है
एक सिलसिला
ख़यालों का, तस्सवुर का
सोच के समंदर में
मैं डूबता हूँ, उभरता हूँ
फिर जब इरादों का
साहिल मिल जाता है
तो उतरता हूँ ज़मीन पर
क़दम बढ़ाता हूँ
इब्तिदा होती है
एक सफ़र की
कोई सफ़र लम्बा होता है
तो कोई छोटा
कभी मंज़िल मिलती है
तो कभी नहीं
पर कमोबेश
यही सिलसिला होता है
जब भी मैं कुछ करता हूँ
पर इसका एक हिस्सा ही
ज़मीन के बाहर होता है
बड़ा हिस्सा तो मेरे ज़ेहन के
अंदर ही होता है
एक पेड़ की तरह ही
जिसकी जड़ें ज़मीन के
अंदर होती हैं
किसी-किसी पेड़ को
ज़मीन के बाहर आने में
ज्यादा वक़्त लगता है
तो कुछ जल्दी भी आ जाते हैं



जानता हूँ जाना चाहता हूँ मैं किधर
एक डर मगर रोक देती है क़दमों को अक्सर

रह-रह कर दिल में अफ़सोस होता तो है बहुत
अब भी अगर कभी जो देखता हूँ पलटकर

आवाज़ देकर राहें बुलाया करती थीं हमें
हर बार मगर रुक जाते हम मोड़ पे आकर

इब्तिदा में मंज़िल कब साफ़ आती है नज़र
कोहरा हट ही जाता है चलते रहने से मगर

हुआ है कई बार यूँ भी सफ़र में अक्सर
राह गलत थी जाना है ये मंज़िल पे आकर

तुझे मैं जब भुला सकूँ !

दिल में वो प्रीत दे
मैं गीत गुनगुना सकूँ
ये इजाज़त भी दे
तुमको मैं सुना सकूँ

राहों में संग हो
चाहे जिस भी मोड़ तक
छोड़ना तभी मुझे
तुझे मैं जब भुला सकूँ

हो ये यकीं का रिश्ता
पक्का और कच्चा
तुम मुझे आज़मा सको
मैं तुझे आज़मा सकूँ

ख़्वाब तेरे हों जुदा
पर मुझे तुम बता सको
मुख़्तलिफ़ सोचूँ जो
तो मैं तुझे बता सकूँ

तुम मुझको थाम लो
मैं तुमको थाम लूँ
दूर हों न यूँ भी कभी
जो तुझे न मैं बुला सकूँ 

Friday, March 16, 2018

करना या होना !

ज़िन्दगी एक जंग है
एक मुसलसल जंग
करने और होने के दरमियान
करना जो इंसान का फ़ुतूर
और होना उसका मुस्तक़बिल
करना जो होने नहीं देता
लेकिन होने तक का रास्ता
करने से ही होकर गुज़रता है
करना कभी बादल बनकर छाता  है
होना कभी सूरज बनकर आता है

करना जैसे पहाड़ से निकल कर
समंदर तक दरिया का बहना
होना जैसे पहाड़ पे फैली बर्फ
और पसरे समंदर का पानी
करना जैसे क़ैदे-ज़ीस्त कोई
होना सारे ग़म से नजात जैसे
करना जैसे सीने में आग, सर पे जुनूँ
बेताबी, बेचैनी, छटपटाहट, जुस्तुजू
होना  लेकिन जैसे इन सब का न होना
जैसे चांदनी रात, उस रात का सुकूँ
घास में ठहरी शबनम की बूँद
करना जैसे हो बिखर जाना
और होना जैसे सिमट जाना
करना जग को पाकर ख़ुद को खोना
होना ख़ुद में खोकर ख़ुद को पाना

करने का दायरा फैलता जाता
करने का, करते रहने का सिलसिला
चलता है, चलता ही रहता
जब तक कि ख़्वाहिशें हैं, आरज़ू हैं
इंसान कुछ करता है
उसके बाद कुछ और
और फिर कुछ और
पर तिश्नगी मिटती नहीं
बेताबी, बेचैनी कम होती नहीं
कुछ करना तो है ज़िंदा रहने की ख़ातिर
कुछ जिम्मेदारियों की ख़ातिर
पर कुछ करना ऐसा भी है कि जिन्हें
करने- न करने पर इख़्तियार है उसे
पर वो रुकता नहीं, सिलसिला थमता नहीं
जब तक कि ख़्वाहिशें हैं, आरज़ू हैं

पर करते रहने से मर जाता है होना
सच तो ये है कि न होने से
रुक पाएगा नहीं करने का सिलसिला
पर कुछ करने से ही पैदा होंगे
होने के इम्कान, ये भी सच है
तो करें हम सोच कर करने का इंतिख़ाब
ऐसे कि सिमट जाए करने का दायरा
और निकल आए होने का आफ़्ताब
छोटी होती जाए करने की ज़मीं
बड़ा होता जाए होने का आसमां
ग़ैर-जरुरी करना गिरें शाख से
सूखे हुए पत्तों की तरह
और होने में होकर ही इंसान
करे बस वो जो है जरुरी करना

और करने से हुआ है क्या
इंसान को हासिल ?
कुछ तबस्सुम, कुछ आँसू
खुशियाँ कुछ पा लेने की
ग़म कुछ खो देने का
और फिर आने वाले कल का ख़ौफ़
या उससे बेइन्तिहा उम्मीदें
और फिर उनके टूटने का ग़म
होना लेकिन है अभी इसी पल में होना
न अगले पल से और न
आने वाले कल से कोई उम्मीद
और न अगले पल का, न ही
आने वाले कल का कोई ख़ौफ़




Saturday, March 10, 2018

दीवाना हो गया हूँ बस मैं तेरे नाम का
तेरी इनायत के बिना हूँ मैं किस काम का

लगा रहता हूँ दिन भर काम में मगर
सारा दिन इंतज़ार करता हूँ मैं शाम का

क्या-क्या करता हूँ  दुनिया में रहकर
समझता यही हूँ कि हर काम है राम का

बस तेरे रस्ते चलता रहूँ, दे हौसला तू
रस्ता रह चुका है जो पहले भी तमाम का

तेरे नाम में डूब जियूँ, तेरा ही काज करूँ
हंस कर जीता जाऊँ जीवन गुमनाम का


सोच रहा हूँ आज फिर
मैं अपने अंदर उतर कर देखूँ
कि वहां का माज़रा क्या है

तो पाता हूँ कि
दरवाजे पर जंग है
और ज़ीने पे धुल पड़ी है
गोया कोई सालों से
आया न हो इधर

हॉल की दीवारों पर
समझदारी का रंग चढ़ा है
जज़बातों के कमरे के ऊपर
प्रैक्टिकैलटी की लॉक चढ़ी है

इस लाइब्रेरी-कम-ऑफिस में
जहाँ बैठ कर मैं
अनवाइंड होता था
इस क़दर अँधेरा क्यों है वहां !

और संवेदनाओं  को
समेट कर कोने में
किसने रख दिया है

दूसरे कमरे में जहाँ
मैंने यादों को
सहेज कर रखा था
वहां की बत्ती
आज भी जलती है
लेकिन इन यादों को
बड़े वाले कमरे में
शिफ्ट करना पड़ेगा
ये कमरा अब
छोटा पड़ने लगा है

काफी काम पड़ा हुआ है इधर
अब इधर आते रहना होगा
इस बे-तरतीब से
मकां को ठीक करना पड़ेगा

अगली बार
तुम्हे भी साथ लेकर जाऊँगा

मैं जानता हूँ
तुमने ऊँचाइयाँ
हासिल कर ली हैं
ऐवरेस्ट हो गए हो
ख़ुश्क और ठन्डे

कभी-कभी तो
उतरो अपने आसमान से
आओ तो जरा  मैदानों में
पिघल जाओ और बहने लगो
फिर ज़िन्दगी की धार बनकर 
रात के ख़ामोश अंधेरों में
दिन भर के ख़याल जब ऊँघने लगते हैं
दबे पाँव सबसे नज़रें बचाकर आती हैं
तुम्हारी यादें दिल पर दस्तक  देती हैं
और उनकी उंगलियाँ थाम कर मैं
तसव्वुर की राहों में निकल जाता हूँ

चाँद आसमां में बादलों से  निकलता है
लहू में घुलकर कुछ रगों में बहने लगता है
लगता है आज की रात फिर देर से बुझेगी
मैं डायरी और पेन निकाल लूँ जरा
एक नयी नज़म लिहाफ़ के अंदर
अंगड़ाई ले रही है  

Sunday, March 4, 2018

अधूरे ख़्वाबों का मुसलसल सिलसिला ही सही
ज़िन्दगी नाकामियों का एक क़ाफ़िला ही सही
बुलंदियों की ख्वाहिशें क्यूँकर हो कम मगर
उड़ जाआदमी, तू पानी का एक बुलबुला ही सही 
वो सुबह जो मिल न सकी
वो कली जो खिल न सकी
उम्मीद जो पल न सकी
वो शब जो ढल न सकी
परिंदा वो सुबह का जो 
ख़्वाब से हमें जगा गया
नए दिन की उम्मीद करना
फिर से हमें सिखा गया

कह दो कोई उस परिंदे से जाकर
कई ख़्वाब यहाँ पूरे नहीं होते

जीवन जीने जैसा हमने मुश्किल इतना काम किया
मोहलत कब, फुर्सत कहाँ, कब हमने आराम किया 
हर एक की ज़िन्दगी का कमोबेश यही हाल है
कल के  लिए आज के खो जाने का मलाल है 
कभी सुख की गंगा में मैं तैरता रहा
तो कभी दुख की यमुना में डूबता पाया
जीवन रूपी संगम पे बैठा  मुसाफ़िर
 सरस्वती आनंद की पर ढूँढ न पाया 
कहानी बनती है तब जब कोई दीवाना होता है
दुश्मन जिसका तख़्तो-ताज़ो-ज़माना होता है
 हर दो कदम के फासले पे नई ठोकरें मिलती रहीं
ज़िन्दगी मगर ज़िन्दगी अपने दम पर चलती रही
क्या करे कोई  ख़्वाब कोई ऐसे दिल में पले
ज़मीं करे ख्वाहिश कि वो आसमां से मिले 
हमारे जीवन के पन्ने पर
तुम उभरे थे
एक चंद्र-बिंदु की तरह
और धीरे-धीरे फैलकर
पूरी वर्णमाला हो गए
और हमारे जीवन की पुस्तक
मोटी होती जा रही है
समय-समय पर इसमें
नए अध्याय जो
तुम जोड़ दिया करते हो !
वो अफ़साने किसको सुनाते
इसलिए चुप रह जाते हैं
हैं कुछ लोग जो जाकर भी
यादों में रह जाते हैं

छोड़कर दामन जब था जाना
मेरी राहों में आये क्यों थे
महका कर दिन-रातों को
साँसों में समाये क्यों थे

दिन पहाड़ सा बैठा रहता
रात भी कहाँ गुज़रती है
तेरी एक ख़बर पाने को
रूह मारी-मारी फिरती है

कुछ उठता दिल से रह-रह कर
कुछ पलकों से बह जाता है
गा देता हूँ कभी गीत कोई
कुछ होठों में रह जाता है

आओ मुझसे ख़ुद को ले जाओ
मेरा मैं मुझे वापस कर दो
न मुझमे तुम बचे, न तुझमे मैं
करम अब इतना बस कर दो


अपने अंदर झाँक कर देखा
रहता है आख़िर कौन यहाँ
अँधेरा पाया और उमस भी
और वीरान पड़ी एक बस्ती

ढही ईमारत, सुनसान राहें
हर कोने से उठती आहें
सन्नाटा कुछ बयान करती
अज़नबी की पहचान करती

सोज़ बहुत और ग़ुबार भरा
अंदर था हाहाकार मचा
क्या कोई यहाँ रहता है !
क्या अब भी कोई रहता है !

टूटी हुई कमजोर एक काया
बस इतना मैं देख पाया
चेहरे पर दर्द की रेखा
मैंने अपने आप को देखा

परेशां और ग़मगीन पड़ा
बदन सलाखों में जकड़ा
अंदर एक क़ैदी इंसान
जर्जर और लहू-लुहान

मेरा मन तड़प रहा था
मुझसे कुछ कह रहा था
इस क़ैद से अब आज़ाद करो
उन्मुक्त गगन में उड़ने दो

मैं था अंदर क़ैद मेरे
ख़ुद पे ज़ुल्म हज़ार किये
अब तो थोड़ी रौशनी हो
सुकूँ और क़रार मिले

जंजीरें टूटने लगीं
तमस भी हटने लगा
दर्द काफ़ूर हो गया कहीं
मैं मुझसे नहीं रहा अज़नबी !

जीते हैं सभी
इसलिए मैं भी जीऊँ !
करते हैं जो सभी
वो मैं भी करूँ !

मक़सद  कुछ साफ नहीं
दिखती आगे राह नहीं
चलते हैं जो सभी
वो राह मैं भी चलूँ !

वजह काफी नहीं इतनी
जीवन के होने की
कारण होंगे और कई
जरुरत आहे समझने की

जीवन का अर्थ है क्या
क्या कर्तव्यों का आधार
दुनिया के इस रंगमंच पे 
जाने  क्या मेरा क़िरदार !

सवाल ऐसे कई अनगिनत
उठते हैं मन में अविरत
इनके ही फेरों में उलझा
चलता रहा हूँ अपने पथ

पर अब मौन का वक़्त नहीं
चुप्पी तोड़नी होगी अभी
अब एक शुरुआत लाज़िमी है
पहले काफी देर हो चुकी



हृदय का रुदन ही तो
कवि का गान बन जाता है
दर्द हद से गुज़र कर ही
गीत महान बन जाता है

जीवन भी कैसे रंग बदलता
कभी आँसू तो कभी
मुस्कान बन जाता है
तब  सार्थक है कवि का जीना
दर्द जीवन का जब
कविता का प्राण बन जाता है


मैं था या शायद न था
किधर था, कहाँ था
था तो किस लिए, किसके लिए था
ख़ुद को था कहाँ ख़ुद का पता

ज़िन्दगी व्यस्त और गुम कहीं
दिन और रात का इल्म नहीं
तलब न जाने किस चीज की
जाने क्या ज़ुस्तज़ू दिल में थी

न सोचा कभी पहले मगर
है कोई एक शख़्स हमसफ़र
जरूरतें जुदा जिसकी
या कहें तो कुछ भी नहीं

दर्द मिले तो एहसास हुआ
सांसें थीं पर जिन्दा न था
मेरे संग पूरी दुनिया थी
ख़ुद से पर जुदा तन्हा था

फिर आई नयी एक सहर
कई सारे सवाल लेकर
कौन हूँ मैं ?
हूँ या नहीं हूँ मैं ?

एक सूरज सा शख़्स आया था कहीं से
जो लगा जीवन के सूत्र जानता हो जैसे
उसके संग देर तलक़ बैठा रहा
रूबरू हुआ ख़ुद से और ख़ुदा से

चलता तो हूँ अब भी मगर
है पर मुझको मेरी ख़बर
सब मेरे अपने से अब लगते हैं
जीवन हो गया एक सुहाना सफ़र

Wednesday, February 28, 2018

बहते क्यूँ हो, क्यूँ हो चंचल ?
नदिया के सुन ओ जल कल-कल
तीर पे थिर जा, थम जा दो पल
भटक रहे क्यों हो यूँ बेकल ?

आये कहाँ से, कहाँ को है जाना ?
कुछ है तेरा ठौर ठिकाना ?
क्यूँ है तुमको बहते जाना ?
अपना घर पर न बिसराना

भटक-भटक कर क्या पाते हो ?
जन्मों से आते जाते हो
किन रस्तों पे खो जाते हो ?
सांझ पहर फिर पछताते हो

जिस घर से आये उसी घर जाना
रुक जाए तो पा जाए ठिकाना
दो पल जीवन फिर ना गँवाना
लूट ले क्रिया का खजाना

क्रिया है चाबी, तेरा मन है चोर
ले जाता यही सागर की ओर
थाम के पतरी सांस की डोर
बह जा तू अब कैलाश  की ओर 

Saturday, February 17, 2018

प्यास अधिक बढ़ गई मन में
विकलता छायी जीवन में
जगत चक्र में उलझ गया मैं
लिए सैलाब चलूँ नयन में

कविताएं नयी अब लेंगी जनम
मन का ताप मिटाने को
उन्हें ही गुनगुनाता रहूँगा
जग का जाप भुलाने को

Thursday, February 15, 2018

तेरे आने से पहले घर का ये समां न था
कैसे कहूँ पहले का तुझसे रिश्ता न था

उम्र भर की ज़िंदगी का कुछ यह तज़ुर्बा था
अपना लग कर भी यहाँ कुछ अपना न था

आये थे यहाँ कहीं और जाने के वास्ते
रस्ता ही था ये कोई मंज़िल का निशां न था

वक़्त बदलता है, हालात बदल जाते हैं
 मैं भी जैसा हूँ पहले कभी वैसा न था

कुछ करने की चाहत, कहीं होने की मशक़्क़त
जीता भला कैसे इन्हीं में गर मरता न था

ख़ुदा हर लम्हे में है, हर शै में है ख़ुदा
मुसाफ़िर अकेला होगा कभी तन्हा न था 
मेरा था आँगन
मेरा शजर था
मुझसे जो छूटा 
मेरा ही घर था

टूटे वो सपने
छूटे वो अपने
दो कौड़ी दे के
सब छीना जग ने

मेरी थीं वो रातें
मेरा सहर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था

तन्हा सा मन
सूना ये गगन
रुठ गया क्यों
मुझसे यूँ जीवन

मेरी थीं गलियाँ
मेरा शहर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था

मेरा था आँगन
मेरा शजर था
मुझसे जो छूटा
मेरा ही घर था

Sunday, November 26, 2017

है कहता दिल मेरा
आ चल कदम बढ़ा 
एक बार कर ले हौसला 
चल दे उस राह पर 
बात  सुन मेरी 
इस अँधेरे के पार होगी रौशनी 
चल कदम तो बढ़ा 
क्यों संशय  कर रहा 

मेरी उंगलियां थाम ले 
मैं चल तो रहा हूँ संग तेरे 
सुन ले बात मेरी 
अस्तित्व के तेरे हिस्से हैं कई 
एक दूजे से बेख़बर 
चल रहे हैं इधर-उधर 
अपनी आँखें जरा बंद कर 
जान मेरी आँखों में देखकर 
एक हिस्सा ऐसा है 
जो ठहरा हुआ है 
हिस्सा है रोशन वही 
जुड़े हैं उसी से सभी 

तुम हो वही, उसी से हो तुम 
आ  जाओ ख़ुद को देख लो 
जान लो, पा लो ख़ुद को 
रौशनी में आओ 
रौशनी  बन जाओ 


ज़िन्दगी का दायरा
कैसे फैलता चला जाता है
एक सर्किल का लगातार
बढ़ता हुआ जैसे
सरकमफेरेंस हो !

और इंसान मानो उस
इमेजिनरी लाइन के
ऊपर खड़ा
अपने सेंटर से कितना दूर
होता चला जाता है !

उसकी जिम्मेदारियाँ
उस सर्किल की रेडियस हैं
या फिर उसकी ख्वाहिशें ! 
क्षितिज, जिस मोड़ पे
धरा गगन से  मिलती है
सुबह-सुबह जहाँ
कली इक उमीद की खिलती है

सूरज लेकर जहाँ आता विहान
शुरू जहाँ करता उत्थान
फिर बाँट कर अपनी ऊर्जा सारी
जहाँ खतम करता ढलान

निरन्तरता है ये जीवन की
आरोहण व अवरोहण की
उर्ध्व-गमन की, अधोपतन की
उन्नयन की, अवनमन की

शाश्वत है ये क्रम प्रकृति का
सुबह आती, फिर आती शाम
हर दिन जैसे नया इक जीवन
औ रात्रि मृत्युपरांत विश्राम 
उस रात मुझसे जब था कहा तुमने
क्या तुम्हें फिर जाना ही होगा ?
रोये थे हम कितने बेबस होकर
क्या उस दिवस को आना ही होगा ?

मैंने तुमसे कहा था छुपा लो मुझको
समय भी जहाँ न ढूंढ पाये आकर
तुमने मुझे पकड़ लिया था कसकर
"आओ, अपने में छुपा लूँ" कहकर

तेरे उस कोमल मन से खेला मैं
और इक बचपन से खेला मैं
किसी कमजोर मनुष्य की भाँति
चला आया दूर अकेला मैं

फेर जगत के समझ ना पाता
बस संग हवा के बहता जाता
रुकना चाहा पर नहीं रुका मैं
ये दोहरा खेल अब नहीं सुहाता

कभी कितना विवश होकर इंसान
कर्म-पथ पर आगे चलता है
दुविधा कभी होती दूर नहीं
वो तिल-तिल कर जलता है 
मिल गयी हसरतों की दुनिया ?
स्वप्न क्या साकार हुए ?
ख़यालों में था जैसा पाया
हासिल भी उसी प्रकार हुए ?

क्या हुआ भी कुछ या निरा भ्रम था ?
व्यर्थ मेरा कि सारा श्रम था ?
ख़्वाब में तो था मेरे आसमां
यथार्थ पतन का पूरा क्रम था

न चलूँ अकेला कर्म-पथ पर
क्या ऐसा है मुमकिन नहीं ?
सरल जीवन, इच्छाएं कम हों
बोझ मन पर अनगिन नहीं

क्यों दौड़ रहा हूँ हांफ-हांफ कर ?
किसके लिए मैं जीता हूँ ?
न उन्हें ही मधु मैं पिला सका
औ' खुद भी विष ही पीता हूँ 
तुम्हें जब मेरी जरुरत थी
मुझे तब कहाँ फुर्सत थी
रुंधे गले से था रोका तुमने
पर मेरी और ही हसरत थी

इक आवाह्न पर निकल गया
कर झटक कर चल दिया
कहीं पर फैला कर तम
कहीं पर जाकर जल गया

नर क्यों मजबूर इतना है !
किस भ्रम में चूर इतना है !
मैं तुम से दूर हुआ कुछ यूँ
सूर्य धरा से दूर जितना है

अब मन में यही विचार करूँ
समय न और बेकार करूँ
यहाँ के दीये बुझाकर अब
दूर घर का अंधियार करूँ

मैं भी उस पथ का राही हूँ
पथ का मुझको भी ज्ञान नहीं
गतिमान हूँ कब से जाने
मंज़िल का पर अनुमान नहीं

कोई मिला तो  छूटा कोई
पर अक्सर तन्हा ही चलता हूँ
थके पाँव सहलाता खुद से
गिर के खुद ही सम्हलता हूँ

कभी-कभी जो रुक जाता हूँ
लेने को थोड़ा सा दम
मन के प्रश्न खड़े हो जाते
दिशा बदलूं या जाऊं थम ?

पूछे अर्जुन कृष्ण कहाँ है ?
अंतर्मन में द्वंद्व यहाँ है
गीता का फिर पाठ पढ़ाओ
दिशाहीन सारी दुनिया है

जीवन नर का है तो चलना होगा
शूल-फूल सब सहना होगा
सत्य से जब साक्षात्कार हो
तभी सार्थक जीना होगा 
अपनी-अपनी कहिये सनम
अपनी-अपनी करिये सनम
हज़ार राहें जहाँ में हैं
अपनी-अपनी चलिए सनम

अनसुने अनजाने यहाँ
हैं कितने अफ़साने यहाँ
किसका फ़साना कौन सुने
खुद कहिये ख़ुद सुनिए सनम

दर्द लबों पर आ न जाए
अश्क़ पलक से छलक न जाए
सबके अपने दर्द यहाँ
दिल की दिल में रखिये सनम

सुख कौन किसे दे देता है
दुःख किसका कोई ले लेता है
ये कथनी मन हल्काने के
सब अपनी करनी भरिये सनम

चला मुसाफ़िर
ढूँढने आख़िर
किसने उसे निष्प्राण किया

क्या यही था वो
जीवन जिस पर
हर नर ने ही अभिमान किया

मुश्किल से ये दौर रुका था
ज़ख्मों के वो मोल बिका था
देकर अपनी सांसें पूरी
बाज़ी अपनी वो खेल चुका था

जग के खेल निरालों से
जी जब पर्याप्त भर गया
मिट्टी की क़ैद तोड़ कोई
हर शै में उसे व्याप्त कर गया 
ख़ुदा के वास्ते फिर ना कोई ख़ुदा हो जाए
अच्छा हो मोहब्बत वाला ही मसीहा हो जाए 

कितना क़रीब ले आती है दो दिलों को मोहब्बत 
कि मैं उसके जैसा और वो मुझ सा हो जाए 

ज़िन्दगी कब तक मुझसे छुपती रहोगी 
कभी घर पे आओ, थोड़ी सी तो राब्ता हो जाए 

अब तो थक गया हूँ सहर से चल-चल कर 
कोई दोपहर में पीपल वाली हवा हो जाए 

इस क़दर पहन लेते हैं लिबास अपने ऊपर 
कि अपनी नज़र में ही कोई गुमशुदा हो जाए 

उमीद का दामन मत छोड़ तू ऐ मुसाफ़िर 
आएगा फिर कोई कि हिन्द में ज़लज़ला हो जाए 

जीवन तेरा कैसे फिर से निर्माण करूँ
बुझते पलों में कैसे सुलगते प्राण भरूँ

जो उबलता था, अब धमनियों में है अवरुद्ध
पुनः-प्रवाह हेतु उनमें क्या ऊर्जावान भरूँ

कुछ दुनियादारी कुछ अपनी लाचारी है
गुत्थी पूरी उलझी है, कैसे समाधान करूँ

भ्रम से घिरा लक्ष्य, तम से भरा पथ मेरा
ऐसे में सही दिशा का कैसे अनुमान करूँ

जीवन तू सुगम सरल नहीं है लेकिन
अश्रु बहा रचयिता का क्यों अपमान करूँ


होटल की खिड़की से झांकता हूँ
नीचे एक स्विमिंग पूल है
सुबह-सुबह ढेर सारे कबूतर
उसके गिर्द जमाबंद बैठ जाते हैं
फिर कोई एक इधर से उधर उड़कर जाता है
तो कोई उधर से इधर
सब पूल के चारो तरफ ही उड़ते हैं
पर कुछ पल से ज्यादा एक जगह पर नहीं बैठता कोई
लगता है मिलकर म्यूजिकल चेयर खेलते हैं
कायनात में जो एक धुन बजती रहती है
उसी संगीत पर खेलते होंगे
पर सोचता हूँ उसे ऑन-ऑफ कौन करता होगा !

Monday, March 20, 2017

मेरी बर्बादी का मंजर मुझसे ही तुम पूछते हो
किसके हाथ में था खंज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो

हवा से पूछो तो जिसने गिराया इन शाखों को
किस बावत उठा बवंडर, मुझसे ही तुम पूछते हो

ग़ुबार के नीचे से देखो चीखें किसी की आती हैं
इस मोड़ पे थे किस-किसके घर, मुझसे ही तुम पूछते हो

उस आग को तुमने फूंका था जब वो चिंगारी थी
कैसे जला है ये शहर, मुझसे ही तुम पूछते हो

रोती है रातों को जो ख़्वाब सुनहरे देखती थीं
क्यूँ है उन आखों में डर, मुझसे ही तुम पूछते हो

मुसाफिर से भी पहले, जो कदम उठे इन राहों पर
वो आते क्यूँ नहीं नज़र, मुझसे ही तुम पूछते हो


मेरे नाम के हिस्से में
             एक शाम सुहानी लिख देना
नाम मेरा कोई पूछे तो
             बस तेरी दीवानी लिख देना

याद मेरी जो आये तो
             अश्क़ों को हर्फ़ बना लेना
शब् की स्याह शफहों पर तुम
             दिल की कहानी लिख देना

याद है तुमको वो पल क्या
              जब तुम जाने वाले थे
आँखों से तूने जो पोछा था
              उसको न पानी लिख देना

बरस रहे थे हम तुम दोनों
              भींग रहे थे हम तुम दोनों
खामोशी में जो जन्मी थी वो
               नज़म पुरानी लिख देना

गीत जो हमने गाये थे
              कसमें जो हमने खायी थीं
मैं उनमे जीने मरने लगी
              इसे बस नादानी लिख देना

Saturday, March 18, 2017

मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका

न धूप भरी ज़मीं
न सूरज भरा आसमां
न सुकूँ के दिन-रात
न तेरी चाहतों का जहां
तू चली तो मेरे संग हमसफ़र
मगर उन राहों की मुश्किलो के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका

मैं तो उड़ता रहा हूँ बस
अपने ख़्वाबों की खातिर
तेरे भी तो ख्वाब होंगे
कैसे भूल गया मैं आखिर
तुमने तो ऊँची परवाज़ दी मुझे
पर बाँधने वाले कुछ रिश्तों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका

खुद रही है तू क़ैद में एक
और मुझे आज़ाद किया है
सब कुछ अपना छोड़ कर
मेरा जहां आबाद किया है
तूने क्या माँगा था मैं सोचता रहा
मगर मेरे हज़ार झूठे वादों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका
मेरी ज़िन्दगी के तमाम ग़मों के सिवा
मेरी जां तुझे मैं कुछ और दे न सका



Saturday, March 11, 2017

ज़िन्दगी अँधेरी राहों पर चलना है
और अनजान मोड़ों से गुज़रना है

बैशाखियाँ फिर से न दे देना मुझको
मुझे तो अब बिन सहारों के चलना है

चाँद सा मामूल नहीं हो सकता मेरा
मुझे देर तलक़ सूरज सा जलना है

अपने आशियाने में मत रोक मुझे
अभी तो सहर होने तक चलना है

देर तो होगी, मुश्किलें भी कम नहीं
हवाओं का रुख़ जो अभी बदलना है

दुनिया जलने-बुझने का सिलसिला सही
किसी दिए को बुझना, किसी को जलना है

दैरो-हरम ही सबब हो गए फ़सादात के
छोड़ो फिर मुसाफ़िर क्या मज़हब का करना है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

जीवन-दुःख के बोझ तले
कन्धा जब झुक जाता है
अंतर की घोर तपिश में 
हृदय पुष्प मुरझाता है 
ऐसे में लगाए हृदय से कोई तो अश्रुधार बंध जाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

बूंद-बूंद को तरसे जब मन 
पतझड़ हो जाए जीवन 
आशाओं के मेघ छटें 
धू-धू हो सपनों का वन 
आये कहीं से स्नेह के छीटें तो सावन फिर आ जाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

नित दिन एक नया समंदर 
प्रस्तुत होता मंथन को 
कर्त्तव्यों के बड़े पर्वत 
सम्मुख हों आरोहण को 
अपनों का ही प्यार उसे तब संघर्ष-शक्ति दे पाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !

आत्म-विश्वास क्षत-विक्षत 
जग-दुत्कारों से मन आहत 
असफलता की सरिता में 
बह-बह कर अविरत 
किये वादों का स्मरण ही तब नव-विश्वास जगाता है 
प्रेम से बढ़कर इस जग में कोई भला क्या पाता है !




Saturday, February 13, 2016

मेरा दिन हो तुम, रात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम
मौला ने जो बक्शी है वो
मेरे जीवन की सौगात हो तुम

वज़ह मेरे रोने हंसने की
मेरे दिल की हर जज़्बात हो तुम
तेरे बिन अधूरा सा मैं
मेरी पूरी क़ायनात हो तुम

ख्यालों में ख्वाबों में तुम
रहता हूँ तेरी यादों में गुम
आँखें हर पल ढूंढे तुमको
कानों में तेरे नाम की धुन

मेरा दिन हो तुम, रात हो तुम
मेरा हर पल, हर बात हो तुम

वही ख़ुशबू
वही चेहरा
वही आँखें
वही लम्स

वही आवाज़
वही अंदाज़
वही निस्बत
वही आलम

ख़याल है या
फिर ख़्वाब है कोई !

पर जब
खुली आँखें तो
बस तनहा मैं
ख़ामोश कमरा
सोयी दीवारें
उदास रात
और गीली हवा

तू तो नहीं है कहीं
चाँद भी नहीं है

बंद कर लूँ फिर आँखें
फिर डूब जाऊँ
उन ख़यालों में

फिर वही ख़ुशबू
वही आवाज़
वही चेहरा

हाय तेरा चेहरा !
तुम कितनी सुन्दर हो !

Thursday, December 10, 2015

तेरा ज़िक्र न हो जिसमे गीत वो सुन पाता नहीं
तेरे बग़ैर कोई ख़्वाब ज़िंदगी का बुन पाता नहीं

रस्ता तो  हो वो जिसपे तुम हो मेरे हमसफ़र
हाथों में तेरा हाथ हो जब मंज़िल आये नज़र
धुप-छाँव हो या हो बारिश या फिर अँधेरा
तुम संग रहो मेरे तो आसां है मेरा हर सफ़र

मेरे हमदम तुमसे ही ज़िंदगी की ये बहार है
हर फूल में खुशबू है, हर लम्हा गुलज़ार है
तेरे दम से रौशनी है मौसम का मिज़ाज़ है
खिलखिलाती है सुबह, शाम खुशगवार है

Sunday, November 15, 2015

जीवन तो जीना होता है
होठों को सीना होता है 
खट्टी या मीठी लगे 
इस  रस को पीना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

कभी कितना दे जाती है 
कभी सब कुछ ले जाती है 
देती है तो लेना होता है 
लेती है तो देना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

बारिश आकर भिगा जाती है 
धूप आकर सुखा जाती है 
सर्दी, गर्मी, वर्षा का 
यहाँ फिक्स महीना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

अपनों को खोना होता है 
सपनो को संजोना होता है 
सुख-दुःख आते  जाते हैं 
हँसना और रोना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

पहले भी लोग आये थे 
आगे भी लोग आएँगे 
इंसां किसी भी वक़्त का हो 
वक़्त के हाथ का खिलौना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

डरकर रहो तो मारती है 
डटकर लड़ो तो हारती है 
बढ़कर गले लगाती जब 
खून बहकर पसीना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

बहने से रस्ते खुल जाते हैं 
चलने से रस्ते मिल जाते हैं 
राहों में ठोकरें मिलती हैं 
गिर के खुद सम्हलना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

दर्द को दिल में छुपाकर के 
हरपल मुस्कुराना होता है 
पलकों में अश्क़ छुपाकर के 
गीत कोई गुनगुनाना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

एक ही लीक पर चलते रहो 
हां में बस हाँ मिलाते रहो 
अलग सोचने वालों का 
दुश्मन सारा ज़माना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 

अंदर तक जाना होता है 
ख़ुद को वहां पाना होता है 
वहाँ जो फैली शांति है 
बाहर तक लाना होता है 

जीवन तो जीना  होता है 
जीवन तो जीना  होता है 




Thursday, October 22, 2015

कौन हमें
अपनों से दूर कर
खींचता है अपनी तरफ !

हमारे एम्बीशन्स हैं शायद
मैगनेट की तरह उनसे
चिपक जाते हैं हम

और रिश्ते तो
वैसे भी कमजोर
हाइड्रोजन बॉन्ड की तरह हैं
उनको टूटने में
कहाँ वक़्त लगता है !
बाहर मुसलसल बारिश हो रही थी
मैं बरामदे में पुरानी खाट पर लेटा था
बिजली गुल थी बहुत देर से पूरे शहर की
और घर के अंदर कोई छोटा दीया भी नहीं जला था

बूँदों की शोर में खोया था मैं
पानी की बड़ी बूँद छत से गिरती थी मेरे ऊपर
ज़रूर दूर कहीं ऊँचे आसमान में
ये बूँदें नीचे आती होंगी तुम्हें छूकर

हलकी रौशनी रोशनदान से छनकर आ रही थी
मेरा ध्यान मेज पर रखी तेरी तस्वीर पर चला गया
पुरानी थी पर ऐसा लगा जैसे कल की ही बात हो
तन्हाई भरी शाम में तेरा ख़याल दिल मेरा जला गया

मैं उठ कर कमरे में गया और लैंप जला ली
आलमारी खोली और वो पुरानी लाल वाली डायरी निकाली
कभी पन्ने पलटता तो कभी खिड़की से झाँकता
अंदर तेरी यादों का साया बाहर रात की चादर काली

संग बिताये लम्हों के एहसासात क़ैद थे पन्नों में
कितना ख़ूबसूरत फ़साना अपना साथ गुज़रा जमाना था
कभी मिले ख़ुदा तो उससे पूछूंगा मैं
ज़िन्दगी तो शुरू की थी अभी, अभी क्यों तुम्हें जाना था?


मन करता है
बैठा ही रहूँ
तेरे इस झरने के नीचे
और तुम बरसाते जाओ
शांति जल

वरना कहाँ मन लगे
ये दुनिया तेरी जंगल
कैसे-कैसे पेड़ यहाँ
और कैसे-कैसे फल

घर-घर हैं ये पेड़ लगे
लम्बे हैं पर छाँव नहीं देते
घने पर हवा नहीं
फलों में इनके विष
और छालों पे कांटे

जाने कैसी जलवायु बदली
बीज ही सारे ख़राब हो गए!

लोग कहते हैं
विचार बीज हैं
कर्म जिनके फल
और सोचता हूँ तो लगता है
चरित्र ही वृक्ष है
प्रेम उसकी छाया
व्यवहार छाल
और वाणी बयार

और बात करें जलवायु की तो
जल गुरुजनों की शिक्षा और अनुशाषन
और वायु वो सारी चीजें
मन जिनमे उलझा रहता दिन भर

और सच तो ये है कि
जलवायु करते हैं असर बीजों पर








Tuesday, October 20, 2015

फ़िक्र-ए-दुनिया ने कभी बेफ़िक्र होकर रहने न दिया
खुलकर उड़ने न दिया, पिघलकर बहने न दिया

तेरी जुल्फ़ों के साये में ज़िन्दगी मेरी यूँ बीत ही जाती
मेरी बेताबी ने मगर एक जगह मुझे ठहरने न दिया

जुनूँ  ही था जो मारा-मारा फिरता रहा दर-ब-दर
घर की चिंताओं ने चैन से घर पर रहने न दिया

आऊँगा एक दिन लौट, माँ से था ये वादा मेरा
शहर की रौशनी ने मगर मुझे गांव का रहने न दिया

जिस राह चल रहा हूँ उस पर मेरी मंज़िल तो नहीं
कुछ भूख ने, कुछ ख़ौफ़ ने अलग राह चलने न दिया

हर सुबह मैं ऑफिस जाने की ढूंढता हूँ वजह
चाहता तो हूँ हसरतों ने मगर कभी रुकने न दिया


Thursday, May 21, 2015

कोई जैसे डायरी के
ज़र्द पुराने पन्नों को
फाड़कर निकालता है
और डस्ट-बिन में डाल देता है
वैसे ही हमारे रिश्ते को
तुमने छोटे-छोटे पुर्जों में
फाड़कर फेंका था उस दिन

मैं आज भी
उन टुकड़ों को ढूंढता हूँ
उस मोड़ पर जाकर

सुना है पर वक़्त ने
तेज आँधियाँ चलायी थीं
उस रोज
उसी में उड़ गए हों शायद

या फिर हर शाम को
जो बारिश होती है
और सारी रात ठहरती है
उसमे बह गए होंगे

कुछ रिश्तों के निशाँ भी
कितनी आसानी से
मिट जाते हैं ना

पर तुम्हारी यादों ने
जो दास्ताँ दिल के
कागज पर लिखी है
वो शायद कभी न मिट पाये

किस परमानेंट इंक से
लिख गयी हो अपना नाम !


Tuesday, May 19, 2015

खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
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टुकड़ा हस्ती का टूटकर गिर गया कहीं
आरज़ू बस हर पल एक पास रखता हूँ
मेरा था तो मिल ही जाएगा एक दिन
कैसे कहूँ मैं कि ये विश्वास रखता हूँ
बैठ जाऊं फिर तो लम्बा कहीं विश्राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए


मैं हूँ वो नदी जो समंदर जानती नहीं
परिंदा वो जो अपनी परवाज़ ढूंढता है
हूँ वो रस्ता जिसपे कोई मंजिल नहीं
एक साज़ ऐसा जो आवाज़ ढूंढता है
इस जुस्तजू में सारी उम्र कहीं तमाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए

चाहता हूँ हिम या बहती जलधारा
दरिया की मौजें या उसका किनारा
सही राह अक्सर पहचान नहीं पाता
जान नहीं पाता अंतर्मन का इशारा
इसी ग़फ़लती में गलत कोई अंजाम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए

रौशन दिवस को तम में ढलना होता है
कोयला है चट्टान मगर जलना होता है
जीवन में कई बार ऐसे हालात आते हैं
मन के विरुद्ध खुद को चलना होता है
लड़ रहा हूँ इस युद्ध में हार मेरे राम ना हो जाए
खोज अधूरी रहे और जीवन की शाम ना हो जाए
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
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सुमन बिछे पथ नहीं मिलेंगे
शूलों पर ही चलना होगा
भास्कर की शंखनाद सुनो ...
उठो पार्थ, फिर लड़ना होगा
देते क्यों हवि हो सिसक-सिसक कर जीवन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की


द्वंद्व मन का मिटा नहीं है
महा-भारत रुका नहीं है
विवेक से फिर हो मंत्रणा
कृष्ण, सारथी, सखा वही है
पर विचार नहीं अब कर्म करो, कौरवों ने गर्जन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की

समर है ये जीवन का जिसमे
विराम नहीं, विश्राम नहीं
अमर हुए जो जीते लड़कर
हारे हुओं का कोई नाम नहीं
गिर, फिसल मगर तू चल, कर इच्छा-शक्ति मन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की

चिंताओं का कोई अर्थ नहीं
चेष्टा कोई व्यर्थ नहीं
अश्रु, स्वेद, रक्त बिना
खुशियों की कोई शर्त नहीं
हो मन कठोर, भुजा में जोर, बेला ये दमन की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की

अर्जुन उठो, योगी बनो
साधना व कर्म करो
भय, चिंता, अहम, संशय
मेरु-अनल में दहन करो
स्वर्ग-सोपान अंतर्दिश, चेतना हो आरोहण की
उठो, चलो, हुंकार भरो, रूख़ करो तुम रण की
कई लम्बी अँधेरी रातों के बाद
मुख़्तसर सा एक दिन आता है
आखें ठीक से रौशनी में
खुल भी नहीं पाती हैं
कि दिन ढलना शुरू हो जाता है
और फिर वही रातों का कारवां

एक अरसे से
यही सिलसिला चल रहा है
जाने कब थमेगा ये दौर !

दुआ ही तो कर सकता हूँ
सो वो मैं कर रहा हूँ 

Saturday, February 7, 2015

पग-पग तू छली गयी है
बारंबार ठगी गयी है
साहस को तेरे नमन है
चलती रही तू रुकी नहीं है
कहो तो कब इस जग ने तुझको सच्चा मान दिया है?
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!

कब से अपने पैरों पर थी
पर थी तब भी पर-निर्भर
भूल तेरी बस इतनी थी
रही समर्पित जीवन भर
तेरे समर्पण को सबने निर्बलता का नाम दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!

जब स्वयं से तू लड़कर जीती
जग से भी तू जीत रही है
शनैः-शनैः ही पर निश्चित ही
रात अँधेरी बीत रही है
तेरे ढृढ़-संकल्प ने ही रास्ता कुछ आसान किया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!

रहो अडिग, रहो अटल तुम
नव-विहान को आने दो
आशा की नयी किरण हो
स्वयं को जग पे छाने दो
उगते सूरज को जग में सबने ही सम्मान दिया है
तू समझी अबला कह तेरा जग ने गुणगान किया है!

Saturday, December 20, 2014

एक नए सफ़र पर चल पड़े हो तुम
पर ये सफ़र है या तेरी कोई जुस्तजु ?
तुम्हे है तलब एक ऐसे शै की
जी तेरी प्यास को बुझा दे
महसूस कर रहे हो शायद तुम
कि मुकम्मल नहीं हो तुम
कही है तेरे अंदर कुछ ऐसा
जो उतर  आया है बगावत पर
जंग छेड़ दी है उसने आज
चाहिए उसे आज़ादी
तेरे बाकी के वजूद से
उसने तुमसे कर दिए हैं कई सवाल
जिनके जवाबों की खातिर
तुम चल पड़े हो इस सफर पर

घूम रहे हो तुम शहर-दर-शहर
देखे तुमने नए लोग, नए मंजर
देखे तुमने अपनी माजी के हिस्से
सुने बच्चों और बुजुर्गों के किस्से
अनजान गलियों में जो चले तुम
कई चेहरों के तबस्सुम बने तुम
नए तजुर्बे, नए एहसासात मिले
सवालों के शायद जवाबात मिले

अब ये सफर खत्म होने को है
तुम फिर होगे वहीँ जहाँ से थे चले
पर वो जो शख़्स चला था वो न होगा
तुम्हारी शख़्सियत होगी अलहदा
तेरा नजरिया बिलकुल जुदा

शायद इस सफर में
जिसकी इब्तदा भी थी और इन्तहा भी
तुमने आगाज़ किया एक और सफर का
ये वो सफर है जिसमे
मुसाफ़िर को मंज़िल का इल्म नहीं
न राह मालूम न फासला
पर ये वो सफर है
जो तुम्हे खुद तय करनी है
खुद में तय करनी है
जिसमे मुसाफ़िर खुद
और मंज़िल भी खुद

ये भी एक जुस्तजू है
पर इसके मुकम्मल होते ही
बाकी सारे खोज खत्म हो जाएंगे
रहेगी फिर न कोई आरज़ू बाकी
न कोई तलब न कोई ख्वाहिश
फिर न रह जायेगी
किसी सवाल की कोई अहमियत
इल्म का सूरज ऐसे निकलेगा कि
उसकी रौशनी में
खिल उठेगी तेरी शख़्सियत

वैसे जिंदगी भी तो
एक मुसलसल सफ़र ही तो है
जिसकी न इब्तदा मालुम
और न इन्तहा




 

Sunday, September 7, 2014

बेचैन अकेली रात
हमसफ़र चाँद के
इंतज़ार में
तड़प रही थी

सुबह होने वाली थी 
और उसे डर था
आसमां के पार्क में
शिव-सैनिक जैसा
आएगा सूरज
और उन दोनों को
फिर से
जुदा कर देगा 

Friday, August 29, 2014

वर्तमान की ज़मीन के ऊपर
यादों और ख़यालों का
बहुत बड़ा स्पेस है
और मन एस्ट्रोनॉट है
बिना स्पेस शिप और
बिन स्पेस शूट के उड़ जाता है
जब-तब उस स्पेस में
एस्केप वेलोसिटी से
बताओ  भला अब वो ज़मीन
पर वापस कैसे आएगा
उसी स्पेस के
सबसे चमकीले तारे हो तुम
मेरा मन भी चाँद की तरह
चमकता है तुम्हारी रौशनी से 
दिन तुम रख लो
रातें मैं रख लेता हूँ
ख़ामोशियाँ तुम चुन लो
बातें मैं रख लेता हूँ
अपने गीत दे दो मुझे
और मेरी नज़में ले जाओ
चाँद का तसव्वुर रख लूँ मैं
एहसास चांदनी का तुम ले जाओ

जब इस मोड़ से बँट रहीं हैं राहें आज
बाँकी सब भी आधा-आधा बाँट लेते हैं
बस उन लम्हों को छोड़ देना यहीं
उन्हें आज के बाद भी मुकम्मल ही रहने देना

पर वो लम्हे मुकम्मल थे तभी
जब इनमे मैं और तुम दोनों शुमार थे
हमेशा बिना किसी शर्त के
बस उन लम्हों की यादों को
थोड़ा तुम ले जाओ थोड़ा मैं
आज के बाद मैं और तुम साथ
इन यादों में ही रहेंगे

मुझे जब तुमसे बातें करनी होगी
या तेरी उंगलियां छूना चाहूँ कभी
यादों के इसी मोड़ पर वापस आऊंगा चल कर
और उन्ही लम्हों में उतर जाऊँगा मैं
उनमे तुम मिलोगी मुझे वैसे ही
जैसे अब तक मिलती रही थी

तुम्हारा भी जब दिल करे
मेरे कानों में कुछ कहने का
या मेरे कंधे पे सर रख कर सो जाने का
तुम भी आ जाना यहीं
तुम मुझे यहाँ वैसे ही पाओगी
तेरी बाहों को थाम कर
इन्ही राहों में तेरे संग चलते हुए

Tuesday, August 26, 2014

ख़ुदा भी कभी-कभी
बहुत इमोशनल हो जाता है
और कभी-कभी
बिलकुल इमोशनलेस
तभी तो कभी जम के बारिश होती है
और कभी जम के सूखा

जब जम के बारिश होती है
तो लगता है
अपने इमोशंस सारे वो
एक ही मौसम में खाली कर देता है
फिर बाकी वक़्त जाने क्या करता है

जिस साल वो ज्यादा इमोशनल होता है
उस  साल ज्यादा बारिश होती है
मानसून शायद उसका ही कोई इमोशन है
और साइक्लोन भी 

Thursday, August 21, 2014

बचपन से ही मैंने
कुछ आँखों में झाँक कर
उनके सपनों को देखा है
उनके संग जिया हूँ मैं
उनको महसूस किया है मैंने
संग चला हूँ मैं
कभी उनकी लाठी बनकर
उड़ान भरी है मैंने
कभी उनके पंख बनकर

देखा है मैंने अपनी आँखों से
कि कुछ सपने पानी के
बुलबुलों की तरह उठते और
फिर जैसे यथार्थ की
उँगलियों से टकरा कर
गिर कर टूट जाते
और बह जाते
उन आँखों से आँसू बनकर

पर कुछ सपने जिद्दी होते
उड़ते रहते गुरुत्वहीन बनकर
फिर एक दिन अचानक
बड़ी सहजता से उतर जाते
यथार्थ की धरातल पर
उन आँखों में
एक बड़ी चमक पैदा कर

अब उन आँखों को देखने
तरसती हैं मेरी आँखें
पर जब भी यदा कदा
झांकता  हूँ उनमे
देखता हूँ कुछ उदास सपने
कुछ लड़खड़ाते और
कुछ दम  तोड़ते सपने
लेकिन फिर भी
पाता हूँ वहाँ
बहुत सारी
खामोश उम्मीदें  …
 

Saturday, August 9, 2014

आसमां में जब मैं बादल देखूँ 
तेरे लब पे काँपता एक हलचल देखूं 
तेरी आँखों के गीले आईने में 
मैं अपनी पेशानी के बल देखूँ 
अब तक तो हँस कर निभा ली हमने 
इस रिश्ते का क्या होगा कल देखूं 
दूर से बस ज़ुबाँ की सुन पाता हूँ 
क्या  उनकी ख़ामोशी कहे वहीँ चल देखूं 
मुसाफ़िर को ज़माना समझे सुख़नवर 
मैं आईने में दीवाना एक पागल देखूं 
नदी कहती है वह
थक गयी है बहते-बहते
रुक कर सांस लेना चाहती है
खुद को समेट कर
महसूस करना चाहती है

समंदर को देखो
बिखरा है पसरा है
बहता नहीं वो
कब से ठहरा है

नदी औरत है
उसमे इमोशंस हैं
वो फ्री फ्लोइंग है
फील करती है वो

मर्द समंदर है
सीने में सब ज़ब्त रखता है
उसमे ठहराव है
लहरें अंदर ही ख़ामोश करता है

दोनों हैं पानी मगर
जुदा हैं दोनों में फ़र्क़ है
एक में फीलिंग्स की मिठास है
दूसरे में लॉजिक का खारापन

लगता है उसके पास
बस दो कमीज़ें हैं
नीली और उजली
उन्ही को वो बदल-बदल
दिन में पहनता है
और रात को ठण्ड में
एक काली चादर ओढ़ लेता है

कभी-कभी जब
उसकी कमीज़ पे
काले-काले धब्बे पड़ जाते हैं
तो जाने कहाँ से
बौछारें आ जाती हैं ऊपर से
और धब्बों को मिटा जाती हैं

कुल मिला जुला कर
इन्ही कपड़ों में
मैनेज कर लेता है बेचारा
सचमुच कितना मुफ़लिस है
आसमां ....

याद है तुम्हे
हमारी गलियों में
कभी -कभी वो
एक शख़्स आता था
चेहरे पे नक़ाब रख के
उसकी पीठ पर
एक टैंक होती थी
पाइप में एक नोजल लगा के
वो एक केमिकल स्प्रे करता था
नालियों में

हम बच्चे पूछते तो कहता कि
सारे मच्छर और जर्म्स
मर जाएंगे इससे

काश हमने वो
केमिकल भी बनायी होती
जिसे स्प्रे करने से
इंसान के अंदर के
मच्छर  भी मर जाते

क्या कुछ नहीं पाल रखा है
हमने ज़ेहन में
इनटॉलेरेंस और हैट्रेड के जर्म्स
जाने कैसे  पनप गए
प्यार जो इनका एंटीडोट है
वो तो खुदा ने हमारी रगों में
पूरा भर के दिया था
अब लगता है ब्लड में
उसका लेवल कम हो गया गया है

शायद इंसान जल्द
कुछ ऐसा इज़ाद कर ले
कि आज जैसे ग्लूकोज़
चढ़ाते हैं रगों में
वैसे कल प्यार भी चढ़ा सकें


Friday, August 8, 2014

हफ़्तों शहर से
बाहर रहता है वो

शहर में होता भी है तो
देर से घर आता है

लंच के टाइम पे
२-४ कॉफी पी लेता है

बिज़ी रहता है बहुत

सुना है तरक़्क़ी हुई है
उसकी अपने ऑफिस में

सीनियर मैनेजर बन गया है

 
वो उसके शहर आया था
 बस वीकेंड भर के लिए
सैटरडे मॉर्निग दोनों ने तय किया
कि मिलते हैं लंच पर

लंच के टाइम पर उसने
ऑफिस से उसको पिक किया
एक अच्छे चाइनीज़ रेस्टोरेंट में
फिर दोनों  ने लंच किया
वापसी में उसने
उसे ऑफिस में ड्राप कर दिया

शाम को वो देर से घर आई
कुक का खाना खाकर दोनों सो गए

संडे का दिन है कल
किसी को ऑफिस नहीं जाना है
एक दूसरे के साथ
बिताने को है पूरा  दिन

ये तो लक्ज़री ही है
आज के लाइफ की

रात को फिर वो चला जाएगा

हस्बैंड वाइफ हैं दोनों …
 

Wednesday, July 30, 2014

गर्मी की छुट्टियाँ थीं
आदतन मैं गाँव में था
बाँकी सब तो ठीक था
पर आँगन की उदासी
बड़ी खल रही थी

मुझे वहां पसरे हुए
सूनेपन का एहसास हो रहा था
वो शायद इसलिए दुखी था
कि  उसके सर से बूढ़े पेड़ का
साया उठ गया था

मुझे याद कि कितनी चहल पहल
रहती थी आँगन में दिन भर
बच्चों ने झूला बनाकर रखा था
पेड़ की टहनियों पर
घंटो झूलने के बाद जब आँगन में
कूदते थे तो लगता था कि
ख़्वाबों की फ्लाइट लैंड हुई हो

बूढ़े पेड़ ने कभी उस पर अपने
बड़े होने का एहसास नहीं दिलाया था
उसे पता था कि खड़ा है वो इसलिए कि
उसकी जड़ें ज़मीन से जुडी हुई हैं
पर गाँव में एक नया मंदिर बना था
उसकी लकड़ियाँ वहीँ काम आई हैं
बेरहमी से लोगों ने काटा था
उसकी मजबूत और पुरानी जड़ों को

आँगन की बातों से मुझे लगा
मैं भी तो शहर जाकर काट रहा हूँ
गांव से जुडी मेरी जड़ों को
मैं जाने किस मंदिर के काम आऊंगा!
 

Thursday, February 14, 2013

सूफ़ीयाना कैफ़ीयत

कुछ दिनों से उस्ताद नुसरत फ़तेह अली खान साहब की कव्वालियाँ सुन रहा हूँ। ख़ास कर के दो कव्वालियाँ बहुत बार सुन चूका हूँ - मन कुन्तो मौला और साँसों की माला पर सिमरूं मैं पी का नाम। आस पास का मंज़र और अन्दर की कैफ़ीयत पूरी तरह से सूफ़ीयाना हो गयी है।

और मन कुछ इस तरह का हो गया है ....
 
क्या करूँ कहीं रमे ना
काम काज कुछ जमे ना

कहीं रहूँ कुछ भी करूँ
ध्यान तुझसे हटे ना

खो जाऊं बस तुझ ही में
मैं मुझमे अब बचे ना

राहे-फ़ना में बहता जाऊं
उफनती धार अब थमे ना

दरस तेरी मेरा मुकद्दर
तेरे सिवा कुछ दिखे ना

जो है जहाँ में वो तू है
तू नहीं तो कुछ रहे ना

Friday, August 6, 2010

बेरोज़गार

चल रहा हूँ .... एक जूनून सा है .... टकराता हूँ दीवारों से पर चलता जाता हूँ ....
तेज धूप है और ... पथरीले रास्ते हैं .... और सन्नाटा है ...
बवंडर है ... धूल उड़कर आँखों में आती है और छोटे छोटे पत्थर बदन में चुभते हैं ...
कपडे तर हो चुके हैं औए जूते घिस कर फटे हुए मुंह चिढाते हैं ...
फिर अचानक एक भीड़ में पाता हूँ खुद को ... सबकी हालत एक जैसी ...
लेकिन चल रहे हैं एक ही जानिब .... लगता है कुछ मिलने वाला है ...
लेकिन डर है ... कि कोई और छीन न ले उसके हाथों में आने से पहले ......

फिर सब थम सा जाता है .....

दोस्त की आवाज़ सुनता हूँ ..... आँखें खुली तो एहसास हुआ दोपहर का वक़्त है ...
मैं उठता हूँ ... कपडे ठीक कर अपनी फाइल उठाता हूँ ....
और  इंटरव्यू के लिए चल देता हूँ ...
वही मंज़र उभरने लगते हैं फिर .....
पता नहीं मैं पहले ख्वाब में था या किसी  इंटरव्यू की लाइन में !






Saturday, December 12, 2009

पहली कविता ....

एक सुबह घर से चला मैं समंदर से बातें करने को
कितनी आगे निकल चुकी है दुनिया ये समझने को
ज़िन्दगी की आपाधापी में ख़ुद को ही भूल गया था
बरसों बाद वक्त निकाला था उस रोज़ ख़ुद से मिलने को
अपने साथ आखिरी बार कब बैठा था ये याद नही
क्या ख़ुद को पहचान पाऊंगा भय था इस बात का भी

खैर, हिम्मत की, आगे बढ़ा, ख़ुद की तरफ़ हाथ बढाया
एक आवाज़ सुनी, ये मेरी तन्हाई में खलल देने कौन आया
मैंने कहा मैं अपनी कुछ उलझनें दूर करने आया हूँ
ज़िन्दगी से क्या चाहता हूँ कुछ सवाल करने आया हूँ
कब से चल रहा हूँ अब तो वक्त का भी अंदाजा नही
थक चुका हूँ बहुत, थोड़ा आराम करने आया हूं

फिर वही आवाज़ सुनी, मैं तो हमेशा तेरे साथ ही था
तुम ही थे मशरूफ बहुत, मुझे तो तेरा इंतज़ार था
कुछ वक़्त  है तुम्हारे पास कि कुछ वक्त निकाल पाओ?
जरूरी ये की बातें करें हम, थोड़ी देर दुनिया भूल जाओ
मैं बैठ गया गीली रेत पर, सामने ख़ुद भी बैठा था
सब कुछ भूल गया था मैं, माहौल ही कुछ ऐसा था

ख़ुद ने कहा चलना जीवन का नाम है बस चलते रहो
पर क्या इल्म है अपनी मंजिल का, आख़िर कहाँ जा रहे हो?
मेरी मंजिल और मेरा ठिकाना तो लोगों ने मुक़र्रर किया है
रास्ते बनाए दुनिया ने जिन पे मैंने बस सफर किया है
ख़ुद की बात सुनी है कब, सुन के भी कभी समझा नहीं
जो चाहता था वो कर पाऊंगा , ऐसा रहा कभी हौसला नहीं

देर से ही सही पर बात मेरी समझ में आ गई
मेरी जिंदगी बस मेरी है किसी और की नहीं
क्यों सुनूँ किसी और की बात बस ख़ुद का कहा सुनूँ
ख़ुद ने जो बताया अब उसी रास्ते पर चलूँ
हो सकता है शुरू में थोड़ा भटकना पड़े
पर खुशी होगी मुझे इस बात की
कि मैं चला वो राह जो ख़ुद ने चुनी
हाँ हाँ वो राह जो ख़ुद मैंने चुनी

Tuesday, September 15, 2009

वो गूंज रहा है अब भी एक विलंबित ख़याल की तरह ....

महक उसके सुर की
कशिश उसके धुन की
ज़िन्दगी  हो गई गोया
रात चौदहवीं की

फिर मेरे आसमां में
कोई जगमगाता रहा
साज़ दिल के बजते रहे
वो गुनगुनाता रहा

सहर की आमद हुई
फिर शोर बढ़ने लगा
सुर ढीले होते चले
साज़ धीमा पड़ने लगा

अब बिगड़ रही ज़िन्दगी
बड़े मियाँ के बिगड़ते
हाल की तरह
पर अब भी मन में वो
गूंज रहा है एक विलंबित
ख़याल की तरह  .……

Thursday, September 3, 2009

भाग रहा कहाँ यूँ बेतहाशा आदमी, है किस चीज़ का इस क़दर प्यासा आदमी .....


सुबह सुबह मैं भी सूरज के साथ निकला
दोनों में किसी का रस्ता नहीं बदला
शुरू हो गई थी जद्दोज़हद एक और दिन की
ढल गया शाम को, दिन भर इतना चला .........

सब चल रहे हैं, पर किधर ये इल्म नहीं। आंखों में कुछ सपने हैं, दिल में अरमान कई। लम्बी दौड़ती सड़कें हैं, मंजिल का नामोनिशां नहीं। एक होड़ है आगे निकलने की, कहीं पहुँचने की। इसी आपाधापी में सब कुछ भूले पड़े हैं। छोटी छोटी बातों में अब खुशी नहीं मिलती है, हाँ इंतज़ार रहता है एक किसी बड़े कारण का, जिस दिन बहुत खुश होंगे। उस दिन, उस पल की तैयारी में लगे हैं। ज़िन्दगी, तुझमे अब वो बात नहीं रही, तेरी ऊँगली थाम कर चलने में अब मज़ा नहीं आता है। तू धीमी हो गई है, ज़माने की रफ़्तार बढ़ गई है। एक जिद लिए दौड़ रहे हैं, तुम्हे बहुत पीछे छोड़ दिया है।

ज़िन्दगी, मैं तेरी टैक्सी में बैठा हूँ
तुमने उम्र का मीटर ऑन कर दिया है
बड़ा मंहगा सफर है, इसमें तो
साँसों का बटुआ खाली हो जाएगा

Saturday, August 29, 2009

मैं तो बह रहा था
एक दरिया की तरह
तुम आए थे ठहराव बन कर
दोनों हाथों का किनारा देकर
तुमने पूरा समेट लिया था मुझे
पहली बार मुझे अपनी गहराई
का एहसास हुआ था तब

पर तुम तो जानते थे
रुकना मेरी फितरत थी नही
बह गया एक दिन फिर
उन मजबूत किनारों को तोड़कर
तुम पीछे छूटते गए
और मैं बहता गया

अब आलम ये है की
मंजिल का इल्म नही
और समंदर की चाहत नहीं
एक कश्ती लेकिन अब भी
बह रही है संग मेरे
वो तेरी यादों की है
शायद ही किनारा लग पाएगी अब

Tuesday, August 25, 2009

वो यार वो विसाल वो रात कहाँ से लाओगे
आरज़ू माना अपने हैं वो हालात कहाँ से लाओगे

दिल संग हो चुका अब दरिया-ऐ-चश्म बहता नहीं
अब बिछडे तो अश्कों की बरसात कहाँ से लाओगे

वो तेरा फिर कहना कि एक मुलाक़ात लाज़िमी है
हम मिल जाएँ पर करने को बात कहाँ से लाओगे

दरमियान अपने एतबार कहीं गुम हो चुका है अब
वो खामोशी वो सुखन वो ख़यालात कहाँ से लाओगे

ज़माना बदल जाओगे मुसाफिर किस ख्वाब में जीते हो
वो हौसले वो इरादे वो जज़्बात कहाँ से लाओगे

Saturday, August 22, 2009

निशाँ अब भी है बांकी ....

दिल के बंज़र ज़मीं पे
उन्होंने कभी मोहब्बत के बीज डाले थे
सींचा करते थे उसे अरमानों से
हरा भरा पौधा निकल आया था वहां रिश्ते का एक

वक्त के साए में बढ़ता रहा वह
बड़ा पेड़ हो गया था
विश्वास की मजबूत डालियाँ थीं उसकी
सपनों के पंछियों का बसेरा था उन पर

फिर एक दिन कहीं से तूफ़ान आया था
डालियाँ टूट गयीं थीं सारी
घोसले बिखर कर ज़मीं पे आ गिरे थे

ठूंठ पेड़ अभी भी खड़ा है वहीँ
यादों की जड़ें जो फ़ैल गयीं थीं
पूरी तरह ज़मीं के अन्दर
उन्ही मजबूत जड़ों ने उसे
संभाल रखा है .....

Sunday, August 16, 2009

होठों पे अपने तुमने दबा रखा क्या है
पलकों में मोती सा छुपा रखा क्या है

तमाशा देखने वालों घरों को जाओ
रात गुजर चुकी अब बचा क्या है

जले हैं घर जिनके पूछो उनसे जाकर
क्या बचा पाये हैं और जला क्या है

गाँव अपना छोड़ तुम शहर आ गए
बूढे माँ बाप वहां, यहाँ ऐसा क्या है

रातों को अक्सर टहलता है फलक में
कभी आधा कभी पूरा ये अजूबा क्या है

लब से कहा कुछ न आँखें पढने दी
उश्शाक बतलाएं हमें ये अदा क्या है

बाहर निकले तुम न हमें घर आने दिया
बात क्या है आख़िर तुम्हे हुआ क्या है

गरीब की छप्पर से धुंआ निकला है
देखो तो उसके घर जला क्या है

किस ख्वाहिश को इस बार मारा है
तेरी आंखों से फिर बह रहा क्या है

ढूंढ लूंगा एक दिन तुमको ऐ जिंदगी
मुसाफिर को चलने की सज़ा क्या है

Saturday, August 15, 2009

मेरा भारत महान?

क्या ये वही प्रजातंत्र है
जिसके लिए इतनी लड़ाईयां लड़ी थीं
इतनी सारी कुर्बानियों की
हमने कहानियां पढ़ी थीं
फिर क्यूँ भूल गए वो कुर्बानियां
अपने पूर्वजों की वो मेहरबानियाँ

ये उनके सपनों का प्रजातंत्र नहीं है
खो गया लगता इसका मूलमंत्र कहीं है
आज भी इंसान पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है
विचारों से व्यवहारों से परतंत्र कहीं है
मजबूत जड़ से भी शाखाएं मजबूत पनप नहीं सकीं
गाँधी के सपनों की दुनिया बस नही सकी

शिक्षा का प्रसार हम कर नहीं सके
सुविधाओं में सुधार हम कर नहीं सके
तंत्र में लोगों का विश्वास जगा नही सके
योग्य उम्मीदवारों की कतार लगा नही सके
लोग आज भी यहाँ दुःखहाल हैं
गाँवों के मंजर और भी बदहाल हैं

शासक आज भी यहाँ शोषक है
चुनावी जोड़ तोड़ बड़ा रोचक है
शासित आज भी यहाँ शोषित है
रामधीन का बेटा आज भी कुपोषित है
नेताओं मंत्रियों को अपनी जिम्मेदारियों का भान नहीं है
जनता को भी अपने कर्तव्यों का ज्ञान नहीं है
कदाचित ये सपनों का भारत महान नहीं है ........

Thursday, August 13, 2009

आज फिर
वक्त ले आया है उन्ही हवाओं को

दिल के आसमां में
फिर जज़्बातों के बादल उमडेंगे

बारिश होगी फिर रात भर
आंखों से ......

Wednesday, August 12, 2009

त्रिवेणी

कल जो अपनी ज़ुल्फों को तुमने उठा के समेटा था
तेरी मांग का सिन्दूर मुझे दिख गया था
मेरे अरमानों के खून का रंग अभी भी था उसमे

Tuesday, August 11, 2009

वाह रे मीर, खुदा-ऐ-सुखन ....

बकौल गालिब .....
"कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था"

और ज़ौक फरमाते हैं .....
"न हुआ पर न हुआ मीर का अंदाज़ नसीब"

उसी मीर के बारे में एक video हाथ लगी है .... share कर रहा हूँ ......

लहरों ने आवाज़ दी .....

शाम का वक्त था
मैं साहिल पे बैठा था
हमेशा की तरह अकेला
सूरज को ढलते देख रहा था

एक अजीब सी कशिश थी चारों तरफ़
सुरूर पुरी तरह मेरे उपर छा रहा था
नमी से भरी हवा चेहरे पे आ रही थी
मैं भी कोई गीत गुनगुना रहा था

समंदर अपनी बाहें फैलाए
बड़े इत्मीनान से लेटा हुआ था
किरणें उसे छूकर जा रही थीं
वो जुदाई के ग़म में डूबा हुआ था

कुछ देर में ख़तम हो जाएगा सब
मैं शायद ऐसा ही सोच रहा था
उठते और गिरते लहरों की शोर में
अँधेरा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था

ये जो दो लम्हे बचे थे रात से पहले
उनमे मेरा दिन भी सिमट रहा था
ऐसा लगा लहरों ने आवाज़ दी हो मुझे
मैं जब उठ के साहिल से जा रहा था

Monday, August 10, 2009

दवा काम ना आए दुआ तो चले

इश्क में जां अपनी फंसा तो चले

अख्तियार रहा नहीं दिल मगर धड़कता है

खुशबु के बगैर ही हवा तो चले

जां लुटा के अपनी कब से बैठे हैं

संगदिल को मगर कुछ पता तो चले

तेरी ख्वाहिश में दम बारहा मेरा निकले

गालिब मर गया उसका कहा तो चले

मुश्किल है सफर ये आसान नहीं है

कदम डरे रुके हैं हौसला तो चले




आंखों का समंदर सूख चला

दिल भी अब परेशान नहीं

जिंदगी तू मुझसे नाराज़ सही

मैं तुमसे हैरान नहीं

जीने की अब पड़ गई आदत

ग़म से अपनी यारी है

दर्द का होता एहसास नही

जाने क्या बीमारी है!

Saturday, August 8, 2009

न उतरा हूँ न उतरूंगा

मैं सूरज हूँ मैं चमकूंगा

तुम दूर बैठ कर देखोगे

सबकी जुबां पे चढ़ जाऊँगा

आवारा बादल का टुकड़ा हूँ

न जाने कहाँ, पर बरसूँगा

मस्त हवा का झोंका हूँ

खुशबु ले कर उड़ जाऊँगा

दूर हटो ऐ दुनिया वालों

आज सुनो, बस मैं बोलूँगा

याद करोगे देर तक तुम

चालें ऐसी कुछ चल जाऊंगा

गौर से देख लो मुझको

गया, फिर हाथ न आऊंगा

उन्मादी दरिया का पानी हूँ

हर बंध तोड़ बह जाऊँगा

जुनू है ऐसा जीवन का

मौत से भी लड़ जाऊँगा

Thursday, August 6, 2009

वो जो कभी मेरे दिल में रहते थे

संग-संग मेरी राहों में चलते थे

जो थे रौशनी का सुराग, मुसाफिर का हौसला

उन इरादों का सुना मैंने क़त्ल हो गया

Wednesday, August 5, 2009

बूँदें मोहब्बत की ...

चलो आंधी ढूंढ कर लायें
वो आंधी जो बारिश लाएगी
बड़े-बड़े बादल के काले टुकड़े
मुसलाधार बरसाएंगे मोहब्बत की बूँदें

सुना है दूर पहाड़ी पे है वो जगह
पर इतना आसान नहीं है वहां तक पहुंचना
इस बार सबको मिलकर बड़ी कोशिश करनी होगी
चाहते गर मोहब्बत का नाम-ओ-निशाँ बचाकर रखना

Tuesday, August 4, 2009

जीवन को कई रंग बदलते देखा ...

जीवन क्या कठपुतलियों का एक नृत्य है
जिसकी बागडोर क्रूर समय के हाथ है?
या ये वो पाल वाली नौका है
जो हवा के थपेडों और तेज धार से संघर्षरत है?
या किस्मत इसकी भारतीय रेल के डब्बे सी है
जो अगर जलती नही तो पुल से गिरती है?
या महत्वाकांक्षाओं का भारी बक्सा है
जिसे सर पे लिए हर शख्स कहीं भाग रहा है?
या फिर ये जिम्मेदारियों का लंबा चौडा अहाता है
जहाँ क़ैद होकर इंसान मौत की राह जोहता है?

Monday, August 3, 2009

मुसाफिर तू तन्हा कहाँ है!

एक रस्ता चलता है संग मेरे
एक दरिया गुनगुनाती है संग मेरे
कुछ यादें, कुछ बातें, कुछ नज्में मेरी
कोई खुशबु, कुछ ख्वाब, कई चेहरे
गज़लों की एक पुरानी किताब भी
एक पोटली ग़म की और दूसरी फटी हुई
चलते रहने की जरुरत का एहसास भी
एक ही रस्ते पर सब चलते हैं संग मेरे
मैं तन्हा कहाँ हूँ!

Saturday, August 1, 2009

थोड़ा गालिबाना हो जाएँ ....

पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन था
कोई बतलाओ कि हम बतलायें क्या ...

.... ग़ालिब के बारे में बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और कहा गया है लेकिन मेरी पहचान इस अजीम शख्सियत से एक दूसरे उतने ही बड़ी शख्सियत ने कराई। मैं और मेरी जेनरेशन का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसके लिए ताउम्र गुलज़ार साहब का कर्ज़दार रहेगा जिन्होंने अपने टीवी सीरियल के ज़रिये हमें गालिबियत से रूबरू कराया। ये सीरियल बेहतरीन था और ग़ालिब को maases के बीच लोकप्रिय करने में बहुत कामयाब रहा। ये बात दीगर होती है लोग जिस तेरह से गालिबाना अंदाज़-ऐ-बयाँ का इस्तेमाल करते हैं रोज़मर्रा की बोलचाल की भाषा में। मुझे लगता है की ग़ालिब के अलावा कबीर ही दूसरे कवि होंगे जो आवाम में इतने या इससे थोड़े अधिक मशहूर होंगे। मीर, जिनका लोहा ग़ालिब भी मानते थे, को लोकप्रिय करने के लिए फिर एक काबिल शख्सियत को आगे आना पड़ेगा। ऐसे कुछ और नाम होंगे।

ग़ालिब, गुलज़ार फरमाते हैं कि उनके लिए एक आम पड़ोसी के जैसा था जिसे आम का बेहद शौक़ था और जो शराब से अपने लगाव को कभी किसी से छुपाता नही था। दरअसल, अपनी मुफलिसी और मुश्किलों को ग़लत करने के लिए ग़ालिब ने शराब से दोस्ती बढ़ा ली थी। अपनी इस दोस्ती को ग़ालिब ऐसे बयाँ करते हैं -
ग़ालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी-कभी
पीटा हूँ रोज़-ऐ-अब्र -ओ- शब्-ऐ-माहताब में

मैं आज भी याद करता हूँ ग़ालिब को इक बे-खौफ शायर के रूप में जिसने जिंदगी अपने तरीके से जी जब कि हालात और ज़माना दोनों लंबे अरसे तक उनके ख़िलाफ़ रहे।
हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना, कि यूँ होता तो क्या होता?

- मुक़र्रर! मुक़र्रर!

इस ब्लॉग के बारे में ....

कुछ शुरू करने से पहले थोड़ा tone set कर ली जाए। हिन्दी के कुछ blogs पढ़कर दिल में एक ख्याल आया है कि क्यों न मैं भी फिर से कुछ लिखूं और इस बार हिन्दी में। Blogging की ये कोई कोशिश मेरी पहली नही है, फर्क इतना है कि हिन्दी में नही लिखा। विषय कोई ख़ास नही है अभी फिलहाल दिमाग में। जब जो दिल में आएगा लिखेंगे - कैफियत, तबियत और फुर्सत के हिसाब से। हिन्दी और उर्दू पोएट्री एक अहम् हिस्सा होंगीं इस space का। कुछ मशहूर कवियों और शायरों और उनकी कविताओं और ग़ज़लों का बराबर ज़िक्र होता रहेगा और बीच-बीच में अपनी भी बातें होंगी। इसके अलावा थोडी बहुत philosophy और कुछ रोज़मर्रा की बातें भीं.

दीवारें गिरेंगी तो फ़ासले मिटेंगे दिल मिलेंगे हाथ मिलेंगे क़दम एक साथ उठेंगे फिर सफ़र कितना भी मुश्किल क्यों न हो दूर कितनी भी मंज़िल क्य...